सोमवार, 28 जनवरी 2008

मुस्लिम आरक्षण - जुलाहों में लठ्मलठ्ठा

मुसलमानों को आरक्षण के सवाल पर एक बार फिर विवाद छिड़ गया है। इस बार विवाद कहीं और नहीं बल्कि यूपीए सरकार के कांग्रेसी मंत्रियों के बीच ही है। पिछले दिनों राज्यों के अल्पसंख्यक आयोगों की सालाना बैठक में केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने कहा कि अल्पसंख्यकों के विकास के लिए सरकार उन्हें आरक्षण देने का मन बना चुकी है। बस देखना ये है कि आरक्षण दिया कैसे जाए। लेकिन बैठक के बाद मीडिया से मुख़ातिब हुए केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने ये कह कर गृहमंत्री के ग़ुब्बारे की हवा निकाल दी कि धार्मिक आधार पर आरक्षण देने का कोई प्रस्ताव केंद्र सरकार के सामने विचारधीन नहीं है। इतने अहम मसले पर दो केंद्रीय मंत्रियों के परस्पर विरोधी बयान ये साबित करते हैं कि बात-बात में मुसलमानों के हितों का दम भरने वाली यूपीए सरकार उनके मसलों के हल के लिए कितना गंभीर है।
सरकार की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि दलित इसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के मसले पर सरकार के बीच ही तीखे मतभेद हैं। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री ए आर अंतुले और मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह दलित मुसलमानों को अनुसूचित जाति में शामिल करके आरक्षण के दायरे में लाने के हक़ में हैं। जबकि समाज कल्याण मंत्री मीरा कुमार इसके सख़्त ख़िलाफ़ हैं। सबसे ज़्यादा हैरान करने वाली बात ये है कि यूपीए सरकार की रहनुमाई करने वाली कांग्रेस की इस बारे में अपनी कोई राय नहीं है। 25 दिसंबर के कांग्रेस के प्रवक्ता और जाने माने वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कांग्रेस की नियमित प्रेस कांफ्रेस में क़ुबूल किया कि सरकार के सामने निकट भविष्य मे दलित इसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने का कोई प्रस्ताव विचारधीन नहीं है। उन्होंने तो यहां तक कह डाला कि जब तक इस मसले पर सभी राजनीतिक दलों के बीच आमराय क़ायम नहीं होती तब तक इस बारे में कोई फ़ैसला नहीं हो सकता। क्या कांग्रेस इस पर आमसहमति बनाने की कोई पहल करेगी ? इस सवाल पर वो चुप्पी साध गए। अभिषेक मनु सिंघवी के इस बयान से दो दिन पहले ही केंद्र सरकार ने इस बारे में फ़ैसला करे बताने के लिए सुप्रीम कोर्ट से आठ हफ्तों की मोहलत मांगी है। जब सिंघवी को ये याद दिलाया गया तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया कि जब संविधान सभा में इस पर सहमति नहीं बनी, पिछले साठ साल में मसला नहीं सुलझा तो आठ हफ्ते में आम सहमति कैसे बन सकती है।
कांग्रेस का ये रुख़ मुसलमानों ख़ासकर पसमांदा बिरादरियों के मुसलमानों के साथ अब तक का सबसे भद्दा मज़ाक है। कांग्रेस के प्रवक्ता कांग्रेस के मंच से इतना बड़ा झूठ बोलते हैं। आम सहमति का बहाना बना कर कांग्रेस इस अहम मसले को लगातार लटका रही है। लेकिन सच्चाई ये है कि दलित इसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने में न संवैधानिक अड़चन है और नहीं आम सहमति की बाधा है। कमी है तो सिर्फ यूपीए सरकार की राजनीतिक इच्छा शक्ति की। यूपीए के तमाम घटक दल मसलन आरजेडी, लोकजनशक्ति पार्टी, डीएमके, एनसीपी इसके हक़ में है। सराकर को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दल भी इस मसले पर अपनी रज़ामंदी दे चुके हैं। सीपीएम महासचिव प्रकाश कारत और बीएसपी प्रमुख मायावती बाक़ायदा प्रधानमंत्री को चिठ्ठी लिख कर कह चुके हैं कि सरकार विधेयक लाए तो समर्थन करेंगे। तीसरे मोर्चे में शामिल समाजवादी पार्टी, टीडीपी के साथ एआईएडीएमके भी समर्थन कर रही है। उधर बीजेपी के सहयोगी दल शिरोमणी अकाली दल और जनता दल यूनाइटेड भी दलित इसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने के हक़ में है। सिर्फ बीजेपी और शिवसेना ही इसका विरोध कर रहे हैं। 200 में बिहार विधान सभा और दिसंबर 2006 उत्तर प्रदेश विधानसभा इस आशय का प्रस्ताव पारित करके केंद्र को भेज चुकी हैं। और कितनी आम राय केंद्र की यूपीए सरकार को चाहिए। लेकिन हैरानी की बात ये है कि जिस मसले पर तमाम छोटे बड़े दल अपनी राय क़ायम कर चुके हैं और उसे ज़ाहिर भी कर चुके हैं, उस मसले पर देश की सबसे पुरानी और सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली पार्टी अभी तक अपना राय क्यों क़ायम नहीं कर पायी।
इस मसले पर फैसला करने में टालमटोल करने वाली यूपीए सरकार और कांग्रेस को क्या इतनी आम सहमति काफी नहीं लगती ? अगर नहीं तो और सुन लीजिए। प्रधानमंत्री की पहल पर बनी जस्टिस सच्चर कमेटी ने धार्मिक आधार पर आरक्षण में भेदभाव को ग़लत ठहराया है। जस्टिस रंगानथ मिश्रा आयोग ने अपनी रिपोर्ट में साफ साफ कहा है कि दलित इसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने से रोकना संविधान में दिए गए समता के अधिकारों यानि अनुच्छेद 14 और 15 का खुला उलंघन है। आयोग ने सरकार से दलित इसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की पुरज़ोर वकालत की है। आयोग ने तो यहां तक कह दिया है कि अगर इसमे कोई संवैधानिक बाधा हो तो उसे दूर करने के लिए संविधान में ज़रूरी संशोधन किया जाए। जस्टिस रंगनाथ आयोग की ये रिपोर्ट पिछले नौ महीनों से प्रधानमंत्री कार्यालय में धूल फांक रही है। इस रिपोर्ट पर अमल को लेकर सरकार लगातार बहानेबाज़ी कर रही है।
मार्च 2004 में दलित इसाईयों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके दलित इसाईयों के साथ दलित मुसलमानों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का रुख़ जानना चाहा। पहले तो सरकार टाल मटोल करती रही। दो तीन सुनवाई के बाद सरकार ने ये मामला भषाई अल्पसंख्यकों के मामले पर बने जस्टिस रंगनाथ आयोग को सौंपा। आयोग की रिपोर्ट आने तक सरकार को अच्छा बहाना मिल गया। मई 2007 मे आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंप दी। सरकार आयोग ने दलित इसाई और मुसलमानों को हक़ मे सिफारिश की। सरकार ने इस पर अनुसूचित जाति आयोग को भेज कर उसकी भी राय मांगी। अनुसूचित आयोग ने भी रंगनाथ आयोग की सिफारिश की हां मे हां मिलाते हुए 18 दिसंबर 2007 को अपनी रिपोर्ट समाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय को भेज दी। अनुसूचित जाति आयोग ने साफ कहा कि धर्म के आधार पर दलित इसाइयों और मुसलमानों को आरक्षण के दारे से बाहर रखना संविधान के ख़िलाफ़ है। इससे पहले एनडीए सरकार को दौरान बने संविधान समीक्षा आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ-साफ कहा था कि दलित इसाईयों और मुसलमानों को अनुसचित जाति का दर्जा देने में कोई संवैधानिक बाधा नहीं है। बाधा है तो सिर्फ़ एक, और वो है सरकार में राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी।
सवाल ये पैदा होता है कि कि आख़िर ये तमाम रिपोर्ट और तमाम राजनीतिक दलों को बीच इस मसले पर आमराय आख़िर कांग्रेस को नज़र क्यों नहीं आ रही। मुसलमानों के विकास के लिए आए दिन नई घोषणाएं करने वाली यूपीए सरकार आख़िर क्यों इस मसले पर टालमटोल कर रही है। इसका उत्तर इतिहास के गर्भ में छुपा है। 1996 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले तात्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव ने दलित इसाईयों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने के लिए बाक़ायदा विधेयक लाने की तैयारी की थी। सरकार में लंबे विचार विमर्श के बाद विधेयक लाना तय हुआ मगर तब के लोकसभा अध्यक्ष शिवराज पाटिल ने इसे पेश करने की इजाज़त नहीं दी। बाद में सरकार ने अध्यादेश जारी करने की कोशिश की मगर बीजेपी ने इस पर बवाल मचा दिया। बाक़ायदा राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा से मिलकर गुहार लगाई कि वो सरकार के इस अध्यादेश पर दस्तख़त न करें। सरकार डर गयी और क़दम पीछे खींच लिए। मगर 1996 के लोकसभा चुनाव मे कांग्रेस ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में बाका़यदा वादा किया था कि सत्ता मे आने पर वो दलित इसाईयों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिलाएगी। लेकिन अब कांग्रेस अपने वादे से मुकर रही है। आख़िर क्यों ? क्या इस डर से कि बीजेपी मुद्दा बनाएगी ? तो सरकार बताए कि कि उसने पोटा वापिस लेते वक़्त क्या बीजेपी की इच्छा का ख़्याल किया था। क्या उस वक़्त राजनीतिक आमराय के अनुरूप काम किया गया। यूपीए सरकार ने कई संविधान संशोधन कराए हैं। तो इस मामले मे संविधान संशोधन क्यों नहीं हो सकता ? अनुसूचित जातियों को पढ़ाई, सरकरी नौकरियों, विधानसभाओं और लोकसभा में आरक्षण देने वाले राष्ट्रपति के आदेश ने आज़ादी के बाद पिछले साठ साल से इसाई और मुसलमानों के एक बड़े तबके को उन तमाम सुविधाओं से महरूम रखा हुआ है जो दलितों को मिलती है। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित देश भर की विधानसभाओं की लगभग एक हज़ार और लोकसभा की 79 सीटों पर इन्हें चुनाव लड़ने का हक़ नहीं है। 1950 में जारी किए गए इस आदेश में पहला संशोधन 1956 में किया गया। इसके ज़रिए दलित सिखों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया गया। 1990 में दूसरा संशोधन करके नवबौद्धों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा दे दिया गया। अनुसूचित जाति के दरवाज़े नहीं खुल रहे तो दलित इसाई और मुसलमानों को लिए। ये धार्मिक आधार पर भेदभाव नहीं तो और क्या है ? इसमें कोई दो राय नहीं कि मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। सवाल उठता है कि धर्म के आधार पर किसी समुदाय विशेष को आरक्षण की सुविय़ा से वंचित रखना संविधान सम्मत है। अब देखना ये है कि क्या यूपीए सरकार में इतनी राजनीतिक इच्छाशक्ति है कि वो जस्टिस रंगनाथ आयोग की रिपोर्ट को लागू करे।
युसूफ़ अंसारी
(लेखक ज़ी न्यूज़ के सहायक संपादक हैं।)

शनिवार, 26 जनवरी 2008

तीन स्तंभ तीन रत्न


पद्म पुरस्कारों की घोषणा हो गई। ‍टेलिविजन मीडिया के तीन वरिष्ठ पत्रकारों राजदीप सरदेशाई, बरखा दत्त और विनोद दुआ के नाम भी इसमें शामिल हैं। पत्रकार होने के नाते उनकी ये उपलब्धि हम सब के लिए गर्व की बात है। मुबारकबाद और ढेर सारी शूभकामनाएं। इति

शनिवार, 12 जनवरी 2008

भाग दो ... ना ख़ुदा हमको डुबोते तो कोई बात न थी

...दरअसल पसमांदा बिरादरी के लोग शुरू से ही राजनीति के हाशिए पर रहे हैं। आज़ादी के समय से ज्यादातर रियासतों की बागडोर अगड़ी जातियों के मुसलमानों के हाथों में थी। रियासतों का राज्यों में विलय हुआ तो ये ही लोग राजनीति में आगे आए और पूरे मुस्लिम समाज का प्रतिनिधित्व करने लगे। इनके वर्चस्व की हालत यह थी कि संविधान सभा में एक भी पसमांदा बिरादरी का सदस्य नहीं था। शायद यही वजह रही कि मुसलमानों की इन बेहद पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल करने के लिए किसी मुस्लिम नेताओं ने जोर नहीं लगाया। जबकि सिख नेताओं ने सरदार पटेल और डा. राजेंद्र प्रसाद पर दबाव बनाकर सिख समुदाय की पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिला दिया था। आजादी के बाद भी मुस्लिम राजनीति का नेतृत्व अगड़ी जाति के नेताओं के हाथ में ही रहा है। अभी भी कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियों में तो अगड़ी जातियों के मुसलमानों का वर्चस्व है ही। पिछड़ी जातियों और दलितों की राजनीति करने वाली सपा, राजद, बसपा या फिर लोक जनशक्ति पार्टी तक में मुसलमानों के नाम पर तथाकथित ऊंची जातियों के मुसलमान ही ऊँचे ओहदे पर बैठे हैं। पसमांदा बिरादरी के लोगों को टिकट दिलाने में और उन्हें कोई अहम ज़िम्मेदारी देने में भी ये नेता ही सबसे ज़्यादा रोड़े अटकाते हैं। यही वज़ह रही है कि आजादी के बाद अभी तक किसी भी लोकसभा में पसमांदा बिरादरी के मुस्लिम सांसदों की तादाद दो अंकों तक भी नहीं पहुँची। किसी लोकसभा में इनकी तादाद दो , किसी में तीन रही तो किसी में चार या पांच रही। इससे ज़्यादा पसमांदा बिरादरी के सांसद कभी नहीं चुने गए।

आजादी के बाद से अब तक लोकसभा के लिए चार हज़ार से ज़्यादा सांसद चुने गए। इनमें से महज़ चार सौ ही मुस्लिम लोकसभा पहुंचे हैं। इनमें भी पसमांदा बिरादरी के महज़ साठ सांसद ही हुए हैं जिनमें से चौदह अंसारी बिरादरी से जबकि शेष अन्य पसमांदा बिरादरियों से हुए हैं। कई बिरादरियां ऐसी हैं जिनका कोई भी नुमाँइदां पिछले साठ साल में किसी लोकसभा, राज्यसभा या विधानसभा में नहीं पहुँचा है। आबादी के हिसाब से महिलाओं को आरक्षण की पुरज़ोर वकालत करने वालों का ध्यान कभी इस तरफ नहीं गया है या फिर इतनी बड़ी आबादी को माकूल राजनीतिक प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिल रहा है। अगर आबादी के हिसाब से देखें तो पंद्रह करोड़ मुसलमानों के लोकसभा में कम से कम बासठ मुस्लिम सांसद होने चाहिएं। चूंकि मुसलमानों में पचहत्तर से लेकर पच्चासी फ़ीसदी तक पसमांदा बिरादरी के लोग हैं लिहाज़ा इस तबके से कम से कम पैंतालिस सांसद होने चाहिए। हैरत की बात तो ये है कि किसी भी लोकसभा में इतने मुस्लिम सांसद भी नहीं चुने गए पसमांदा बिरादरी तो दूर की बात है। लोकतंत्र में ज़्यादा मत हासिल करने वाले की बात में तो वजन होता है। उन्हीं की बात सुनी जाती है। पसमांदा बिरादरी की कोई मज़बूत आवाज़ नहीं है। अगड़ी जाति के नेता उनके हक की बात उठाना नहीं चाहते तो क्या देश भर के दस करोड़ पसमांदा मुसलमान उस नेतृत्व पर आगे भी भरोसा करते रहें, जिसने पिछले साठ साल से उन्हें धोखा में रखा है। कि आखिर पसमांदा मुस्लिम बिरादरी आपस में एकजुट होकर अपना जायज़ हक़ हासिल करने की कोई ठोस पहल करेंगी। अब वक्त आ गया है कि भरोसा खो चुके मौजूदा मुस्लिम नेतृत्व का नकार कर पसमांदा बिरादरियां अपने बीच से ही रामविलास पासवान, मायावती, नीतिश कुमार, मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद जैसे नेता पैदा करें। पसमांदा बिरादरी को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो सोच में विकासशील हो और सांप्रदायिकता से भी परे हो। तभी इन बिरादरियों की हालत सुधर सकती है। आखिर में बहुत माफी के साथ इशरत किरतपुरी का ये शेर अर्ज़ करता हूं जो पसमांदा बिरादरी की पसमांदा हालात को बखुबी बयां करता है। इसमें शायर ने फारसी भाषा का ...खुदा... शब्द स्वंयभू नेताओं के लिए इस्तेमाल किया है।

ना खु़दा हमको डुबोते तो कोई बात न थी
हम तो डूबे हैं खु़दाओं पे भरोसा करके

शुक्रवार, 11 जनवरी 2008

पसमांदा मुसलमान ...ना ख़ुदा हमको डुबोते तो कोई बात न थी











युसूफ़ अंसारी पेशे से पत्रकार हैं और जी न्यूज़ में सहायक संपादक के पद पर कार्यरत हैं। देश भर में मुसलमानों के पिछड़ेपन को लेकर बहस मुहाबिसे का दौर गर्म है। इन्हीं बहस में पसमांदा यानि मुसलमानों में मौजूद पिछड़ी जातियों के हालात को लेकर इन्होंने ये लेख लिखा है। मुझे ये लेख न केवल पसमांदा मुसलमानों के हालात को सामने लाने के लिहाज से महत्वपूर्ण लगा बल्कि देश में मुस्लीम वोट बैंक की राजनीति करने वाले नेताओं के लिए भी ये एक आईना है। पेश है पहला अंक।
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हाल ही में खत्म हुए संसद के शीतकालीन सत्र के आखरी दिनों में राज्यसभा सदस्य अली अनवर ने जस्टिस रंगनाथ मिस्रा आयोग की रिपोर्ट संसद में पेश करने और उस पर जल्द ही कार्रवायी करने की मांग की। इस पर किसी भी दल के मुस्लिम सांसदों ने उन्हें समर्थन नहीं दिया। डीएमके की तरफ से अली अनवर को समर्थन ज़रूर मिला, मगर किसी और दल ने उनकी मांग का समर्थन नहीं किया। इस घटना ने एक पत्रकार के तौर पर और मुसलमान के तौर पर मुसलमानों के पिछड़ेपन और पसमांदा मुसलमानों की बुनियादी समस्याओं पर नए सिरे से और नए नज़रिए से सोचने पर मजबूर कर दिया है। सबसे पहले तो संक्षेप में ये जानना ज़रूरी है कि जस्टिस रंगनाथ मिस्रा आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा क्या है। भाषाई अल्पसंख्यकों की स्थिति पर रिपोर्ट देने के साथ ही आयोग को इस सवाल पर भी अपनी राय देनी थी कि क्या मुसलमानों में भी दलित होते हैं। अगर हाँ तो इनकी हालत देश में क्या है और उसे कैसे सुधारा जा सकता है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में दलित आरक्षण में लगी मज़हबी पाबंदी हटाने की पुरज़ोर सिफारिश की है। अभी तक दलित आरक्षण यानि अनुसूचित जातियों के लिए तय आरक्षण के दायरे में सिर्फ हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग ही आते हैं। जस्टिस रंगनाथ मिस्रा आयोग ने मुसलमानों की उन जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल करने की सिफारिश की है जिनकी समकक्ष हिंदू जातियां अनुसूचित जाति में हैं। साथ ही इसाई धर्म अपनाने वाले दलितों को भी दलित आरक्षण की सारी सुविधाएं जारी रखने की सिफारिश की गई है। जस्टिस सच्चर कमिटी ने देश भर में मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर बताई है लेकिन जस्टिस सच्चर कमिटी जो सिफारिश नहीं कर सकी जस्टिस रंगनाथ मिस्रा ने डंके की चोट पर वो सिफारिश कर दी। अगर ये सिफारिश अमल में आती है तो मुसलमानों की एक बड़ी आबादी को इसका सीधा फायदा पहुंचेगा। मुसलमानों में जुलाहा ( अंसारी ) , धोबी , हलालखोर , कुम्हार , बंजारे , फकीर समेत करीब चालीस से पचास जातियों के लोग दलित आरक्षण के तहत मिलने वाली तमाम सुविधाओं के हक़दार हो जाएंगे। अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण लोकसभा और विधानसभा सीटों पर मुसलमानों के चुनाव लड़ने का रास्ता भी खुल जाएगा। इससे हर क्षेत्र में मुसलमानों के पिछड़ेपन की समस्या काफी हद तक हल हो जाएगी। आयोग की इस रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार को ये फैसला करना है कि वो इसाई समुदाय के दलितों को अनुसूचित जातियों में शामिल करेगी या नहीं। दलित इसाइयों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक याचिका पर केंद्र सरकार ने बाकायदा हलफनामा देकर ये कहा है कि वो इस आयोग पर फैसला करके कोर्ट को इस बाबत बताएगी। ज़ाहिर है कि अगर ईसाइयों के लिए दलित आरक्षण का रास्ता खुलता है तो मुसलमानों के लिए भी खुलेगा। सवाल ये है कि इतनी महत्वपूर्ण रिपोर्ट पर मुस्लिम नेतृत्व चुप क्यों है। क्यों सभी दलों के मुस्लिम सांसदों ने कभी इस रिपोर्ट को लागू करने की आवाज़ नहीं उठाई। जबकि रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंपे हुए आयोग को आठ महीने हो चुके हैं।

जस्टिस सच्चर कमिटी की रिपोर्ट पिछले साल दिसंबर में संसद में पेश हुई थी। तभी से उस पर अमल के लिए सरकार पर दबाब बनाने के मक़सद से तमाम मुस्लिम संगठनों और सांसदों ने जमीन - आसमान एक कर दिया। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री ए आर अंतुले, राज्यसभा के उप सभापति के रहमान खान, मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री मोहम्मद अली अशरफ़ फ़ातमी के बीच डीनर डिप्लोमेसी की होड़ मची। इन तीनों ने सभी मुस्लिम सांसदों को अपने यहाँ डीनर पर बुलाकर सच्चर कमिटी की सिफारिशें लागू करवाने की रणनीति बनाईं। लेकिन जस्टिस रंगनाथ आयोग की रिपोर्ट प्रधानमंत्री को पेश होने पर मुस्लिम मंत्रियों और सांसदों में कोई हलचल नहीं हुई। लगता है सबको साँप सूंघ गया है। ताज्जुब की बात तो ये है कि जब इस रिपोर्ट के बारे में मुस्लिम सांसदों से बात की गयी तो उन्होंने साफ कहा कि उनको इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। हैरानी की बात है कि बाबरी मस्ज़िद, तस्लीमा नसरीन और ऐसे ही तमाम भावनात्मक मुद्दों पर अक्सर बोलने वाले ज़्यादातर सांसदों को पसमांदा मुसलमानों की किस्मत बदलने वाली इतनी अहम रिपोर्ट के बारे में कोई जानकारी तक नहीं है। इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि मौजूदा मुस्लिम नेतृत्व यानि सांसदों और मंत्रियों को अपने समाज के पिछड़े और बेहद पिछड़े तबके के हितों की कितनी चिंता है। राज्यसभा में अली अनवर को समर्थन इसलिए नहीं मिला क्योंकि राज्यसभा में छब्बीस मुस्लिम सांसदों में से अली अनवर के अलावा कोई भी पसमांदा बिरादरी ( पिछड़ी जाति ) का नहीं है। लोकसभा में तो जस्टिस रंगनाथ आयोग की रिपोर्ट का मुद्दा उठा तक नहीं। पांच सौ तैंतालिस सदस्यों वाली लोकसभा में सिर्फ़ छत्तीस मुस्लिम सांसद हैं। इसमें पसमांदा बिरादरी के सिर्फ़ तीन सांसद हैं।उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से पश्चिम बंगाल तक फैली अंसारी बिरादरी से चौदहवीं लोकसभा में सिर्फ एक सांसद फुरकान अंसारी कांग्रेस के टिकट पर झारखंड से जीत कर आए। इसी तरह देश भर में फैली कुरैशी बिरादरी का महज एक सांसद हाजी शाहिद अखलाक कुरैशी बिएसपी के टिकट पर मेरठ से चुना गया। अब वो सपा में मुलायम सिंह के साथ हैं। सपा के टिकट पर फूलपुर से दबंग अतीक अहमद चुनाव जीते थे। वो गद्दी जाति के हैं। तेरहवी लोकसभा में पसमांदा बिरादरी का एक भी सांसद लोकसभा में नहीं पहुंचा था। जिस समुदाय के हक की आवाज़ उठाने वाले ही संसद में मौजूद न हों भला उनकी आवाज़ कोई दूसरा क्यों उठाएगा। मौजूदा मुस्लिम नेतृत्व के रवैय्ये से तो कम से कम ऐसा ही लगता है।....( जारी )

बुधवार, 9 जनवरी 2008

रत्न... रत्न... भारत रत्न

भारतीय राजनीति में एक पत्र ने बबाल कर दिया। दरअसल जबसे लालकृष्ण आडवाणी को भाजपा में प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया है या यों कहें कि घोषित करवाया है तब से वो चर्चा में बने हुए हैं। इसमें कोई शक नहीं कि आडवाणी घाघ राजनेता हैं। उन्हें पता है कब कहाँ और कितने जोर का हमला करना है। रथयात्रा से लेकर अब तक आडवाणी भाजपा के शिखर पुरूष रहे लेकिन जब केंद्र में सत्ता का अवसर आया तो सत्ता फिसल कर विकास पुरूष वाजपेयी के हाथ चली गई। मन मसोस कर गठबंधन राजनीति को गरियाया लेकिन वक्त का इंतजार करते रहे। समय आया और आडवाणी ने पूरी तैयारी के साथ खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करवा लिया। लिहाजा तैयारी भी शुरू हो गई। बेनज़ीर की हत्या हुई ... भारत सरकार जबतक हालात समझती तब तक आडवाणी जी ने आनन फानन में प्रेस को बुला कर अपनी बात रखी, एक घँटे तक बात की और बेनजीर पर उनकी बात और राष्ट्रीय सुरक्षा पर उनकी चिंता से पूरा देश वाकिफ हो गया। ऐसा लग रहा था कि वाकई प्राइम मिनिस्टर इन मेंकिंग बात कर रहे हैं। प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह को चौबीस घंटे का वक्त लगा मीडिया के सामने में आने में। आडवाणी जी तुरत फुरंत में आ गए। लगे हाथ प्रधानमंत्री को सलाह भी दे दी फोन करके , राष्ट्रीय सुरक्षा पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की। प्रधानमंत्री ने भी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को पूरे मुद्दे पर आडवाणी को ब्रीफ करने का आदेश दिया। बाद में गोवा से मनमोहन लौटे तो आडवाणी जी के बात पर सर्वदलीय बैठक भी बुलाई। भई वाह प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग जो ठहरे। व्यक्तित्व होना ही नहीं चाहिए दिखना भी चाहिए ... आडवाणी जी इस मामले में तो माहिर हैं ही।
अब उन्होंने एक नया शिगुफा छेड़ा है। प्रधानमंत्री मनमोहन जी को एक पत्र लिख डाला। लिखा भाजपा के शिखर पुरूष अटल जी को भारत रत्न दीजिए। पत्र लिखने के बाद पार्टी योद्धाओं को मोर्चा संभालने का आदेश दिया। लिहाजा रणबांकुरे डट गए और प्रेस ब्रिफींग कर मीडिया को भी चिठ्ठी के बारे में विस्तार से बताया। प्रधानमंत्री हलकान, जबाव देते नहीं बन रहा था। और इधर बीजेपी के योद्धा उतर चुके थे वाक् मैदान में। वाजपेयी का गुणगाण शुरू हुआ। सबसे लंबे समय तक गैर काग्रेस प्रधानमंत्री को गुण के रूप व्याख्या की जाने लगी। बात सही भी थी। लेकिन कांग्रेस को तो मानो साँप सूंघ गया। क्या जबाव दें सूझ नहीं रहा था। वाजपेयी की लोकप्रियता का अंदाज सबको है। लिहाजा गोल मटोल जबाव देने के लिए प्रवक्ता शकील अहमद सामने आए। खास नहीं कह पाए। दूसरे दिन सूचना प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी हमलावर मूड में सामने आए। कहा अच्छा हो पहले आडवाणी जी अपनी पार्टी में उनका सम्मान करें। भारत रत्न जैसे मुद्दे पर चिठ्ठी - चिठ्ठी खेलकर फैसला नहीं होता है। मुंशी भी सही थे... सम्मान पर इस तरह से फैसला नहीं होता है। मंत्री जी ये बात तो आडवाणी जी को भी पता है। फिर आखिर क्यों चिठ्ठी लिखी। जो फायदा मिलना था ले गए। आप तो बस लाठी पीटिए बाद में। आडवाणी जी को भी पता है भारत रत्न जैसा सम्मान चिठ्ठी चिठ्ठी खेलकर नहीं होता है। अब आप देते हैं तो ठीक ... नहीं देते हैं तो और भी ठीक। मलाई तो ले गए आडवाणी। बाँकी दल भी चाहते न चाहते इस विवाद में घसीट लिए गए। किसी ने ज्योति बसु को तो किसी ने कांशीराम को देने की बात कही। लेकिन ये सारे नाम एडिशनल थे... किसी ने भी वाजपेयी को सम्मान न देने का विरोध करने की हैसियत नहीं थी। हाँ कुछ लोगों ने अपनी तरफ से कुछ और नाम भर सुझा दिए। यहाँ तक मायावती ने भी कहा कांशीराम को भी दो .... हालांकि वाजपेयी जी को भी देने का समर्थन किया। धन्य हो आडवाणी जी .... विपक्ष में बैठकर भी मजे लेना कोई आपसे सीखे। खूब मजे ले रहे हैं आप सरकार की खिसियाहट देखकर। क्यों नहीं गुजरात हिमाचल का जब आत्मविश्वास सामने हो तो विरोधियों से भी मजे लेने का तो मन करता ही है। बहरहाल वाजपेयी जी भी हौले हौले पोपली मुंह से मुस्कुरा रहे होंगे। साथ ही घाघनीति पर आडवाणी की पीठ भी थपथपायी होगी। उधर आडवाणी जी आजकल आमीर खान की पीठ थपथपा रहे हैं। हाँ जब तारे आसमान पे हों तो आँखे भी खुद खुद गीली हो जाती हैं।
या कहीं आपको ये तो नहीं लग रहा है कि स्टोरी में कोई वामपंथी एंगल है। क्या कहा नहीं समझे। अरे भाई वामपंथी सफाई दे रहे हैं कि हम कभी कोई सरकारी सम्मान ग्रहण नहीं करते। क्या जरूरत पड़ी ऐसी सफाई की। नितेंद्र भाई का कहना है कि कहीं ऐसा तो नहीं भारत रत्न के लिए किसी वाम नेता का चयन किया गया था और आडवाणी की चिठ्ठी ने उस पर लंगड़ी मार दी। जय हो जय हो ...

गुरुवार, 3 जनवरी 2008

मायावी चैनलों की लीला

शेखर पेशे से पत्रकार हैं। स्टार न्यूज़ में काम करते हैं। अक्सर मुझे कविताएं भेजते रहते हैं। ये कविताएं विभिन्न विषयों पर होती हैं। इन सबमें इंसानियत के प्रति उनकी संवेदना का अहसास तारी होता है। एक बार फिर उन्होंने ये कविता मुझे भेजी है। मुझे अच्छी लगी। आप भी इसे पढ़ सकते हैं...
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मायावी चैनलो से चौबीस घंटे टपकता रहे लहू
फिर भी दर्शकों में प्रतिक्रिया नहीं होती
लहू और चीख के दृश्यों ने दर्शकों की संवेदनाओं को नष्ट कर दिया है
इसलिए जब कोई वृद्ध अपने शरीर में लगाता है आग
चैनल के सीधे प्रसारण को देखते हुए दर्शक सिहरते नहीं हैं
न ही बंद करते हैं अपनी आँखें
मुठभेड़ का सीधा प्रसारण देखते हुए बच्चे
मुस्कुराते हुए खाते हैं पापकार्न
चैनलों से चौबीस घंटे झाँकते रहते हैं लोकतंत्र के ज़ख़्म
बलात्कार की शिकार युवती का
नए सिरे से कैमरा करता है बलात्कार
परिजनों को गँवा देने वाले अभागे लोगों को
नए सिरे से तड़पाता है कैमरा
और भावहीन उद्धोषिकाएँ सारा ध्यान देती हैं
शब्दों की जगह कामुक अदाओं पर
मायावी चैनलों से चौबीसों घंटे बरसती रहती हैं
प्रायोजित क़िस्म की समृद्धी
समृद्धी की दीवार के पीछे आत्महत्या कर रहे किसानों का वर्णन नहीं होता
कुपोषण के शिकार बच्चों की कोई ख़बर नहीं होती
भूख से तंग आकर जान देने वाले पूरे परिवार
का विवरण नहीं होता
भोजन में मिलाए जा रहे ज़हर की साज़िश का
पर्दाफ़ाश नहीं होता
मायावी चैनलों से चौबीस घंटे
प्रसारित होते रहते हैं
झूठ महज गढ़े हुए झूठ।

बुधवार, 2 जनवरी 2008

(स) दमा .....




सोनिया जी बीमार हैं। दमे का दौरा पड़ा है। कुछ लोग कहते हैं साल भर कांग्रेस को मिली हार का सदमा है। इन पंक्तियों को आप विरोधियों की मसखरी भी कह सकते हैं और इस लिहाज से मुझे दक्षिणपंथी कहने के लिए स्वतंत्र हैं। बहरहाल हम बात कर रहे हैं सोनिया जी की बीमारी की। सोनिया जी बीमार क्या पड़ीं ऐसा लगा मानो राष्ट्रीय राजनीति और मीडिया को पाला मार गया। कांग्रेसी नेताओं और मीडियाकर्मियों ने सामने सामने तो सहानुभूति दिखाई लेकिन अंदर अंदर ही जमके गरियाया। साल के अंत में चढ़ी दारू की खुमारी अभी ठीक से चढ़ी भी नहीं थी कि कई लोगों के फोन घनघनाए। कथित बासेज ने आदेश दिया गंगाराम पहुंचो... मरता क्या न करता .... आदेश सर माथे पर। बासेज को गरियाते और बीमार को दुआओं की जगह बद्दु्आ देते चैनलों के जुझारू रिपोटर पहुंचते हैं सर गंगाराम अस्पताल। हालांकि कुछ खुश हैं चलो आज फिर आफिस जाकर सबके सामने बास की गाली खाने से तो बचाव हुआ। बहरहाल सुबह के धुंधलके के साफ होने से पहले सारे जुझारू रिपोटरों ने अपने अपने गन माइक संभाल लिए। सारा देश सोनियामय होने लगा। लगा सारा देश बीमार हो गया। अस्पताल पहुंचे लोगों को भी आकाशवाणी हुई कि अस्पताल में सोनिया जी भर्ती हैं। उन्हें इस बात पर गर्व हुआ कि चलो जिस अस्पताल में देश की सबसे शक्तिशाली महिला इलाज करा रही हैं उसी अस्पताल में उनके रिश्तेदारों का भी इलाज हो रहा है। गंगाराम सोनिया मय हो गया। सारा देश सोनियामय हो गया। कहीं से खबर आई कि सोनिया जी के इलाज के लिए अस्पताल प्रशासन ने तीसरे माले पर सभी बीस बाइस कमरे खाली करा दिए गए। क्यों न हो हाई प्रोफाइल मामला है। और जब मैडम आईं हैं इलाज कराने तो मैडम के सेवक भी आएंगें ही। लिहाज़ा कांग्रेस के बड़े नेताओं का आना शुरू हुआ। मैंडम की हालात का जायज़ा लेना था। आप तो बस चुप ही रहिए .... क्या कह रहे हैं दरबार में हाज़िरी लगाने आए हैं। आप तो बस यों ही काँग्रेस को चंपक पार्टी कहते हैं। पहले कमलनाथ के आने की खबर आई। फिर दिल्ली की सांसद कृष्णा तीरथ आईं। फिर मोहसिना किदवई आईं। अरे ये क्या मैडम ने किसी से भी मिलने से मना कर दिया है। वाह क्या सीन हैं ..... वीआईपी गाडियाँ आती हैं .... कांग्रेस के बड़े नेता उतरते हैं... अस्पताल परिसर में दाखिल होते हैं .... पर ये क्या एसपीजी उन्हें आगे जाने से रोक रही है। खिसियाए नेता वापस लौट जाते हैं। कुछ और साहसी हैं .... अब जब मैडम को देखने आए हैं तो उपस्थिति रजिस्टर पर अपने हस्ताक्षर करने भी तो ज़रूरी हैं। लिहाजा टहलते हुए पत्रकारों की तरफ आए हैं ... पत्रकार भी ठहरे घाघ .... कहाँ छोड़ने वाले थे। सांसद मैडम आईं .... बातचीत होने लगती है। नहीं मिल पाने का मलाल अब भी चेहरे पर सुबह की ओस की तरह ठहरा है। खिसियाहट चेहरे पे छुपाने की कोशिश होती है। गन माइक सामने। प्रवचन शुरू ...... मैडम ठीक हैं। उन्हें दमा का हल्का दौरा पड़ा है। अभी डाक्टरों की निगराणी में हैं। खतरे की कोई बात नहीं।..... तभी एक प्रश्न उनके जख्मों को और गहरा करता है। मैडम आपकी मुलाकात हुई सोनिया जी से , क्या कहा उन्होंने। खिसियाहट में फुसफुसाती हैं .... हमें मिलने ही नहीं दिया गया। गन माइक अपना काम करता है। साफ सुनाई देता है। मैसैज पहुंचता है बाँकि नेताओं के पास। अब आने वाले नेताओं की भीड़ नहीं है। मैसेज कन्वे हो चुका है। मैडम किसी से मिलना नहीं चाहती।इस बीच अब रिपोटर क्या करें। मैडम को तो महज दमे का हल्का दौरा पड़ा है। कोई खास खबर तो बननी नही। एक पट्टी चलनी चाहिए बस। लेकिन क्या करें एसाइन्मेंट से लगातार लाइव देने को कहा जा रहा है। सारे पोलिटिकल रिपोटर हैं। जो थोड़ी बहुत जानकारी आपस में बातचीत से मिल रही है उसी को पेले जा रहे हैं। किसी को कुछ नहीं पता। पेले जा रहे हैं .. तीन डाक्टरों की टीम हैं ... कोई डा कपूर, डा भटनागर और डा जैन की तीन डाक्टरों की टीम उनकी निगराणी कर रही है। शायद इस नाम के कोई डाक्टर गंगाराम में हैं ही नहीं। किसे फर्क पड़ता है। होंगे कोई डा बोस ... हम तो इन्हें ही जानते हैं। इनका ही नाम बोलेंगे। मायानगरी से लुटियंस पहुँची एक मोहिनी रिपोटर लगातार लाइव दे रही हैं। मर्द रिपोटर खुश हैं चलो कोई तो है जिसे देख कर दिन काटा जा सकता है। लिहाजा कुछ लोग उनको भी इंप्रैस करने की फिराक में हैं। मोहिनी को भी पता है। लिहाजा खुब भाव खा रही हैं। एक ग्यान पांडे कहते हैं गुजरात और हिमाचल का सदमा नहीं झेल पाईं सोनिया जी। मोहिनी ने कहा अरे हाँ एक एंगल ये भी हो सकता है। थोड़ी देर में किसी चैनल में पट्टी चला .... गुजरात और हिमाचल का सदमा। हे भगवान अब तो बीमार भी नहीं पड़ सकते।अरे इस भाई साहब को नहीं पता कि किसी से नहीं मिल रही हैं सोनिया जी। युवा कांग्रेस के हैं अभी आगे लंबा सफर तय करना है। चले आ रहे हैं दरबार में हाजिरी लगाने। भाई साहब के भी चंपू हैं ..... भाई साहब के अस्पताल परिसर में दाखिल होते हैं भाई साहब के चंपू चले आते हैं पत्रकारों के बीच। प्लेटफार्म बना रहे हैं कि भाई साहब के निकलने के बाद उनकी बाईट हो जाए। तभी एक खिसियाए पत्रकार ने उन्हें रपेट दिया। कौन हो तुम, क्या औकात है तु्म्हारे नेता की। चंपू साहब खिसियानी हँसी हँसते हैं। अरे नहीं....ऐसा नहीं भाई साहब चलिए चाय पीया जाए। तभी एक सरकारी पत्रकार उनके अहंकार को सहलाता है। अरे नही नेता जी को बुलाइए हम लेंगे बाइट। चंपू साहब खुश। चाय पिलाने ले जाते हैं। नेता जी का भी वही हाल हुआ जो सुबह से बाँकि नेताओं का हुआ था। चंपू ने खुशी खुशी अपने नेता को फोन पर जानकारी दी सरकारी पत्रकार आपकी बाइट चाहते हैं। खिसियाए नेता जी हुड़की देते हैं .... चुपचाप वापस लौटो। चंपू जी समझते हैं कुछ गड़बड़ हो गया है। चुपचाप टल लेते हैं। जय हो सोनिया जी। आपकी महिमा अपरंपार है।अरे ये क्या। अस्पताल परिसर के बाहर महामृत्युंजय यग्न होने लगा। चार लोग हवन जलाकर बैठ गए .... सोनिया जी जल्दी स्वस्थ्य हों। सारे रिपोटर दौड़े.... कैमरामैन उनसे आगे दौड़े। जल्दी लो जल्दी लो। कुछ उत्साही रिपोटरों ने अपने अपने एसाइन्मेंट को खबर दिया .... महामृत्युंजय .... अरे जल्दी भेजो। मोहिनी भी दौड़ीं.... शर्माते हुए टीकटैक किया। पेल दो पेल दो । सबमें होड़ लग गया। सपरिवार यग्न कर रहा व्यक्ति छा गया थोड़ी देर में। कुछ पत्रकार झुंझलाए .... क्या तमाशा है यार। सारे चूतियापा दिखा रहे हो। लेकिन बास का डर है इसलिए खुद भी चुतियापे को शूट कर रहे हैं। अब तक शाम हो चुकी है। अब घर जाने की चिंता है। सोनिया जी का जो होना है होता रहेगा। कुछ भी तो नहीं बचा। रिलिवर बुलाने की होड़ लग गई। चलो यार .... जाने से पहले चैनलों की संपादकीय नीति को गरियाते हैं। फिर धीरे धीरे गंगाराम खाली होने लगता है। घर पहुँच कर बीबी को कहते हैं ..... बहन .... क्या क्या चलाते हैं चैनल वाले।इतिष्री सोनिया जी जल्दी स्वस्थ हों ............ आपकी महिमा अपरंपार है।