झारखंड स्थित देवघर का रावणेश्वर ज्योर्तिलिंग बैधनाथ महादेव कई मायने में महत्वपूर्ण है। कहते हैं देवघर साक्षात सिद्धपीठ है। अन्य बारह या सोलह ज्योर्तिलिंगों में इसका महत्व सबसे ज़्यादा इसलिए भी है क्योंकि यहाँ भोलेनाथ के साथ साथ माँ भगवती सती रूप में मौज़ूद हैं। ये सती का हृदय स्थल है। पार्वती के सती होने के बाद जब महादेव उनके शरीर को उठाकर तांडव कर रहे थे तो सती का हृदय देवघर में गिरा था। पूरी दुनिया में यही एक पीठ है जहाँ शिव और सती साक्षात विराजमान हैं। बावजूद इसके बनारस या उज्जैन की तुलना में राष्ट्रीय स्तर पर देवघर का ज़िक्र कम होता है। मीडिया में भी देवघर एक तरह से कम जगह पाता रहा है।
बहरहाल अगर शिव अराधना की बात की जाए तो दिल्ली के आस पास रहने वालों के कांवडियों से जरूर परिचित होंगे। दरअसल श्रावणी मास में तकरीबन एक सौ आठ किलोमीटर की अजगैबीनाथ ( सुल्तानगंज ) से बैधनाथ ( देवघर ) यात्रा करके शिवभक्त कांवडिए उत्तरवाहिनी गंगा के जल से बैधनाथ का जलाभिषेक करते हैं। सौ किलोमीटर से भी लंबी इस यात्रा में पूरा रास्ता तकरीबन एक महीने तक गेरूए वस्त्रधारी कांवरियों से पटा रहता है। आप कल्पना नहीं कर सकते श्रद्धालुओं की कितनी भीड़ होती है। कहते हैं कि रामायण के प्रतिनायक रावण ने तपस्या से प्रसन्न कर शिव को कैलाश से लंका चलने को मना लिया था लेकिन प्रजापालक विष्णु की होशियारी से रास्ते में ही रावण को देवघर में शिवलिंग की स्थापना करना पड़ा। बाद में बैजू नाम के गड़रिए ने जंगल में पड़े इस शिवलिंग की खोज की। इसकी भी एक दिलचस्प कहानी है। बहरहाल यही वजह रहा कि देवघर में रावणेश्वर शिवलिंग को बैजूनाथ या बैधनाथ के नाम से जाना जाता है। बाद में भी इसके साथ कई कहानियाँ जुड़ती रही जिसका साक्षात महसूस करने के लिए आपको कम से कम एक बार देवघर जाना होगा।
शाम को होने वाले संध्यापूजा या रूद्राभिषेक के दौरान देवघर जेल के कैदियों द्वारा बनाए गए पंचमुखी या सप्तमुखी नाग से शिवलिंग की पूजा की जाती है। इसके पीछे भी लंबी कहानी है। आज जब सारा देश एक तरह से धार्मिक उन्माद की गिरफ्त में है देवघर की कुछ बातें आपको सोचने पर विवश कर सकती हैं। आज भी यहाँ दिन का पहला पूजा मुसलमान के हाथों होता है। उसके बाद ही अन्य श्रद्धालू पूजा कर सकते हैं। कहते हैं जब से यहाँ पूजा की परंपरा शुरू हुई तब से इस नियम को निभाया जा रहा। हलिम साहब जिनके खानदान के लोग ये पूजा करते हैं उनके घर में आज भी शिव का मंदिर है। हलिम साहब का मकबरा भी शिवगंगा के बगल में बनाया गया है। शिवगंगा वो तालाब है जिसमें स्नान करके श्रद्धालू पूजा के लिए मंदिर में प्रवेश करते हैं।
देवघर के बारे में कहा जाता है कि ये तपोभूमि रही है। आज भी तपोवन नाम से एक जगह मौजूद है जहाँ पहुँच कर आप वाकई एक दूसरी दुनिया में पहुँच जाते हैं। इसके अलावा नंदन और त्रिकूटी पहाड़ जैसे जगहों पर जा कर आपको लगेगा कि वाकई तपोभूमि का गौरव देवघर को प्रदान किया जाना सही। मैं यहाँ की एक ओर खासियत आपको बताना चाहूँगा। देवघर में ठाकुर अनुकूल चंद्र जी एक आश्रम है जहाँ सभी धर्मों के अनुयायी के लिए एक मंदिर बनाया गया है जिसमें गिरज़ाघर , मस्जिद और मंदिर साथ साथ हैं। इसके अलावा बंगला साहित्याकारों और नेताओं के लिए भी देवघर प्रिय स्थल रहा है। चाहे रामकृष्ण परमहंस हों, स्वामी विवेकानंद हों, शरतचंद्र हों या रविन्द्र नाथ सबके जीवन में देवघर एक खास स्थल के रूप में मौजूद रहा है। देवघर से सटे कुमड़ाबाद रोहिणी में परमहंस का आश्रम, देवघर में रामकृष्ण मिशन उसी पहचान को संजोये हुए है। महाशिवरात्री के दिन शिव के बारात का आयोजन भी आपको दाँतो तले अंगूली दबाने को विवश कर देगा। और अगर मेरे जैसे आपने भी देवघर में अपने जीवन के कुछ पल बिताए हों तो शायद आपके मानसपटल पर देवघर का स्थान सबसे उपर रहेगा।
4 टिप्पणियां:
sandeep ji,devghar me " subah kii pehli" pooja ke baarey me jaankar khushi hui..ye gyaat nahi thaa ab tak.mainey bhi do post daali thii devghar v tapovan yaatra ke baare me..aasthaa to atuut hai hamari bhi..per vyavsthaa ko lekar bhaav kuch alag se ho gaye hai aapsey....
http://parulchaandpukhraajkaa.blogspot.com/2008/01/blog-post_30.html
http://parulchaandpukhraajkaa.blogspot.com/2007/12/blog-post_29.html
बढ़िया जानकारी दी आपने , शुक्रिया!
वाह जी, बहुत खूब जानकारी..अभी १० दिन पहले ही बाबा बैजनाथ दर्शन करके लौटा हूँ..
पारूल जी नमस्कार..... आप की बात से भी मैं असहमत नहीं हूं। व्यवस्थगत खामियों से आपका सामना हुआ होगा। थोड़ी बहुत समस्याएँ भी आई होंगी। पर इससे देवघर के प्रति कहीं भी आपके मन कलुषित हुआ होगा, मुझे नहीं लगता। आशा है आप बार बार देवघर आएंगी और झारखंड महादेव का आर्शिवाद प्राप्त करेंगी।
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