बुधवार, 12 मार्च 2008

यूपीए के ललबबुआ ..................

केंद्र की कांग्रेस वाम ग‌ठबंधन वाली यूपीए सरकार अपने अंतिम साल में पहुँच चुकी है। पिछले चार सालों से यूपीए के लाल बबुआ विभिन्न मुद्दों पर जिस तरह से केंद्र सरकार की बाँह मरोड़ते रहे हैं वो लगातार जारी है। चाहे परमाणु करार का मुद्दा हो, कथित कल्याणकारी नीतियां हो, नंदीग्राम और सिंगूर का हो या हाल ही में भाजपा संघ कार्यकर्ताओं द्वारा सीपीएम मुख्यालय पर कथित हमले का रहा हो। कथित हमला इसलिए की घटनास्थल पर मौजूद कई पत्रकारों का कहना था कि पत्थरबाजी पहले गोपालन भवन ( माकपा मुख्यालय ) से शुरू हुआ। बाद में संघ कार्यकर्ताओं द्वारा जबाव दिया गया। बहरहाल पहले जिसने भी चलाया हो .... भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इस तरह की अलोकतांत्रिक घटनाओं को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता है।
लेकिन इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भले ही हम विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने का दावा करते रहे हों लेकिन वास्तव में ऐसा है ही नहीं। दरअसल हमारी आजादी के पहले ही हमारी लोकतांत्रिक मान्यताएं भीड़तंत्र और जिसकी लाठी उसकी भैंस में तब्दील हो चुकी थी। दरअसल माकपा मुख्यालय पर जो कुछ भी हुआ उससे देश के ललबबुओं की करतूतों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया। संघ कार्यकर्ताओं का आरोप है कि वो केरल की हिंसक घटनाएं जिसमें न केवल संघ और भाजपा बल्कि मुस्लिम लीग और यहाँ तक की केंद्र के यूपीए सरकार के बड़े भाई कांग्रेस कार्यकर्ताओं तक को सरेआम मौत के घाट उतारा जा रहा है, के विरोध में माकपा मुख्यालय पर धरना देने और उनके केंद्रीय नेतृत्व को ग्यापन देने हेतु गए थे।
चलिए इस बात की जाँच हो सकती है कि वो क्यों गए थे और शुरूआत किसकी तरफ से हुई लेकिन घटना के दूसरे ही दिन संसद में जो कुछ हुआ उससे एक बार साबित हुआ कि केंद्र में ललबबुआ खासे अहमियत रखते हैं। दूसरे ही दिन संसद के दोनों सदनों में इस घटना पर चर्चा हुई और भाजपा संघ कार्यकर्ताओं की निंदा की गई। बिना किसी जाँच के संघ कार्यकर्ताओं को दोषी करार दे दिया गया। बहरहाल मजा तो देखिए इस पूरी घटना के जद में जो वजह थी उस वजह पर चर्चा पर दोनों ही पीठासीन अधिकारियों ने इंकार कर दिया। अब इसको किस तरह से जायज ठहराया जा सकता मुझे नहीं पता। कम से कम केरल में राजनीतिक हिंसा और उसको काबू करने में राज्य सरकार की असफलता और केवल केरल ही क्यों बाँकि वामपंथी राज्यों में भी ऐसी घटनाएं लगातार होती रहती हैं उन सब पर चर्चा किया जाना वक्त की माँग थी। बहरहाल हमें पीठासीन अधिकारियों के फैसले पर तो शक करने का कोई अधिकार नहीं है लेकिन मुझे नहीं लगता है कि ये उचित है। जब भी वामपंथियों के खिलाफ कोई मुद्दा आता है उस पर उचित चर्चा नहीं हो पाती है। नंदीग्राम के मुद्दे को ही लें जिस पर पिछले दो तीन सत्रों से चर्चा नहीं हो पा रही है या नहीं होने दिया जा रहा है। लेकिन दिल्ली की घटना पर अगले ही दिन चर्चा हो गई। आखिर कौन नहीं जानता कि नंदीग्राम पर जिन तर्कों को लेकर शुरूआत में चरचा नहीं होने दी गई उसका कोई वजूद नहीं था। इस सत्र में उस पर चर्चा होनी है लेकिन अब तक नहीं हो पाई है। इन सब बातों पर आप क्या कहेंगे ?


भाजपा का आरोप है कि पिछले एक महीने में केरल के कन्नूर इलाके में उसके तीस से भी ज्यादा कार्यकर्ताओं की ह्त्या कर दी गई है। सदन में संघ परिवार और भाजपा की तो निंदा की गई लेकिन भाजपा के इस मांग को नहीं माना गया कि इस पूरे घटना की न्यायिक जाँच करा ली जाए और एक सर्वदलीय कमिटी केरल जा कर हमारे आरोपों की जाँच करे। आखिर राज्य की ही बात है तो फिर गुजरात दंगों के बाद एक सर्वदलीय कमिटी राज्य का दौरा करके आई थी। केरल के मामले में ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा है। ज़ाहिर है कोई भी विवेकशील व्यक्ति इस बात से इंकार नहीं कर सकता है। लेकिन जब राजनीतिक मजबूरी हो तो भला विपक्ष को दाम देने की क्या जरूरत है। खैर चुनावी साल है भाजपा को ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है।लेकिन जिस तरह से लोकताँत्रिक प्रक्रियाओं और मर्यादाओं को ताक पर रखा जा रहा है उससे नुकसान किसी का नहीं भारत का है। वामपंथी दल राजनीतिक हिंसा के लिए पहले से ही बदनाम रहे हैं चाहे केरल हो या पश्चिम बंगाल विपक्ष का चेहरा वामपंथियों को लाल कर देता रहा है। ऐसे में भाजपा के आरोप में दम नहीं है ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। पश्चिम बंगाल में तो काँग्रेस और तृणमूल सब झेलते रहे हैं।
मजे की बात तो ये है कि कल तक देश की आजादी तक को स्वीकार न करने वाले लोकतंत्र की हँसी उड़ाने वाले ये वामपंथी आज सबसे लोकतांत्रिक मर्यादाओं की बात करते हैं। केंद्र में सरकार चलाना है,,, कांग्रेस भी मजबूर है क्या करे। इससे क्या फर्क पड़ता है कि लाल हमेशा उन पर आंखे लाल किए रहे। लालबाबू मरोड़ते रहिए कांग्रेस की बाँह..... मौका मिले तो गरदन भी मिलेगा।

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