मंगलवार, 3 जून 2014

अफसरों को साधना जरूरी !

आर्थिक मामलों के आला अफसरों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रस्तावित बैठक  सरकार के लिए अगले 100 दिन की कार्ययोजना बनाई जाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। प्रधानमंत्री ने पिछले सप्ताह अच्छे प्रशासन के लिए 10 सूत्री खाका तैयार किया था जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, जल, उर्जा व सड़क क्षेत्रों के साथ साथ बुनियादी ढांचा तथा पर्यावरण क्षेत्र में सुधारों को शीर्ष प्राथमिकता देने की बात सामने आई है। इसके बाद नरेंद्र मोदी सभी मंत्रालयों से 100 दिन की कार्ययोजना बनाने को कहा था। 

इस बैठक को इस संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिसमें नरेंद्र मोदी ने प्रशासन और सार्वजनिक सेवा को कसने और उन्हें जनोपयोगी बनाने का वादा किया था। सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री इस बैठक में अपनी अपेक्षाएं आला अफसरों के सामने रख सकते हैं और सचिवों से उनके अनुसार विस्तृत कार्य योजना बनाने को कह सकते हैं। विभिन्न विभागों के सचिवों को बैच (समूहों) में जोड़ दिया गया है। वित्त मंत्रालय में सभी सचिव बैच-ए में होंगे जबकि बिजली, पेट्रोलियम, कोयला, अक्षय उर्जा तथा खान मंत्रालयों के आला अफसर बैच-बी में आएंगे। जबकि बुनियादी ढांचे से जुड़े सभी मंत्रालय के आला अफसर ग्रुप सी का हिस्सा होंगे। इस तरह ए से जी तक के सात समूह बनाए गए हैं जिनसे प्रधानमंत्री बारी बारी से मुलाकात करेंगे। इसके अतिरिक्त दो अन्य समूह भी बनाए गए हैं। प्रत्येक समूह के लिए दस मिनट का समय निर्धारित किया गया है जिसमें उन्हें दस दस बिन्दुओं का स्लाइड प्रेंजेंटेशन का वक्त दिया गया है। 

ऐसा माना जा रहा है कि सचिवों को पिछली सरकार की सफलताओं और विफलताओं का ब्यौरा दिए जाने के साथ साथ अगले पांच साल की कार्ययोजना का ब्यौरा दिए जाने को कहा जा सकता है। ज़ाहिर है, अपने भविष्य की कार्ययोजना के तहत आला अफसरों की ओर से अपने अपने मंत्रालयों के लंबित मुद्दों का ज़िक्र भी उठ सकता है। जानकार मानते हैं कि लंबित मुद्दों के त्वरित निपटारों के साथ ही बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं को तयशुदा वक्त में पूरा कर आर्थिक वृद्धि को गति प्रदान करने के संकेत इस बैठक से उभर कर सामने आ सकते हैं। 

ज़ाहिर है आने वाले वक्त में सरकार के कामकाज की रूपरेखा और ऐजेंडा इस बैठक के बाद ही तय हो पाएगा। लिहाज़ा इस हिसाब से इसी संदर्भ में इस बैठक को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 

शुक्रवार, 30 मई 2014

मोदी के महारथी - जेटली, गडकरी और नायडू

अरूण जेटली -भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व में शायद कुछ ही नेता ये दावा कर सकते हैं कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आंख और कान हैं। 2002 के बाद के परिदृश्य में जब कभी नरेंद्र मोदी की राह में मुश्किलें बढ़ी, अरूण जेटली ने हमेशा उन मुश्किलों का सामना करने में नरेंद्र मोदी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

यही वजह है कि पहली बार लोकसभा के मुश्किल महासमर में उतरे  इकसठ वर्षीय अरूण जेटली के लिए परिणाम सकारात्मक न होने के बाद भी प्रधानमंत्री ने उन्हें वित्त, कंपनी मामले और रक्षा मंत्रालय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। अरूण जेटली जन नेता कभी नहीं रहे लेकिन एक रणनीतिकार के तौर पर पार्टी में उनका कोई सानी नहीं है। यही वजह है कि केवल भाजपा के अंदर ही नहीं बल्कि अन्य दलों के भीतर भी अरूण जेटली को लेकर बेहद सम्मान है। 2014 के चुनावी महासमर में भी जहाँ चुनाव प्रचार बहुत हद तक व्यक्तित्व केंद्रित था , अरूण जेटली अमृतसर के अपने चुनावी अभियान से इतर अपने चुनावी डायरी और ब्लाग्स के जरिए नरेंद्र मोदी के महारथी की भूमिका बखुबी निभाई।
 पेशे से बड़े वकील माने जाने वाले अरूण जेटली पार्टी के लिए ऐसा चेहरा बन गए हैं जो एक ही वक्त में बाज़ार में सुधारवादी एजेंडे और संघ के पारंपरिक एजेंडे दोनों पर ही बखुबी चल सकते हैं। निस्संदेह अरूण जेटली प्रगतिशील और आधुनिक विचारों से लैस एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर जाने जाते हैं जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कसी हुई सरकार और चुस्त प्रशासन के एजेंडे को बखुबी अमल में लाते हैं। 
पंजाब के एक ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाले अरूण जेटली को राजनीति विरासत में नहीं मिली थी। सत्तर के दशक में अरूण जेटली का राजनीतिक सफर संघ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से शुरू हुआ और 1974 में वो दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संगठन के अध्यक्ष चुने गए। केंद्र की तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के भ्रष्टाचारी और तानाशाही रवैय्ये के विरोध में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरू किए गए संपूर्ण क्रांति आंदोलन में अपनी सक्रियता की वजह से अरूण जेटली को तकरीबन दो साल जेल में बिताने पड़े। न केवल राजनीति के क्षेत्र में अपनी सक्रियता से अरूण जेटली ने अपनी पहचान बनाई बल्कि कानून के पेशे में वरिष्ट अधिकवक्त के तौर पर भी उन्होंने बखुबी नाम कमाया। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में अरूण जेटली को कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी दी गई। गुजरात में 2002 और फिर 2007 में नरेंद्र मोदी के चुनावी प्रचार के लिए भी अरूण जेटली ने महत्वपूर्ण रणनीतिकार की भूमिका निभाकर केंद्रीय स्तर पर उन्हें एक सर्वमान्य नेता के तौर पर खड़ा करने का भी खाका खिंचा। ज़ाहिर है अभूतपूर्व जनादेश प्राप्त करने के बाद सरकारी नीतियों को ज़मीन पर उतार पाने में उनकी भूमिका आने वाले समय में महत्वपूर्ण होगी।
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 नितिन गडकरी -  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में नितिन गडकरी एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनके लिए अभिनव दृष्टिकोण वाले उपयुक्त प्रशासक सबसे उपयुक्त विशेषण है । ये अनायास नहीं था कि महाराष्ट्र की राजनीति में लो प्रोफाइल रहने वाले नितिन गडकरी ने सबसे कम उम्र में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का मुकाम हासिल किया। लोकसभा के महासमर में नितिन गडकरी नागपुर सीट से चुन कर पहली बार आए हैं। एक ऐसी सीट जो कांग्रेस की परंपरागत सीट मानी जाती रही है। कांग्रेस के प्रत्याशी विलास मुत्तमवार जो लगातार सात बार से इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, गडकरी ने उन्हें तकरीबन तीन लाख मतों के अंतर से मात दी है। आजादी के बाद से नागपुर सीट सिर्फ एक बार भाजपा के खाते में आई जब बनवारी लाल पुरोहित पार्टी के टिकट पर चुन कर आए थे। निस्संदेह नितिन गडकरी की इस जीत के मायने बहुत हैं। यही नहीं पूरे महाराष्ट्र में भाजपा शिव सेना गठबंधन ने 48 में से 42 सीटों पर सफलता अर्जित की जिसमें विदर्भ इलाके की सभी दस सीटें शामिल हैं। 

अपने काम करने के अभिनव तरीकों के लिए जाने जाने वाले नितिन गडकरी के राजनीतिक जीवन की शुरूआत छात्र के नेता तौर पर अखिल भारतीय विधार्थी परिषद से हुई। आरएसएस के विचारों से गहरे प्रभावित नितिन गडकरी बाद में भाजपा युवा मोर्चे में शामिल हुए। 1975 में इंदिरा गांधी की ओर से आपातकाल की घोषणा उनके जीवन के लिए अहम मोढ़ साबित हुआ जिसके बाद उन्होंने अपने वकालत के पेशे को ठुकराकर समाजसेवा के क्षेत्र में कदम रखा। पहली बार लोकसभा में कदम रख रहे गडकरी ने महाराष्ट्र की प्रदेश राजनीति में बतौर मंत्री और विधान परिषद में नेता विपक्ष के तौर पर लंबा सफर तय किया है। मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्में 57 वर्षीय नितिन गडकरी ने अपने विकास कार्यों के जरिए अपने शहर को एक नया चेहरा प्रदान कर पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर न केवल लोगों का ध्यान खिंचा बल्कि पीडब्ल्यूडी मंत्री के तौर मुंबई में बनाए गए फ्लाईओवरों की बदौलत फ्लाईओवर मैन का उपनाम भी हासिल किया।  मुंबई - पुणे एक्सप्रेस हाइवे की सफलता ने प्रधानमंत्री वाजपेयी का ध्यान भी खिंचा और इन्हें राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण का खाका खिंचने की जिम्मेदारी दी गई। निस्संदेह बुनियादी ढांचे के निर्माण और उनके अभिनव कार्यशैली की बदौलत ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें सड़क परिवहन, राजमार्ग और जहाज रानी मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एजेंडे और विजन में इन मंत्रालयों की भूमिका महत्वपूर्ण होनी है लिहाज़ा सबकी नज़रे भी नितिन गडकरी की ओर है कि आखिर उम्मीदों के बोझ तले वो कितना खरा उतर पाते हैं।
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 एम वेंकैया नायडू -   मुप्पावारामु वेंकैया नायडू भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष। आप उन्हें दक्षिण भारत में भाजपा का चेहरा कह सकते हैं। अपनी चतुराई और बेहतरीन संवाद कौशल के लिए जाने जाने वाले वेंकैया नायडू के लिए ये दूसरा मौका है जब केंद्रीय मंत्रिमंडल में उन्हें महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में शहरी विकास और संसदीय कार्यमंत्रालय की जिम्मेदारी खुद ही पार्टी के भीतर और बाहर उनके राजनीतिक कद की कहानी है। इससे पहले अटल जी की कैबिनेट में उन्हें ग्रामीण विकास जैसे अहम ओहदे की जिम्मेदारी दी गई थी। जानकार उस दौरान उन्हें ग्रामीण विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के प्रवर्तक के रूप में याद करते हैं।    

1 जुलाई 1949 को आंध्र प्रदेश के नेल्लौर ज़िले के चावटपालेम गांव के एक कम्मा परिवार में जन्में श्री नायुडू अल्पायु में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंद्ध हो गए थे। अपना राजनीतिक सफर उन्होंने अखिल भारतीय विधार्थी परिषद से तब शुरू किया जब 1973 - 74 में उन्हें आंध्र विश्वविद्यालय छात्र संघ का अध्यक्ष चुना गया। 1972 में शुरू किए जय आंध्र आंदोलन के दौरान उनकी महत्वपूर्ण भूमिका ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खिंचा। के वेंकेटरत्नम ने विजयवाड़ा से इस आंदोलन का नेतृत्व किया था जबकि वेंकैया नायडू नेल्लोर में इस अभियान में खासे सक्रिय थे। सन 1974 में श्री नायडू लोकनायक जयप्रकाश नारायण छात्र संघर्ष समिति के प्रदेश संयोजक बनाए गए और आपातकाल के खिलाफ देशव्यापी अभियान का हिस्सा बने। 1977-80 तक उन्हें भाजपा युवा मोर्चा का अध्यक्ष बनाया गया। दो बार राज्य के उदयगिरी विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करने वाले वेंकैया नायडू तीन बार से पड़ोसी राज्य कर्नाटक से राज्य सभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। तेलंगाना और सीमांध्र के रूप में अलग राज्यों के उदय के बाद ज़ाहिर है वेंकैया नायडू के सामने अपनी नई भूमिका में इन राज्यों की आकांक्षाओं को पूरा करने की भी अतिरिक्त जिम्मेदारी होगी।

मोदी के महारथी - सुषमा स्वराज

भाजपा में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के मुद्दे पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में मतभेद की खबरें खुलकर सामने आ रही थीं। सुषमा स्वराज का नाम भी उन संतुष्टों में लिया जा रहा था। लेकिन कहते हैं कि राजनीति में अनुभव का अपना कद होता है। देश की नई विदेश और अप्रवासी मामलों की मंत्री सुषमा स्वराज के संबंध में ये कथन कहीं न कहीं बड़ा ही सटीक मालुम पड़ता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संभवत इसी राजनीतिक कद को देखते हुए सुषमा स्वराज़ को इतनी महत्ती जिम्मेदारी सौंपी है।

 पार्टी के पितृपुरूष और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर से ही सुषमा स्वराज पार्टी की दूसरी पीढ़ी के नेताओं के बीच अग्रिम पंक्ति की नेता मानी जाती रही हैं। अंग्रेजी और हिन्दी दोनों ही भाषाओँ की मुखर वक्ता के रूप में मशहूर सुषमा स्वराज सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक की भी पसंदीदा नेत्रियों में से एक हैं। स्वदेशी आंदोलन और अन्य सांस्कृतिक मुद्दों पर अपनी मुखर विचारों के लिए जानी जाने वाली सुषमा स्वराज ने  सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने के मुद्दे पर भी अपने कठोर रूख की सार्वजनिक अभिव्यक्ति के ज़रिए राष्ट्रवादियों की खूब तारीफ बटोरी थी। उससे पहले 1999 में कर्नाटक के बेल्लारी सीट पर हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ खड़े होने के फैसले और उनके धुआंधार प्रचार अभियान ने  , हार के बावजूद भी सुषमा जी के राजनीतिक कद में बढ़ोत्तरी ही की। 

राजनीति में सुषमा स्वराज़ का सफर भी कम लोमहर्षक नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यकर्ता के घर में जन्म लेने वाली सुषमा स्वराज का राजनीतिक सफर छात्र संगठन अखिल भारतीय विधार्थी परिषद से 1970 में शुरू हुआ था। पहली बार अंबाला कैंट से जीत कर हरियाणा विधानसभा पहुँची सुषमा स्वराज ने चौधरी देवीलाल की सरकार में सबसे कम उम्र में कैबिनेट मंत्री बनने का भी गौरव हासिल किया। सुषमा स्वराज का ये सफर यहीं नहीं रूका , उन्हें सत्ताइस साल की छोटी से उम्र में जनता पार्टी प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनाया गया और 1987-90 के बीच राज्य में बनी भाजपा लोकदल गठबंधन की सरकार में शिक्षा मंत्री बनाईं गईं। बाद में राज्यसभा के जरिए राष्ट्रीय राजनीति में उनका पदार्पण हुआ। वो 1996 में 11 वीं लोकसभा चुनाव में दक्षिणी दिल्ली सीट से जीत कर लोकसभा पहुंची। तेरह दिन के लिए बनी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार में सुषमा स्वराज ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय का जिम्मा संभाला। हालांकि 1998 में वाजपेयी जी के तेरह महीनों वाली सरकार में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देकर दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री होने का जिम्मा संभाला। हालांकि इसके बाद भी दिल्ली में पार्टी की करारी हार को वो संभाल नहीं पाईं। बाद में उन्हें केंद्र सरकार में स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के अभूतपूर्व जीत के पहले तक श्रीमति स्वराज लगातार लोकसभा में नेता विपक्ष के पद पर रहकर कांग्रेस की नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की मुखर आलोचना की जिम्मेदारी निभाती रही हैं। सुषमा स्वराज के सौम्य व्यक्तित्व के बीच उनका ओजस्वी भाषण देश के सामने मौजुद नेताओं की पीढ़ी में उन्हें एक अलग मुकाम देता है।

मोदी के महारथी - राजनाथ

कभी अटल बिहारी वाजपेयी की संसदीय सीट रही लखनऊ से जीत कर लोकसभा पहुंचे राजनाथ सिंह, भाजपा के पालिटीकल हैविवेट माने जाते हैं। महज़ तेरह साल की उम्र में ही राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ जुड़ कर अपने सार्वजनिक जीवन की शुरूआत कर दी थी। बाद में लेक्चरर रहने के दौरान भी ये संबंध लगातार बरकरार रहा। नरेंद्र मोदी को मिले अभूतपूर्व जनादेश और भाजपा की सत्ता में अपने बूते वापसी के सफर में निस्संदेह पार्टी अध्यक्ष के तौर पर राजनाथ सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है लिहाजा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में उन्हें गृह मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील ओहदे की जिम्मेदारी मिली।  

बासठ वर्षीय श्री सिंह जिन्होंने वरिष्ठ नेताओं के विरोध के बाद भी पार्टी के अध्यक्ष के रूप में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए नरेंद्र मोदी के नाम की घोषणा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, निस्संदेह अब प्रधानमंत्री के विश्वस्थ महारथियों में शामिल होंगे। यही वजह है कि आने वाले वक्त में सरकार के एजेंडे पर भी उनकी व्यक्तित्व की चमक साफ देखी जा सकेगी।

दो बार भाजपा के अध्यक्ष रहे राजनाथ सिंह गोरखपुर के एक स्थानीय कालेज में भौतिकी के शिक्षक हुआ करते थे। यहां से पार्टी के एक सामान्य कार्यकर्ता के तौर पर शुरू हुआ उनका राजनीतिक सफर पार्टी के सर्वोच्च पद तक पहुँचने में कामयाब रहा। अपने राजनीतिक सफर में राजनाथ सिंह पहले राजनीतिक रूप से सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण माने जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और बाद में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र में बनी एनडीए सरकार में परिवहन और कृषि मंत्री के रूप में देश की सेवा की। राजनीति में राजनाथ सिंह का सफर निचले पायदान से शुरू होकर एक मुकाम तक पहुँचा है। हालांकि उनका राजनीतिक सफर कई उतार चढ़ाव का भी गवाह रहा। दिसंबर 2005 में लालकृष्ण आडवाणी के बाद  राजनाथ सिंह ने पार्टी अध्यक्ष का कार्यभार संभाला। हालांकि 2009 के लोकसभा चुनावों में भाजपा केंद्र में सत्ता में पहुंच पाने में न केवल असफल रही बल्कि 2004 लोकसभा चुनावों की तुलना में पार्टी को तकरीबन 22 सीटों को नुकसान भी झेलना पड़ा। 
दस जुलाई 1951 में उत्तर प्रदेश के चंदौली ज़िले के भभौरा गांव में जन्में राजनाथ सिंह ने गोरखपुर विश्वविद्यालय से भौतिकी में एमएससी तक की पढ़ाई करने के बाद 1971 में मिर्ज़ापुर के के बी पोस्ट डिग्री कालेज में लेक्चरर के रूप में नियुक्ति पाई थी। राजनाथ सिंह भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों में कई पदों पर रहे हैं। इसकी शुरूआत तब हुई जब 1969 में गोरखपुर में भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विधार्थी संगठन के संगठन मंत्री बनाए गए और 1974 में मिर्जापुर में भारतीय जनसंघ की जिला इकाई के सचिव बनाए गए। उसी दौर में राजनाथ सिंह ने  तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तानाशाही नीतियों के विरोध में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरू किये गए संपूर्ण क्रांति आंदोलन में खुद को झोंक दिया जिसकी वजह से इन्हें दो साल जेल में बिताने पड़े। अब तक राजनाथ सिंह की छवि एक ठोस और कर्मठ प्रशासक की रही है।