विश्व महिला दिवस के दिन दो कार्यक्रमों में जाने का मौका मिला। पहला था विरांगना सम्मेलन। भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के तत्वाधान में महिलाओं का सम्मेलन था। सम्मेलन की संयोजिका थी वाणी त्रिपाठी जो पहले धारावाहिकों में अभिनय करती रहीं हैं। बाद में राजनीति में हाथ आजमाने आई हैं । धारावाहिकों में बहुत अच्छा नाम कर पाईं हों ऐसा भी नहीं इसलिए पिछले दरबाजे राजनीति में आईं। बहरहाल आश्चर्य ये रहा कि इन्हें भाजयुमो में संगठन महामंत्री का दर्जा प्राप्त है। खैर सम्मेलन शुरू हुआ । महिला दिवस था इसलिए जो भी वक्ता आता महिलाओँ के गुणगाण करता जा रहा था। बहरहाल राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी आए और उन्होंने अपनी बात कहने से पहले बताया कि आखिर इस सम्मेलन का मकसद क्या है। साफ तौर पर उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी युवा मतदाताओं को खास तौर पर ध्यान में रखती है लेकिन उनकी जो बातें थी वो कहीं से भी नहीं लग रहा था कि महिला सशक्तिकरण को और मजबूत कर रही हैं या आज की महिलाएं उसे जरा भी पसंद करेगी। दो नमूने देखिए --१ . हम स्त्री को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और इस उभरते हुए विश्व बाजार में स्त्री को एक बिकाऊ समान अथवा समान बेचने के माध्यम के रूप में स्थापित नहीं होने देगें क्योंकि हम उस विचार को मानते हैं जो वसुधैव कुटुम्ब के वाक्य को आदर्श मानती हैं। विश्व एक बाजार नहीं परिवार है और परिवार में स्त्रियों का गरिमापूर्ण स्थान है।
२- सौंदर्य प्रतियोगिताओं के आयोजन के पीछे मूल मानसिकता क्या है इसको समझने का प्रयास किया जाना चाहिए। यह कोई स्वस्थ्य प्रतियोगिता नहीं है बल्कि स्त्री को एक सजावट की वस्तु के रूप में दिखाने की मानसिकता है। मेरा मानना है कि सौंदर्य ईश्वर के द्वारा दिया गया उपहार है और ईश्वर के इस उपहार की प्रतियोगिता क्यों।
बहरहाल मुझे ये नहीं समझ में आता है कि भाजपा अगर युवा वोट बैंक पर ही नजर रखे हुए जैसा कि अध्यक्ष कह रहे थे और उसका सशक्तिकरण वगैरह से कुछ लेना देना नहीं है तो फिर इस तरह के बयानों से उसका क्या भला हो सकता है।
बहरहाल उसी दिन महिला सशक्तिकरण का एक चेहरा और देखा। दरअसल बिंदेश्वरी पाठक के सुलभ इंटरनेशनल के तत्वाधान में राजस्थान की कुछ महिलाओं को होटल इंटरकंटिनेंनटल में पत्रकारों के साथ भोज पर आमंत्रित किया गया था। ये वो महिलाएं थी जो कल तक मैला ढोने का काम करती थीं। एक तरह से एक अमानवीय कार्य को अंजाम दे रही ये महिलाएं एक तरह से नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त थीं। लेकिन अब इनके जीवन में क्रांतिकारी बदलाव आ चुका है। सुलभ इंटरनेशनल के सहयोग से इन महिलाओं ने अपना एक स्वयंसहायता समूह गठित कर अपने जीवन के कृष्ण पक्ष को एक तरह से समाप्त कर दिया। छोटे छोटे समानों को बना कर बेच कर इन्होंने अपने लिए नए मुकाम तलाशने का काम शुरू किया। पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित विश्व स्वच्छता सम्मेलन में इनमें से एक महिला को पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम जैसे लोगों के साथ एक ही मंच पर बैठने का मौका भी मिला और वहाँ मौजूद श्रोताओं को संबोधित करने का भी। अब संयुक्त राष्ट्र तक पहुँचने जा रही हैं। एक दिन में सशक्तिकरण के दो चेहरे सामने थे।
एक में सशक्तिकरण के साथ वोट बैंक की राजनीति और मध्यकालिन पुरूषवादी दंभ का चेहरा संस्कृति और परंपरा के साथ लिपटा पड़ा था। दूसरे में था शनै शनै समाज में आ रही बदलाव की क्रांतिकारी कहानी। नीचे के पोस्ट में इनकी कुछ तस्वीरें हैं।
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