बुधवार, 30 दिसंबर 2009

हुंडरू फॉल -- मोबाइल कैमरे की नज़र से झारखंड का सौंदर्य

झारखंड विधानसभा चुनाव 2009 के दौरान डेड़ दो महीने मुझे झारखंड मेंं रहने मौका मिला था। सात आठ सालों से दिल्ली की भागदौड़ से यूं भी मन उबा ही रहता था। ऐसे में सोचा भी नहीं था कि झारखंड की चुनावी कवरेज हमारे लिए इतना रिफ्रेशिंग होगा। झारखंड प्रवास के दौरान न केवल राज्य की राजनीतिक हलचल और चुनावी गतिविधियों पर हमारी नजर थी बल्कि हमारी नज़र राज्य के अकूत प्राकृतिक सौंदर्य पर भी था। समय मिलते ही हमलोग काम को झटक कर निकल पड़ते प्रकृति की गोद में घंटों बैठने के लिए। ऐसे ही एक दोपहर मैं अपनी टीम के सात आठ लोगों के साथ निकल पड़े थे रांची के पास ही स्थित हुंडरू फॉल को देखने। सोचा था कि शायद बेहद भीढ़ होगी, लेकिन उम्मीद के विपरीत इतनी शांत जगह, इतन सुरम्य वातावरण, और इतना ज्यादा प्राकृतिक माहौल कभी देखने को नहीं मिला था। समस्या ये थी कि हम लोग बगैर किसी तैयारी के ही निकलते थे लिहाजा फोटो ग्राफी के लिए कैमरे वगैरह का इंतजाम नहीं होता था लेकिन हाथ में एक छोटा सा मोबाइल था, उससे ही कुछ फोटो उतार लाए थे।                                                                                            
हुंडरू जल प्रपात - रांची
 झारखंड प्रवास के दौरान न केवल राज्य की राजनीतिक हलचल और चुनावी गतिविधियों पर हमारी नजर थी बल्कि हमारी नज़र राज्य के अकूत प्राकृतिक सौंदर्य पर भी था। दिल्ली से हम लोग तीन चार समूह में राज्य की चुनावी रिपोर्टिंग के  लिए झारखंड में थे। दो टीमेेें हम लोग आस पास थे लिहाजा बेहद व्यस्त चुनावी कवरेज से समय चुरा कर हम थोड़ा बहुत घुम भी आते। मजे की बात ये थी कि मैं झारखंड का वाशिंदा होने के बाद भी झारखंड को इतना करीब से नहीं देख पाया था जितने करीब से व्यस्त चुनावी रिपोर्टिंग से समय चुरा कर घुमने वक्त देख पाया। मैंने अपने जीवन के शुरूआती तकरीबन 25 साल राज्य के संथाल परगना इलाके में गुजारे थे लेकिन मुझे झारखंड के छोटानागपुर या कोल्हान इलाकों के बारे में शहरों के नाम के अलावा ही शायद कुछ पता था। पहली बार इन इलाकों में घुमने, लोगों से बात करने और इन सबसे बढ़कर उन इलाकों की प्राकृतिक      खुबसुरती को इतने करीब से देखने का मौका मिला।                                                                          


दो महीनों में तो शायद हजारों तस्वीर बनाने के मौके मिले थे लेकिन चूंकि ऐसी कोई तैयारी थी नहीं, लिहाजा छोटे से मोबाइल फोन के जरिए जितनी तस्वीरें बना पाया, उनको सुरक्षित रख लिया गया। मैं झारखंड का था लिहाजा बहुत कुछ सुना सुनाया सा था लेकिन मेरे साथ जो लोग थे उनमें से आधिकांश अन्य राज्यों के थे... उनके मूंह से झारखंड की प्राकृतिक सुंदरता की तारीफ सुनने में मजा भी आता था लेकिन इन खुबसुरत जगहों के लिए राज्य सरकार के प्रयास की नाकाफी पर भी उनका लंबा चौड़ा भाषण सुनने को मिलता था। इसी क्रम में एक दोपहर हमारा कारवां पहुंच गया रांची के पास हुंडरू जल प्रपात देखने।



हुंडरू फॉल तक पहुंचने के लिए सीढियों के माध्यम से नीचे उतरना पड़ता है। मुहाने तक लाकर आपकी गाड़ी खडी हो जाती है और आप नीचे जाते हैं। खैर गाड़ी से उतर कर हमने आस पास देखा... झोपड़ियों के बने दो तीन खाने पीने के छोटे छोटे ढाबे जैसे थे। नीचे जाने से पहले मुझे लगा कि खाने पीने का इंतजाम कर लिया जाए। मैंं उनमें से एक झोपड़ी में अंदर गया और खाने पीने के बारे में बात की। स्थानीय लोगों ने बताया कि देशी या जंगली मुर्गा आसानी से उपलब्ध हो जाएगा लिहाज सबने कहा कि देशी मुर्गा का ही मजा लिया जाए तो हमने उन्हेंं मुर्गा और चावल की व्यवस्था करने को कहा औऱ कहा कि नीचे से लौट कर आते हैं, फिर खाएंगे। तब तक आप इंतजाम कर लीजिए। इसके बाद हम सभी नीचे प्रपात देखने चल पड़े।

उतरने वक्त तो हमारा ग्रुप पूरी तरह उत्साह से लबरेज था। धपा धप सीढ़िया उतर रहा था। हर किसी को जल्दीबाजी थी प्रपात के नीचे पहुंचने की। तकरीबन बीस मिनट सीढ़ियां उतरने के बाद हम नीचे प्रपात के पास पहुंच गए।  कुछ सीढ़ियां उतरने के बाद ही हवा ठंडी हो चली थी और पानी के चट्टानों से टकराने के बाद उत्पन्न आवाज हमें और तेजी से सीढ़ियां उतरने के लिए आकर्षित भी कर रहा था। बहरहाल एक चट्टान पर बैठ हम सभी पानी के चट्टान से टकराने की आवाज में खो गए थे।

काफी देर यूं बैठे रहने के बाद देखा दूबे जी अपने कपड़े उतार चुके थे, एक आध कैमरा असिस्टेंंट भी नहाने की मुद्रा में आ चुके थे। मैंं यूं ही बैठे बैठे चट्टान पर ही लुढ़क गया। एक तो जाड़े का दिन उपर से आसमां से बरसती शरद की धूप अपना असर दिखा चुकी थी। शरीर पर आलस हावी होने लगा था। आराम से चट्टान पर आसमां की ओर निगाह किये अलसायी शीत की धूप का मजा लेने लगा। भाई लोग चट्टान के नीचे बने कूंड नुमा तालाब में उपर चट्टाने से गिरती धारा के नीचे जल क्रिड़ा का आनंद लेने में व्यस्त हो चुके थे।

यूं ही प्रकृति की उस नीरवता में चट्टान पर लेटे लेटे कब आंख लग गई पता ही नहीं चला। पता नहीं कुछ मिनटों की बड़ी गहरी नींद आई। आंख खुली तो भाई लोग वापसी में सीढ़ियां चढ़ने के लिए तैयार हो चुके थे। अपन भी उठ लिए और चल पड़े वापस। भूख भी लग रही थी। मेरा ये हाल था तो पता नहींं जो लोग नहा चुके थे उनका क्या हाल रहा होगा। बहरहाल अब वापस उन सीढ़ियों को चढ़ना किसी चुनौती से कम नहीं था। लेकिन मजे में हम लोग वापस भी हो लिए। सीढ़ियों को चढ़ने के क्रम में भूख दोगुनी चार गुनी हो चुकी थी। ऐसे में उपर बैठ उस भाई का सहारा ही था। मन में ये आशंंका भी थी कि क्या पता पहुंचने के बाद खाना मिलने में देर न हो जाए। क्योंकि अब इंतजार करने तक का धैर्य नहीं बचा था। खैर उपर भी पहुंच गए। हमें देखते ही उस झोपड़ी नुमा ढाबे में हलचल और तेज हो गई।

जल्दी जल्दी चौकी बिछाया गया। सखुवा के पत्ते की थाली सजी। दूबे जी बेचारे अलग थलग बैठ गए। उनके लिए भी दाल चावल सब्जी, अचार, पापड़ का इंतजाम था। हमलोग शहरी अदा से भोजन करने का मन लेकर बैठे थे कि दो एक पीस मुर्गा मिलेगा चावल के साथ। लेकिन ये क्या ढाबे वाले भाई साहब ने पत्ते पर पहले चावल रखा और फिर दे दना दना मुर्गा और झोर डालना शुरू किया। हम भी टूट पड़ेे। एक तो भूख और उपर से आ रही खुशबू हमें बेचैन बना रही थी। जमाने बाद ऐसा स्वादिष्ट भोजन इतना छक कर खाया। ढाबे वाले ने हमारे लिए भी मुर्गा भात के अलावा दाल, बरी, पापड, दही आदि का भी इंतजाम किया था। टूट कर भोजन हुआ। बीच बीच में भाई लोग आपस में भोजन की तारीफ में एकाध शब्द भी खर्च कर रहे थे। खैर भोजन करने के बाद जब हम पहुंचे ढाबे वाले के पास बिल चुकाने को तो सात आदमी के भरपेट स्वादिष्ट भोजन की कीमत उसने बताई सिर्फ तीन सौ रुपये। हम सभी आश्चर्यचकित रह गए। पहले तो भोजन बनाने वाले की दिल खोल कर तारीफ की और फिर पॉकेट में मौजुद हजार रुपये का नोट उससे विदा लिया। और हम निकल पड़े रांची की ओर वापिस।