
युसूफ़ अंसारी पेशे से पत्रकार हैं और जी न्यूज़ में सहायक संपादक के पद पर कार्यरत हैं। देश भर में मुसलमानों के पिछड़ेपन को लेकर बहस मुहाबिसे का दौर गर्म है। इन्हीं बहस में पसमांदा यानि मुसलमानों में मौजूद पिछड़ी जातियों के हालात को लेकर इन्होंने ये लेख लिखा है। मुझे ये लेख न केवल पसमांदा मुसलमानों के हालात को सामने लाने के लिहाज से महत्वपूर्ण लगा बल्कि देश में मुस्लीम वोट बैंक की राजनीति करने वाले नेताओं के लिए भी ये एक आईना है। पेश है पहला अंक।
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हाल ही में खत्म हुए संसद के शीतकालीन सत्र के आखरी दिनों में राज्यसभा सदस्य अली अनवर ने जस्टिस रंगनाथ मिस्रा आयोग की रिपोर्ट संसद में पेश करने और उस पर जल्द ही कार्रवायी करने की मांग की। इस पर किसी भी दल के मुस्लिम सांसदों ने उन्हें समर्थन नहीं दिया। डीएमके की तरफ से अली अनवर को समर्थन ज़रूर मिला, मगर किसी और दल ने उनकी मांग का समर्थन नहीं किया। इस घटना ने एक पत्रकार के तौर पर और मुसलमान के तौर पर मुसलमानों के पिछड़ेपन और पसमांदा मुसलमानों की बुनियादी समस्याओं पर नए सिरे से और नए नज़रिए से सोचने पर मजबूर कर दिया है। सबसे पहले तो संक्षेप में ये जानना ज़रूरी है कि जस्टिस रंगनाथ मिस्रा आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा क्या है। भाषाई अल्पसंख्यकों की स्थिति पर रिपोर्ट देने के साथ ही आयोग को इस सवाल पर भी अपनी राय देनी थी कि क्या मुसलमानों में भी दलित होते हैं। अगर हाँ तो इनकी हालत देश में क्या है और उसे कैसे सुधारा जा सकता है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में दलित आरक्षण में लगी मज़हबी पाबंदी हटाने की पुरज़ोर सिफारिश की है। अभी तक दलित आरक्षण यानि अनुसूचित जातियों के लिए तय आरक्षण के दायरे में सिर्फ हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग ही आते हैं। जस्टिस रंगनाथ मिस्रा आयोग ने मुसलमानों की उन जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल करने की सिफारिश की है जिनकी समकक्ष हिंदू जातियां अनुसूचित जाति में हैं। साथ ही इसाई धर्म अपनाने वाले दलितों को भी दलित आरक्षण की सारी सुविधाएं जारी रखने की सिफारिश की गई है। जस्टिस सच्चर कमिटी ने देश भर में मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर बताई है लेकिन जस्टिस सच्चर कमिटी जो सिफारिश नहीं कर सकी जस्टिस रंगनाथ मिस्रा ने डंके की चोट पर वो सिफारिश कर दी। अगर ये सिफारिश अमल में आती है तो मुसलमानों की एक बड़ी आबादी को इसका सीधा फायदा पहुंचेगा। मुसलमानों में जुलाहा ( अंसारी ) , धोबी , हलालखोर , कुम्हार , बंजारे , फकीर समेत करीब चालीस से पचास जातियों के लोग दलित आरक्षण के तहत मिलने वाली तमाम सुविधाओं के हक़दार हो जाएंगे। अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण लोकसभा और विधानसभा सीटों पर मुसलमानों के चुनाव लड़ने का रास्ता भी खुल जाएगा। इससे हर क्षेत्र में मुसलमानों के पिछड़ेपन की समस्या काफी हद तक हल हो जाएगी। आयोग की इस रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार को ये फैसला करना है कि वो इसाई समुदाय के दलितों को अनुसूचित जातियों में शामिल करेगी या नहीं। दलित इसाइयों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक याचिका पर केंद्र सरकार ने बाकायदा हलफनामा देकर ये कहा है कि वो इस आयोग पर फैसला करके कोर्ट को इस बाबत बताएगी। ज़ाहिर है कि अगर ईसाइयों के लिए दलित आरक्षण का रास्ता खुलता है तो मुसलमानों के लिए भी खुलेगा। सवाल ये है कि इतनी महत्वपूर्ण रिपोर्ट पर मुस्लिम नेतृत्व चुप क्यों है। क्यों सभी दलों के मुस्लिम सांसदों ने कभी इस रिपोर्ट को लागू करने की आवाज़ नहीं उठाई। जबकि रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंपे हुए आयोग को आठ महीने हो चुके हैं।
जस्टिस सच्चर कमिटी की रिपोर्ट पिछले साल दिसंबर में संसद में पेश हुई थी। तभी से उस पर अमल के लिए सरकार पर दबाब बनाने के मक़सद से तमाम मुस्लिम संगठनों और सांसदों ने जमीन - आसमान एक कर दिया। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री ए आर अंतुले, राज्यसभा के उप सभापति के रहमान खान, मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री मोहम्मद अली अशरफ़ फ़ातमी के बीच डीनर डिप्लोमेसी की होड़ मची। इन तीनों ने सभी मुस्लिम सांसदों को अपने यहाँ डीनर पर बुलाकर सच्चर कमिटी की सिफारिशें लागू करवाने की रणनीति बनाईं। लेकिन जस्टिस रंगनाथ आयोग की रिपोर्ट प्रधानमंत्री को पेश होने पर मुस्लिम मंत्रियों और सांसदों में कोई हलचल नहीं हुई। लगता है सबको साँप सूंघ गया है। ताज्जुब की बात तो ये है कि जब इस रिपोर्ट के बारे में मुस्लिम सांसदों से बात की गयी तो उन्होंने साफ कहा कि उनको इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। हैरानी की बात है कि बाबरी मस्ज़िद, तस्लीमा नसरीन और ऐसे ही तमाम भावनात्मक मुद्दों पर अक्सर बोलने वाले ज़्यादातर सांसदों को पसमांदा मुसलमानों की किस्मत बदलने वाली इतनी अहम रिपोर्ट के बारे में कोई जानकारी तक नहीं है। इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि मौजूदा मुस्लिम नेतृत्व यानि सांसदों और मंत्रियों को अपने समाज के पिछड़े और बेहद पिछड़े तबके के हितों की कितनी चिंता है। राज्यसभा में अली अनवर को समर्थन इसलिए नहीं मिला क्योंकि राज्यसभा में छब्बीस मुस्लिम सांसदों में से अली अनवर के अलावा कोई भी पसमांदा बिरादरी ( पिछड़ी जाति ) का नहीं है। लोकसभा में तो जस्टिस रंगनाथ आयोग की रिपोर्ट का मुद्दा उठा तक नहीं। पांच सौ तैंतालिस सदस्यों वाली लोकसभा में सिर्फ़ छत्तीस मुस्लिम सांसद हैं। इसमें पसमांदा बिरादरी के सिर्फ़ तीन सांसद हैं।उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से पश्चिम बंगाल तक फैली अंसारी बिरादरी से चौदहवीं लोकसभा में सिर्फ एक सांसद फुरकान अंसारी कांग्रेस के टिकट पर झारखंड से जीत कर आए। इसी तरह देश भर में फैली कुरैशी बिरादरी का महज एक सांसद हाजी शाहिद अखलाक कुरैशी बिएसपी के टिकट पर मेरठ से चुना गया। अब वो सपा में मुलायम सिंह के साथ हैं। सपा के टिकट पर फूलपुर से दबंग अतीक अहमद चुनाव जीते थे। वो गद्दी जाति के हैं। तेरहवी लोकसभा में पसमांदा बिरादरी का एक भी सांसद लोकसभा में नहीं पहुंचा था। जिस समुदाय के हक की आवाज़ उठाने वाले ही संसद में मौजूद न हों भला उनकी आवाज़ कोई दूसरा क्यों उठाएगा। मौजूदा मुस्लिम नेतृत्व के रवैय्ये से तो कम से कम ऐसा ही लगता है।....( जारी )
1 टिप्पणी:
भई... मुझे तो सख्त आपत्ति है। मुसमान कौम में जाति नाम की चीज़ नहीं होती है। यह धर्म ही समानता पर आधारित है। बाकी सुविधाओं के लिए शरीयत का हवाला देने वाले लोग आरक्षण के लिए अपनी जाति बताने पर क्यों उतर आए हैं? और इस बात की क्या गारंटी है कि आरक्षण मिलने के बाद इसका फायदा वंचितों के बदले फुरकान अंसारी जैसा मलाईदार तबका नहीं उठा लेगा? और सोचिए ज़रा कि आखिर अंसारी जैसे पिछड़े(?) मुसलमानों ने अपनी बिरादरी के हक़ में अब तक किया क्या है?
वहीं, एक सवाल और है कि आरक्षण का फायदा तो आप संविधान के तहत लेना चाहते हैं, लेकिन बाकी मसलों पर आपका धर्म आपको इस बात की इजाज़त नहीं देता। मसलन, एकसमान नागरिक संहिता आपको अपने अधिकारों का हनन लगता है, बहुविवाह आपको सांस्कृतिक परंपरा दिखती है, विवाह के पंजीकरण पर आपका रवैया ढुलमुल ही है। सिर्फ जाति आधारित आरक्षण के मामले में आप संविधान का हवाला क्यों देना चाहते हैं, यहां बराबरी की बात करने वाले धर्म को क्यों नज़रअंदाज करना चाहते हैं आप? नहीं, पहले फैसला कीजिए कि आप मुसलमानों को मिलने वाली सुविधाओं का उपभोग करना चाहते हैं या पिछड़ों को मिलने वाली सुविधाओं का। दोनों हाथ में लड्डू नहीं चलेगा। वैसे आपकी मांग नाजायज़ भी नहीं मानी जा सकती, क्यों कि संसाधनों पर पहला हक़ तो बकौल प्रधानमंत्री, आपकी कौम का ही है। अपनी कौम और जाति के लिए आवाज उठाना बेहद ज़रूरी है युसुफ भाई लेकिन अपनी कमियों को दूर करना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी।
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