
पिछले तीन दशकों से भी अधिक समय से कन्नूर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी , और संघ परिवार के लिए राजनीतिक वर्चस्व का अखाड़ा बना हुआ हुआ है। उन्नीस सौ सत्तर के बाद से ही इलाके में संघ परिवार के बढ़ते वर्चस्व से निपटने के लिए हँशिया हथौड़ा रक्तरंजित झड़पों के औजार बने हुए हैं। पिछले एक सप्ताह में इसकी आंच से दिल्ली का राजनीतिक तापमान भी बढ़ा हुआ है। दिल्ली में इसकी शुरूआत माकपा के मुख्यालय पर हुई पत्थरबाजी के रूप में सामने आया। अगले दिन संसद में वामपंथियों दलों ने जम कर बवाल काटा। दोनों सदनों की कार्रवायी में पिछले दो दिनों से जम कर व्यवधान पैदा किया। कल भी दोनों सदनों में ये बवाल छाया रहा।
यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दे रही माकपा इस मुद्दे पर दिल्ली में पत्थरबाजी पर सदन में चर्चा करना चाहती थी जबकि भाजपा की माँग थी कि इस पर कन्नूर की घटनाओँ के साथ चर्चा की जाए जहाँ हिंसक राजनीतिक झड़पों में उसके एक सौ पच्चीस से भी ज्यादा कार्यकर्ता मौत के घाट उतारे गए और कईयों को जीवन भर के लिए अपंग होना पड़ा। माकपा का कहना है कि ये राज्यों के कानून व्यवस्था से जुड़ा मामला है इस पर सदन में चर्चा नहीं हो सकती। बहरहाल परसों इस मामले पर केरल हाईकोर्ट का भी एक आवजर्वेशन आया कि कन्नूर में हिंसा के इस नंगे नाच को खत्म करने के लिए केंद्र हस्तक्षेप करे और इलाके में केंद्रीय अर्द्धसैनिक बल भेजे जाएं। खबर ये भी आई कि माकपा राज्य सचिव ने इसकी आलोचना भी की।बहरहाल कल माकपा के सीताराम येचुरी ने पिछले एक साल में कन्नूर में कथित तौर पर मारे गए माकपा कार्यकर्ताओं की एक लिस्ट मीडिया के सामने ज़ारी करते हुए संघ परिवार और भाजपा पर आरोप लगाए कि कन्नूर में अपनी राजनीतिक ज़मीन की तलाश में हिंसा का नंगा नाच कर रहे हैं। गौरतलब है कि कन्नूर भारत में वामपंथी आंदोलन का मक्का माना जाता है। इलाके के थलेसरी विधानसभा से केरल के वर्तमान गृह मंत्री विधानसभा पहुँचते हैं। इसके साथ ही उन्होंने संघ परिवार पर ये भी आरोप लगाए कि न केवल केरल बल्कि देश के अन्य इलाकों में भी संघ परिवार के लोग माकपा कैडरों , प्रतिष्ठानों पर हमला करते रहे हैं और हाल के दिनों में इसमें काफी तेजी आई है। एकबारगी को ये तो माना जा सकता है देश के अन्य इलाकों में ऐसा हो सकता है। लेकिन केरल में जहाँ वामपंथियों की सरकार है जिस इलाके का प्रतिनिधित्व राज्य के गृहमंत्री करते हों वहाँ संघ परिवार उन पर हमला कर रहा है , बात कुछ हजम नहीं होती। उन्होंने आरोप लगाए कि पिछले एक साल में सिर्फ कन्नूर में संघ परिवार के उन्नतालिस हिंसक हमलों में माकपा के छियालिस कैडरों को जान से हाथ धोना पड़ा।
सीताराम जी आपकी राज्य सरकार हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठी है। उनका जबाव था कि राज्य के गृह मंत्री संघ ने संघ परिवार को बैठ कर बातचीत के ज़रिए समस्या का हल निकालने का आमंत्रण दिया लेकिन संघ परिवार के लोग बैठकर बातचीत करने को तैयार नहीं। ऐसे में संघ परिवार अगर हमले करता है तो वो ये मान कर न चलें कि हम चूप रहेगें हमें भी मुँहतोड़ जबाव देना आता है।
भई वाह । अब भाजपा बातचीत के जरिए समाधान तलाशने को एक छलावा बताते हुए कहती है कि जिस गृहमंत्री के इशारे पर ही ये सारी कारिस्तानी हो रही है उससे बातचीत का क्या मतलब है। इलाके के राजनीतिक इतिहास को जानने वाले बताते हैं कि संघ परिवार की आशंका गलत भी नहीं है। और ऐसा भी नहीं है कि इलाके में सिर्फ संघ परिवार निशाने पर हो बल्कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के कार्यकर्ता भी उसी तरह से निशाने पर हैं। बहरहाल कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व इस पूरे मामले पर चुप्पी साधे हुए है। हालांकि दिल्ली में पत्थरबाजी की घटना पर वो भाजपा और संघ परिवार की आलोचना ज़रूर कर रही है। हालांकि कांग्रेस प्रदेश इकाई के अध्यक्ष रमेश चेन्नीथाला भाजपा और संघ परिवार की ही बात दुहरा रहे हैं। लेकिन क्या करें केंद्रीय नेतृत्व की मजबूरी है। इस मजबूरी को पहले भी मूर्त में उस घटना में देखा गया जिसके तहत नंदीग्राम पर अब तक सदन में चर्चा नहीं हो पाई।
बहरहाल संघ परिवार भी इस पूरे मामले में पिछे हटने को तैयार नहीं दीख रही है। ईंट का जबाव पत्थर से देने के मुद्रा में संघ परिवार अपनी मुठ्ठियाँ ताने हुए है। माकपा की सोच है राज्य स्तर पर तो हम निपट लेगें लेकिन उनकी कोशिश है कि मामला को राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ने से उसकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। बहरहाल इस मुद्दे पर न्यायालय सहित चौतरफा आलोचना के बाद अब माकपा बैकफुट पर है। इसके साथ ही इलाके में अपने वर्चस्व को भी वो किसी कीमत पर खोना नहीं चाहती।
1 टिप्पणी:
sandeep jee,
saadar abhivaadan, ek behtareen aur jaankaareepurn raajnitik lekh ke liye dhanyavaad.
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