कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने पार्टी अध्यक्ष के रूप में दस साल पूरे कर लिए हैं। पार्टी जनों और देश के विशिष्टजनों की तरफ से उन्हें बधाइयों से नवाज़ा जा रहा है। आज सुबह कांग्रेस मुख्यालय २४ अकबर रोड और उनके निवास स्थान पर उनको बधाई देने वालों का तांता लगा रहा। मीडिया भी यूपीए की चैयरपर्सन और पर्सन अभेभ द पीएम के घर के बाहर सुबह से ही अपनी दुकान लगा कर बैठ गई। बहरहाल दस साल के उनके सफर में कई उतार चढ़ाव आए लेकिन मीडिया और अन्य लोगों के हाव भाव से ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस के जीवन में ये दस साल किसी स्वर्णकाल से कम नहीं रहे जिसका विश्वलेषण करना तो किसी पाप से कम नहीं। इस अवधि की तो सिर्फ तारीफ ही हो सकती है बहरहाल सभी लगे रहे। हम भी अपनी दुकान सजा कर बैठे और बेच रहे सोनिया के दस स्वर्णिम साल।
अगर सोनिया गाँधी के इन दस सालों के सफर पर एक नज़र डालें तो कई बातें खुल कर सामने आती हैं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हृदय विदारक हत्या के बाद कांग्रेस की हालत वाकई नाज़ुक हो चुकी थी। राजीव गाँधी की मौत भी ऐसे वक्त हुई जब कांग्रेस अपने गौरवमयी अतीत के मुहाने पर खड़ी थी। बहरहाल पी वी नरसिम्हा राव और सीताराम केशरी जैसे कांग्रेसी नेताओं ने एक हद तक पार्टी को संभालने की कोशिश की। खासतौर पर पी वी नरसिम्हाराव ने जिस तरह से अल्पमत सरकार को पांच साल तक खिंचा उसकी तारीफ की जानी चाहिए थी लेकिन आज कोई भी कांग्रेसी उनका नाम लेना तक गँवारा नहीं समझता। बहरहाल राजीव गाँधी की मौत के तुरंत बाद कांग्रेस जनों की निगाहें नेहरू गाँधी परिवार की बहु सोनिया गाँधी की तरफ उठीं। लेकिन उन्होंने तत्काल राजनीति में आने से इंकार कर दिया। लिहाजा कांग्रेस के विश्वसनीय कोषाध्यक्ष सीताराम केशरी पार्टी अध्यक्ष बने लेकिन उनके नेतृत्व में कांग्रेस विखंडन के दौर में प्रवेश करने लगी। आलोचकों के जबान को एक बार फिर बल मिला कि कांग्रेस सिर्फ नेहरू गाँधी परिवार के नीचे ही एकजूट रह सकती है। लेकिन तकरीबन सात साल बाद जब सोनिया गाँधी राजनीति में आईं और कांग्रेस का नेतृत्व संभाला तो कई पुराने कांग्रेसियों की जान में जान आई। तीन राज्यों की विधानसभा तक सीमट चुकी कांग्रेस में निश्चित तौर पर एक नई ऊर्ज़ा का संचार हुआ और कांग्रेस चौदह राज्यों में सत्ता पर काबिज हुई। वाजपेयी के नेतृत्व में छह साल के एनडीए शासनकाल के बाद जोड़ तोड़ कर कांग्रेस के नेतृत्व में केंद्र में यूपीए की सरकार भी बनी। लेकिन केंद्र में सरकार बनने के चार साल बाद आज फिर कांग्रेस चार राज्यों में सीमट चुकी है। राजनीतिक पंडित यूपीए सरकार की उल्टी गिनती शुरू कर चुके हैं। क्या वाकई सोनिया गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस के दस साल ऐतिहासिक माने जा सकते हैं ?
लेकिन इन दस सालों में जो एक बात सबसे ज़्यादा चुभती सी दिखाई देती है वो ये कि आज राज्य स्तर पर या केंद्रीय स्तर पर सोनिया के मुकावले कांग्रेस में एक भी कोई ऐसा नेता दिखाई नहीं देता जिनमें पार्टी या सरकार संभालने का माद्दा हो। क्या दस साल का समय कम होता है कि नेतृत्व के लिए एक पूरी पीढ़ी को तैयार किया जा सके। बहरहाल ले देकर मामला फिर नेहरू परिवार के अगले हीरो राहुल गाँधी पर जाकर टिकती जो अब भी ठीक से राजनीति में लड़खड़ाना भी नहीं जानता। बहरहाला देर सबेर उनमें भी राजनीतिक समझ आ ही जाएगी। लेकिन तब भी कोई इस सवाल का जबाव देगा कि नेहरू गाँधी परिवार की विरासत के अलावा क्या कोई और चीज कांग्रेस को जोड़े नहीं रख सकती ? क्या देश की राजनीति के लिए ये अच्छा न होता कि कोई कांग्रेसी ही इस सवाल को उठाता ?
बहरहाल राजनीति में दस साल पूरे करने के लिए सोनिया गांधी को मेरी तरफ से भी बधाई।
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