बुधवार, 9 जनवरी 2008

रत्न... रत्न... भारत रत्न

भारतीय राजनीति में एक पत्र ने बबाल कर दिया। दरअसल जबसे लालकृष्ण आडवाणी को भाजपा में प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया है या यों कहें कि घोषित करवाया है तब से वो चर्चा में बने हुए हैं। इसमें कोई शक नहीं कि आडवाणी घाघ राजनेता हैं। उन्हें पता है कब कहाँ और कितने जोर का हमला करना है। रथयात्रा से लेकर अब तक आडवाणी भाजपा के शिखर पुरूष रहे लेकिन जब केंद्र में सत्ता का अवसर आया तो सत्ता फिसल कर विकास पुरूष वाजपेयी के हाथ चली गई। मन मसोस कर गठबंधन राजनीति को गरियाया लेकिन वक्त का इंतजार करते रहे। समय आया और आडवाणी ने पूरी तैयारी के साथ खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करवा लिया। लिहाजा तैयारी भी शुरू हो गई। बेनज़ीर की हत्या हुई ... भारत सरकार जबतक हालात समझती तब तक आडवाणी जी ने आनन फानन में प्रेस को बुला कर अपनी बात रखी, एक घँटे तक बात की और बेनजीर पर उनकी बात और राष्ट्रीय सुरक्षा पर उनकी चिंता से पूरा देश वाकिफ हो गया। ऐसा लग रहा था कि वाकई प्राइम मिनिस्टर इन मेंकिंग बात कर रहे हैं। प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह को चौबीस घंटे का वक्त लगा मीडिया के सामने में आने में। आडवाणी जी तुरत फुरंत में आ गए। लगे हाथ प्रधानमंत्री को सलाह भी दे दी फोन करके , राष्ट्रीय सुरक्षा पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की। प्रधानमंत्री ने भी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को पूरे मुद्दे पर आडवाणी को ब्रीफ करने का आदेश दिया। बाद में गोवा से मनमोहन लौटे तो आडवाणी जी के बात पर सर्वदलीय बैठक भी बुलाई। भई वाह प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग जो ठहरे। व्यक्तित्व होना ही नहीं चाहिए दिखना भी चाहिए ... आडवाणी जी इस मामले में तो माहिर हैं ही।
अब उन्होंने एक नया शिगुफा छेड़ा है। प्रधानमंत्री मनमोहन जी को एक पत्र लिख डाला। लिखा भाजपा के शिखर पुरूष अटल जी को भारत रत्न दीजिए। पत्र लिखने के बाद पार्टी योद्धाओं को मोर्चा संभालने का आदेश दिया। लिहाजा रणबांकुरे डट गए और प्रेस ब्रिफींग कर मीडिया को भी चिठ्ठी के बारे में विस्तार से बताया। प्रधानमंत्री हलकान, जबाव देते नहीं बन रहा था। और इधर बीजेपी के योद्धा उतर चुके थे वाक् मैदान में। वाजपेयी का गुणगाण शुरू हुआ। सबसे लंबे समय तक गैर काग्रेस प्रधानमंत्री को गुण के रूप व्याख्या की जाने लगी। बात सही भी थी। लेकिन कांग्रेस को तो मानो साँप सूंघ गया। क्या जबाव दें सूझ नहीं रहा था। वाजपेयी की लोकप्रियता का अंदाज सबको है। लिहाजा गोल मटोल जबाव देने के लिए प्रवक्ता शकील अहमद सामने आए। खास नहीं कह पाए। दूसरे दिन सूचना प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी हमलावर मूड में सामने आए। कहा अच्छा हो पहले आडवाणी जी अपनी पार्टी में उनका सम्मान करें। भारत रत्न जैसे मुद्दे पर चिठ्ठी - चिठ्ठी खेलकर फैसला नहीं होता है। मुंशी भी सही थे... सम्मान पर इस तरह से फैसला नहीं होता है। मंत्री जी ये बात तो आडवाणी जी को भी पता है। फिर आखिर क्यों चिठ्ठी लिखी। जो फायदा मिलना था ले गए। आप तो बस लाठी पीटिए बाद में। आडवाणी जी को भी पता है भारत रत्न जैसा सम्मान चिठ्ठी चिठ्ठी खेलकर नहीं होता है। अब आप देते हैं तो ठीक ... नहीं देते हैं तो और भी ठीक। मलाई तो ले गए आडवाणी। बाँकी दल भी चाहते न चाहते इस विवाद में घसीट लिए गए। किसी ने ज्योति बसु को तो किसी ने कांशीराम को देने की बात कही। लेकिन ये सारे नाम एडिशनल थे... किसी ने भी वाजपेयी को सम्मान न देने का विरोध करने की हैसियत नहीं थी। हाँ कुछ लोगों ने अपनी तरफ से कुछ और नाम भर सुझा दिए। यहाँ तक मायावती ने भी कहा कांशीराम को भी दो .... हालांकि वाजपेयी जी को भी देने का समर्थन किया। धन्य हो आडवाणी जी .... विपक्ष में बैठकर भी मजे लेना कोई आपसे सीखे। खूब मजे ले रहे हैं आप सरकार की खिसियाहट देखकर। क्यों नहीं गुजरात हिमाचल का जब आत्मविश्वास सामने हो तो विरोधियों से भी मजे लेने का तो मन करता ही है। बहरहाल वाजपेयी जी भी हौले हौले पोपली मुंह से मुस्कुरा रहे होंगे। साथ ही घाघनीति पर आडवाणी की पीठ भी थपथपायी होगी। उधर आडवाणी जी आजकल आमीर खान की पीठ थपथपा रहे हैं। हाँ जब तारे आसमान पे हों तो आँखे भी खुद खुद गीली हो जाती हैं।
या कहीं आपको ये तो नहीं लग रहा है कि स्टोरी में कोई वामपंथी एंगल है। क्या कहा नहीं समझे। अरे भाई वामपंथी सफाई दे रहे हैं कि हम कभी कोई सरकारी सम्मान ग्रहण नहीं करते। क्या जरूरत पड़ी ऐसी सफाई की। नितेंद्र भाई का कहना है कि कहीं ऐसा तो नहीं भारत रत्न के लिए किसी वाम नेता का चयन किया गया था और आडवाणी की चिठ्ठी ने उस पर लंगड़ी मार दी। जय हो जय हो ...

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