सोमवार, 28 दिसंबर 2009

झारखंड की सियासत - बोए पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होए


रत्नगर्भा की चुनावी जंग का परिणाम आ गया। कौन जीता , कौन हारा ? कहना आसान नहीं । भाजपा जो सबसे बड़ी पार्टी थी , कभी उसके पास दो दर्जन से ज्यादा विधायक थे ... आज भी सबसे बड़ी पार्टी है लेकिन उसके विधायकों की संख्या घट कर दो दर्जन से भी कम हो गई। कांग्रेस नौ सीटिंग विधायकों में से सात के हार जाने के बाद भी बाबु लाल मरांडी के सहयोग से अपना आंकड़ा पंद्रह तक ले जा पाने में सफल रही। उधर भाजपा की सहयोगी जनता दल युनाइटेड छह से घटकर दो तो राजद अपना आंकड़ा तकरीबन बरकरार रख पाने में सफल रही। निर्दलीयों को बहुत अधिक झटके लगे हों ऐसी बात नहीं। तकरीबन सभी जिन्होंने भंग विधानसभा में अपने जलवे बिखेरे थे एक फिर जीत के साथ विधानसभा प्रवेश की तैयारी कर रहे हैं। उधर सुदेश महतो की आजसू ने भी अपने ताकत बढ़ाए हैं। इन सबमें झारखंड मुक्ति मोर्चा सबसे अधिक मजबूत हुआ है। अगर बाबुलाल मरांडी को छोड़ दें तो।


इस आंकड़े का कई लोग अपनी अपनी तरह से विश्लेषण कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं कि कांग्रेस और जेवीएम सबसे बड़े गठबंधन के तौर पर जीत कर सामने आई लेकिन भाजपा हार कर भी सरकार बनाने की दौड़ में सबसे आगे चल रही है। ये कुछ वैसा ही है जैसा कि पिछले विधानसभा में हुआ था। भाजपा जद यू गठबंधन ३६ सीट लेकर भी महज पांच सीटों के फासले से सरकार बना पाने में असफल रही थी। जबकि कांग्रेस और राजद क्रमश नौ और सात सीट लेकर भी सरकार बना ले गए थे। कहने की जरूरत नहीं कि इसके लिए सियासत के कौन कौन से अदाएं झारखंड ने देखे। इस बार कांग्रेस के दांव पेंच से ही भाजपा ने कांग्रेस को चारो खाने चित्त कर दिया। कहते हैं न बोए पेड़ बबुल का तो आम कहां से होए। सबसे बड़े गठबंधन के बाद भी कांग्रेस मूंह फाड़े देखती रही , भाजपा शिबू को लेकर उड़ गई।




दरअसल जो अब हो रहा है , उसकी नींव बहुत पहले पड़ चुकी थी। शिबू सोरेन और कांग्रेस की बीच असहमति के बीज बहुत पहले बोए जा चुके थे। अमेरिका के साथ परमाणु करार के मुद्दे पर जब कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन को विश्वास मत का सामन करना था तब शिबु सोरेन ही उसके तारणहार बने थे। इसके बावजुद केंद्र में उस वक्त उन्हें कोई बड़ा पद नहीं मिला था। बाद में गुरू जी की जीद पर उन्हें झारखंड में मुख्यमंत्री पद से नवाजा तो गया लेकिन उनको सबक सिखाने के लिए भी कांग्रेस और राजद जैसी पार्टियों ने कमर कस लिया था। लिहाजा छह महीने के भीतर विधानसभा की सदस्यता लेने की संवैधानिक बाध्यता के तहत जब गुरू जी ने तमाड़ से चुनाव लड़ने का फैसला किया तो यूपीए के भीतरघात की वजह से वो चुनाव हार गए। ये कांग्रेस और शिबु के रिश्ते में खटास बड़ाने में अहम मोड़ साबित हुआ। जानकार बताते हैं कि विधानसभा चुनाव प्रक्रिया की शुरूआत के बाद इतना कुछ होने के बाद भी शिबु सोरेन चाहते थे कि कांग्रेस राजद और जेएमएम साथ मिलकर चुनाव लड़े। वो मानसिक रूप से इसके लिए तैयार भी थे लेकिन कांग्रेस ने झारखंड में शिबु सोरेन की हार को गुरू जी की राजनीतिक कैरियर का अंत मानते हुए बाबुलाल मरांडी के रूप में नया सहयोगी ढुढ़ लिया। अंत तक कुछ बाते ऐसी हुईं जिसमें कुछ लोग बताते हैं कि गठबंधन के लिए गुरू जी को धमकी तक दी गई जिससे नाराज़ होकर उन्होंने अकेले जाने का फैसला किया। इस बीच गुरू जी अपने पुराने रूठे हुए कुछ सहयोगियों मसलन सूरज मंडल जैसों को मना कर नई रणनीति बुनने में लग गई। हालांकि सूरज मंडल खुद पड़ैय्याहाट से चुनाव हार गए लेकिन उनके झामुमो के साथ आने से संथाल परगणा में गुरू जी को काफी लाभ हुआ , खास तौर पर झामुमो के पुराने वोट बैंक को एकजूट रखने में ।


अब यहां से राजनीतिक लाभ हानि का दूसरा अध्याय प्रारंभ हुआ। कांग्रेस जेवीएम गठबंधन से सबसे ज्यादा नुकसान अगर किसी को हो सकता था तो वो जे एम एम और भाजपा थी। लिहाजा इन दोनों दलों ने सामने से तो नहीं , लेकिन परदे के पीछे आपस में मदद से चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया। इसमें ध्यान देने की बात है कि जेएमएम और जेवीएम दोनों के लिए संथाल परगणा और उत्तरी छोटानागपुर राजनीतिक हैसियत के लिहाज़ से महत्वपूर्ण थे। लिहाज़ा भाजपा ने ऐसे इलाके में कमज़ोर प्रत्याशी खड़े कर एक तरह से शिबू सोरेन को अंदर ही अंदर मदद किया। आप नतीजों के विश्लेषण से पाएंगें कि संथाल परगणा में अधिकांश सीटों पर ऐसा ही हुआ। मसलन मधुपुर जहां से भाजपा के राज पलिवार पिछली बार जीते थे वहां से दुबारा उन्हें न उतार कर राजनीतिक रूप से नौसखिया अभिषेक आनंद झा को टिकट देने के पिछे कहीं न कहीं झामुमो के हाजी हुसैन अंसारी को जीताने का लक्ष्य था। हुआ भी वही। जाहिर है जब अधिकांश सीटों पर चतुष्कोणीय मुकावला हो तो दो पार्टियों के आपसी समन्वय से सीट निकालना बहुत आसान रह जाता है। बहरहाल इसमें पेंच ये था कि भाजपा मान कर चल रही थी कि संथाल परगणा और उत्तरी छोटानागपुर जैसे कुछ इलाकों में आठ दस सीट गंवाने के बावजुद उसके पास कोयलांचल, कोल्हान और छोटानागपुर जैसे इलाकों से तकरीबन तीस सीटें आ जाएंगी और नीतिश के जलवे से दक्षिणी छोटानागपुर के इलाके जो बिहार से सटे हैं वहां से चार पांच सीटें जद यू को आ जाएंगी तो शिबू सोरेन को अपनी शर्तों पर सरकार में शामिल कर भाजपा की सरकार बना ली जाएगी। इसमें फार्मुला ये था कि दुमका से शिबु के बेटे हेमंत को जीता कर उप मुख्यमंत्री का पद दे दिया जाए और भाजपा का मुख्यमंत्री बना कर शिबु सोरेन को संयोजक बनाया दिया जाए। परिणाम आने के पहले भाजपा तकरीबन ये मान कर चल रही थी कि शिबु सोरेन इस पड़ाव पर अपनी राजनीतिक लाभ हानि के बजाए अपने बेटे और बहु के कैरियर को लेकर ज्यादा चिंतित होंगे लिहाजा बहु को कोई बढ़िया मंत्रालय और बेटे को डिप्टी सीएम देने के बाद उनको संयोजक जैसा कोई पद देने के बाद मनाना आसान होगा। इसके साथ ही ये मान कर भी भाजपा चल रही थी कि कांग्रेस से खर खाए बैठे गुरू जी उनके तरफ इतने पहल से तो मान ही जाएंगे।

अब परिणाम आने के बाद तीसरा अध्याय शुरू हुआ। इसमें शिबू के पास इतनी सीटें आ गईं कि उनको बिना खुश किए कोई भी दल या गठबंधन सरकार नहीं बना सकती थी। परिणाम ऐसा था कि कांग्रेस - जेवीएम, राजद , और शिबू प्राकृतिक तौर पर एक साथ आकर स्थायी सरकार की दिशा में पहल कर सकती थीं। ये स्वभाविक भी था लेकिन इसमें कई पेंच था। सबसे बड़ा पेंच था कि शिबु मुख्यमंत्री पद से नीचे मानने को तैयार नहीं थे। ये स्वभाविक भी था क्योंकि गुरू जी अपनी ताकत न केवल बचाने में सफल रहे थे बल्कि उससे आगे भी जा चुके थे। उधर कांग्रेस और जेवीएम स्वभाविक विजेता बन कर उभरी थी। लिहाजा कांग्रेस अब किंगमेकर से ज्यादा किंग बनने के सपने देख रही थी। ये भी स्वभाविक था। तीसरी तरफ बाबुलाल के लिए शिबू सोरेन उस कीमत तक ही पसंद थे जहां तक वो कांग्रेस जेवीएम को सरकार बनाने में समर्थन दे। उससे आगे इतनी सफलता के बाद न तो कांग्रेस और न ही जेवीएम शिबू को मुख्यमंत्री पद पर राजी हो सकती थी। ज़ाहिर है बाबुलाल अपनी भविष्य की राजनीति के लिए भी चिंतित थे। दूसरी तरफ कांग्रेस इस मुगालते में थी कि कैबिनेट में शिबू को एक पद देकर और बेटे को उप मुख्यमंत्री का पद देकर साथ ही विभिन्न मुकदमों का डर दिखाकर अपने साथ ला पाने में सफल रहेंगे। लेकिन जिस तरह गुरू जी ने मतगणना के दिन ही ये कहकर कि सरकार न तो दिल्ली में बनेगी और न ही रांची में बल्कि सरकार जिसे बनाना है वो बोकारो आए, अपने संकेत बिल्कुल साफ कर दिए। सफलता के रथ पर सवार कांग्रेस को इन संकेतों में समझने में देर हो गई।


अब बारी थी भाजपा की। जिसके पास राज्य में खोने के लिए कुछ भी नहीं था। ज़ाहिर है पिछले सात आठ सालों में जितने बूरे दिन भाजपा ने देखे हैं , इतने विधायक होने के बाद भी , उतने किसी ने नहीं देखे। लिहाजा शिबू के संकेतों को साफ साफ पड़ते हुए भाजपा ने पलटती बाजी को अपने नाम करने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई। जो पिछली बार कांग्रेस ने किया था बिल्कुल उसी अंदाज में भाजपा ने इस बार कांग्रेस को पटखनी दे दी। इसमें गुरू जी मुख्यमंत्री होंगे और आजसू के सुदेश महतो और भाजपा का एक एक डिप्टी सीएम होगा। राज्य में उसकी सरकार तो होगी।


इन सबमें बाबुलाल रह गए। सबसे ज्यादा सफलता हासिल कर भी विपक्ष में रहना पड़ा। कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि अगर बाबुलाल अकेले लड़े होते तो दो दर्जन से ज्यादा विधायक उनके साथ होते। अगर आपको लगता है कि झारखंड में सब कुछ सामान्य हो गया तो आपको भी सोचने के लिए कुछ बातें दे देता हूं। आखिर अब तक झारखंड में यूपीए की मुखालफत करने वाले बाबुलाल अंतिम वक्त में कांग्रेस की गोद में क्यों बैठे ? कांग्रेस के पुराने नौ विधायकों में से सात हार गए। हारने वालों में प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बालमुचू, विधायक दल के नेता मनोज यादव, राज्य में कांग्रेस का अल्पसंख्यक चेहरा फुरकान अंसारी, दिग्गज थामस हांसदा, बागुन सुम्ब्रई आदि बड़े बड़े नेता। फिर भी कांग्रेस का आंकड़ा एक दर्जन के उपर गया। मतदान के दिनों में आखिरी घंटों में मतदान का प्रतिशत पंद्रह से बीस फीसदी भागता रहा। ज़ाहिर है झारखंड में सोचने और लिखने के लिए बहुत कुछ है। आगे फिर कभी।