शनिवार, 12 जनवरी 2008

भाग दो ... ना ख़ुदा हमको डुबोते तो कोई बात न थी

...दरअसल पसमांदा बिरादरी के लोग शुरू से ही राजनीति के हाशिए पर रहे हैं। आज़ादी के समय से ज्यादातर रियासतों की बागडोर अगड़ी जातियों के मुसलमानों के हाथों में थी। रियासतों का राज्यों में विलय हुआ तो ये ही लोग राजनीति में आगे आए और पूरे मुस्लिम समाज का प्रतिनिधित्व करने लगे। इनके वर्चस्व की हालत यह थी कि संविधान सभा में एक भी पसमांदा बिरादरी का सदस्य नहीं था। शायद यही वजह रही कि मुसलमानों की इन बेहद पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल करने के लिए किसी मुस्लिम नेताओं ने जोर नहीं लगाया। जबकि सिख नेताओं ने सरदार पटेल और डा. राजेंद्र प्रसाद पर दबाव बनाकर सिख समुदाय की पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिला दिया था। आजादी के बाद भी मुस्लिम राजनीति का नेतृत्व अगड़ी जाति के नेताओं के हाथ में ही रहा है। अभी भी कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियों में तो अगड़ी जातियों के मुसलमानों का वर्चस्व है ही। पिछड़ी जातियों और दलितों की राजनीति करने वाली सपा, राजद, बसपा या फिर लोक जनशक्ति पार्टी तक में मुसलमानों के नाम पर तथाकथित ऊंची जातियों के मुसलमान ही ऊँचे ओहदे पर बैठे हैं। पसमांदा बिरादरी के लोगों को टिकट दिलाने में और उन्हें कोई अहम ज़िम्मेदारी देने में भी ये नेता ही सबसे ज़्यादा रोड़े अटकाते हैं। यही वज़ह रही है कि आजादी के बाद अभी तक किसी भी लोकसभा में पसमांदा बिरादरी के मुस्लिम सांसदों की तादाद दो अंकों तक भी नहीं पहुँची। किसी लोकसभा में इनकी तादाद दो , किसी में तीन रही तो किसी में चार या पांच रही। इससे ज़्यादा पसमांदा बिरादरी के सांसद कभी नहीं चुने गए।

आजादी के बाद से अब तक लोकसभा के लिए चार हज़ार से ज़्यादा सांसद चुने गए। इनमें से महज़ चार सौ ही मुस्लिम लोकसभा पहुंचे हैं। इनमें भी पसमांदा बिरादरी के महज़ साठ सांसद ही हुए हैं जिनमें से चौदह अंसारी बिरादरी से जबकि शेष अन्य पसमांदा बिरादरियों से हुए हैं। कई बिरादरियां ऐसी हैं जिनका कोई भी नुमाँइदां पिछले साठ साल में किसी लोकसभा, राज्यसभा या विधानसभा में नहीं पहुँचा है। आबादी के हिसाब से महिलाओं को आरक्षण की पुरज़ोर वकालत करने वालों का ध्यान कभी इस तरफ नहीं गया है या फिर इतनी बड़ी आबादी को माकूल राजनीतिक प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिल रहा है। अगर आबादी के हिसाब से देखें तो पंद्रह करोड़ मुसलमानों के लोकसभा में कम से कम बासठ मुस्लिम सांसद होने चाहिएं। चूंकि मुसलमानों में पचहत्तर से लेकर पच्चासी फ़ीसदी तक पसमांदा बिरादरी के लोग हैं लिहाज़ा इस तबके से कम से कम पैंतालिस सांसद होने चाहिए। हैरत की बात तो ये है कि किसी भी लोकसभा में इतने मुस्लिम सांसद भी नहीं चुने गए पसमांदा बिरादरी तो दूर की बात है। लोकतंत्र में ज़्यादा मत हासिल करने वाले की बात में तो वजन होता है। उन्हीं की बात सुनी जाती है। पसमांदा बिरादरी की कोई मज़बूत आवाज़ नहीं है। अगड़ी जाति के नेता उनके हक की बात उठाना नहीं चाहते तो क्या देश भर के दस करोड़ पसमांदा मुसलमान उस नेतृत्व पर आगे भी भरोसा करते रहें, जिसने पिछले साठ साल से उन्हें धोखा में रखा है। कि आखिर पसमांदा मुस्लिम बिरादरी आपस में एकजुट होकर अपना जायज़ हक़ हासिल करने की कोई ठोस पहल करेंगी। अब वक्त आ गया है कि भरोसा खो चुके मौजूदा मुस्लिम नेतृत्व का नकार कर पसमांदा बिरादरियां अपने बीच से ही रामविलास पासवान, मायावती, नीतिश कुमार, मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद जैसे नेता पैदा करें। पसमांदा बिरादरी को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो सोच में विकासशील हो और सांप्रदायिकता से भी परे हो। तभी इन बिरादरियों की हालत सुधर सकती है। आखिर में बहुत माफी के साथ इशरत किरतपुरी का ये शेर अर्ज़ करता हूं जो पसमांदा बिरादरी की पसमांदा हालात को बखुबी बयां करता है। इसमें शायर ने फारसी भाषा का ...खुदा... शब्द स्वंयभू नेताओं के लिए इस्तेमाल किया है।

ना खु़दा हमको डुबोते तो कोई बात न थी
हम तो डूबे हैं खु़दाओं पे भरोसा करके

1 टिप्पणी:

अजय रोहिला ने कहा…

भई वाह...संसदीय पत्रकारिता का खुब इस्तेमाल किया है अंसारी जी ने समाज के उत्थान को लेकर...अच्छा है जब भारी भरकम कमेटीयों की रिपोटॆ... समाज की व्यथा सबूतों के साथ सिद् कर रही है तो आवाज उठाना हक बनता है। एक पत्रकार के नाते....