शुक्रवार, 30 मई 2014

मोदी के महारथी - जेटली, गडकरी और नायडू

अरूण जेटली -भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व में शायद कुछ ही नेता ये दावा कर सकते हैं कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आंख और कान हैं। 2002 के बाद के परिदृश्य में जब कभी नरेंद्र मोदी की राह में मुश्किलें बढ़ी, अरूण जेटली ने हमेशा उन मुश्किलों का सामना करने में नरेंद्र मोदी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

यही वजह है कि पहली बार लोकसभा के मुश्किल महासमर में उतरे  इकसठ वर्षीय अरूण जेटली के लिए परिणाम सकारात्मक न होने के बाद भी प्रधानमंत्री ने उन्हें वित्त, कंपनी मामले और रक्षा मंत्रालय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। अरूण जेटली जन नेता कभी नहीं रहे लेकिन एक रणनीतिकार के तौर पर पार्टी में उनका कोई सानी नहीं है। यही वजह है कि केवल भाजपा के अंदर ही नहीं बल्कि अन्य दलों के भीतर भी अरूण जेटली को लेकर बेहद सम्मान है। 2014 के चुनावी महासमर में भी जहाँ चुनाव प्रचार बहुत हद तक व्यक्तित्व केंद्रित था , अरूण जेटली अमृतसर के अपने चुनावी अभियान से इतर अपने चुनावी डायरी और ब्लाग्स के जरिए नरेंद्र मोदी के महारथी की भूमिका बखुबी निभाई।
 पेशे से बड़े वकील माने जाने वाले अरूण जेटली पार्टी के लिए ऐसा चेहरा बन गए हैं जो एक ही वक्त में बाज़ार में सुधारवादी एजेंडे और संघ के पारंपरिक एजेंडे दोनों पर ही बखुबी चल सकते हैं। निस्संदेह अरूण जेटली प्रगतिशील और आधुनिक विचारों से लैस एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर जाने जाते हैं जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कसी हुई सरकार और चुस्त प्रशासन के एजेंडे को बखुबी अमल में लाते हैं। 
पंजाब के एक ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाले अरूण जेटली को राजनीति विरासत में नहीं मिली थी। सत्तर के दशक में अरूण जेटली का राजनीतिक सफर संघ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से शुरू हुआ और 1974 में वो दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संगठन के अध्यक्ष चुने गए। केंद्र की तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के भ्रष्टाचारी और तानाशाही रवैय्ये के विरोध में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरू किए गए संपूर्ण क्रांति आंदोलन में अपनी सक्रियता की वजह से अरूण जेटली को तकरीबन दो साल जेल में बिताने पड़े। न केवल राजनीति के क्षेत्र में अपनी सक्रियता से अरूण जेटली ने अपनी पहचान बनाई बल्कि कानून के पेशे में वरिष्ट अधिकवक्त के तौर पर भी उन्होंने बखुबी नाम कमाया। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में अरूण जेटली को कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी दी गई। गुजरात में 2002 और फिर 2007 में नरेंद्र मोदी के चुनावी प्रचार के लिए भी अरूण जेटली ने महत्वपूर्ण रणनीतिकार की भूमिका निभाकर केंद्रीय स्तर पर उन्हें एक सर्वमान्य नेता के तौर पर खड़ा करने का भी खाका खिंचा। ज़ाहिर है अभूतपूर्व जनादेश प्राप्त करने के बाद सरकारी नीतियों को ज़मीन पर उतार पाने में उनकी भूमिका आने वाले समय में महत्वपूर्ण होगी।
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 नितिन गडकरी -  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में नितिन गडकरी एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनके लिए अभिनव दृष्टिकोण वाले उपयुक्त प्रशासक सबसे उपयुक्त विशेषण है । ये अनायास नहीं था कि महाराष्ट्र की राजनीति में लो प्रोफाइल रहने वाले नितिन गडकरी ने सबसे कम उम्र में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का मुकाम हासिल किया। लोकसभा के महासमर में नितिन गडकरी नागपुर सीट से चुन कर पहली बार आए हैं। एक ऐसी सीट जो कांग्रेस की परंपरागत सीट मानी जाती रही है। कांग्रेस के प्रत्याशी विलास मुत्तमवार जो लगातार सात बार से इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, गडकरी ने उन्हें तकरीबन तीन लाख मतों के अंतर से मात दी है। आजादी के बाद से नागपुर सीट सिर्फ एक बार भाजपा के खाते में आई जब बनवारी लाल पुरोहित पार्टी के टिकट पर चुन कर आए थे। निस्संदेह नितिन गडकरी की इस जीत के मायने बहुत हैं। यही नहीं पूरे महाराष्ट्र में भाजपा शिव सेना गठबंधन ने 48 में से 42 सीटों पर सफलता अर्जित की जिसमें विदर्भ इलाके की सभी दस सीटें शामिल हैं। 

अपने काम करने के अभिनव तरीकों के लिए जाने जाने वाले नितिन गडकरी के राजनीतिक जीवन की शुरूआत छात्र के नेता तौर पर अखिल भारतीय विधार्थी परिषद से हुई। आरएसएस के विचारों से गहरे प्रभावित नितिन गडकरी बाद में भाजपा युवा मोर्चे में शामिल हुए। 1975 में इंदिरा गांधी की ओर से आपातकाल की घोषणा उनके जीवन के लिए अहम मोढ़ साबित हुआ जिसके बाद उन्होंने अपने वकालत के पेशे को ठुकराकर समाजसेवा के क्षेत्र में कदम रखा। पहली बार लोकसभा में कदम रख रहे गडकरी ने महाराष्ट्र की प्रदेश राजनीति में बतौर मंत्री और विधान परिषद में नेता विपक्ष के तौर पर लंबा सफर तय किया है। मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्में 57 वर्षीय नितिन गडकरी ने अपने विकास कार्यों के जरिए अपने शहर को एक नया चेहरा प्रदान कर पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर न केवल लोगों का ध्यान खिंचा बल्कि पीडब्ल्यूडी मंत्री के तौर मुंबई में बनाए गए फ्लाईओवरों की बदौलत फ्लाईओवर मैन का उपनाम भी हासिल किया।  मुंबई - पुणे एक्सप्रेस हाइवे की सफलता ने प्रधानमंत्री वाजपेयी का ध्यान भी खिंचा और इन्हें राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण का खाका खिंचने की जिम्मेदारी दी गई। निस्संदेह बुनियादी ढांचे के निर्माण और उनके अभिनव कार्यशैली की बदौलत ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें सड़क परिवहन, राजमार्ग और जहाज रानी मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एजेंडे और विजन में इन मंत्रालयों की भूमिका महत्वपूर्ण होनी है लिहाज़ा सबकी नज़रे भी नितिन गडकरी की ओर है कि आखिर उम्मीदों के बोझ तले वो कितना खरा उतर पाते हैं।
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 एम वेंकैया नायडू -   मुप्पावारामु वेंकैया नायडू भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष। आप उन्हें दक्षिण भारत में भाजपा का चेहरा कह सकते हैं। अपनी चतुराई और बेहतरीन संवाद कौशल के लिए जाने जाने वाले वेंकैया नायडू के लिए ये दूसरा मौका है जब केंद्रीय मंत्रिमंडल में उन्हें महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में शहरी विकास और संसदीय कार्यमंत्रालय की जिम्मेदारी खुद ही पार्टी के भीतर और बाहर उनके राजनीतिक कद की कहानी है। इससे पहले अटल जी की कैबिनेट में उन्हें ग्रामीण विकास जैसे अहम ओहदे की जिम्मेदारी दी गई थी। जानकार उस दौरान उन्हें ग्रामीण विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के प्रवर्तक के रूप में याद करते हैं।    

1 जुलाई 1949 को आंध्र प्रदेश के नेल्लौर ज़िले के चावटपालेम गांव के एक कम्मा परिवार में जन्में श्री नायुडू अल्पायु में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंद्ध हो गए थे। अपना राजनीतिक सफर उन्होंने अखिल भारतीय विधार्थी परिषद से तब शुरू किया जब 1973 - 74 में उन्हें आंध्र विश्वविद्यालय छात्र संघ का अध्यक्ष चुना गया। 1972 में शुरू किए जय आंध्र आंदोलन के दौरान उनकी महत्वपूर्ण भूमिका ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खिंचा। के वेंकेटरत्नम ने विजयवाड़ा से इस आंदोलन का नेतृत्व किया था जबकि वेंकैया नायडू नेल्लोर में इस अभियान में खासे सक्रिय थे। सन 1974 में श्री नायडू लोकनायक जयप्रकाश नारायण छात्र संघर्ष समिति के प्रदेश संयोजक बनाए गए और आपातकाल के खिलाफ देशव्यापी अभियान का हिस्सा बने। 1977-80 तक उन्हें भाजपा युवा मोर्चा का अध्यक्ष बनाया गया। दो बार राज्य के उदयगिरी विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करने वाले वेंकैया नायडू तीन बार से पड़ोसी राज्य कर्नाटक से राज्य सभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। तेलंगाना और सीमांध्र के रूप में अलग राज्यों के उदय के बाद ज़ाहिर है वेंकैया नायडू के सामने अपनी नई भूमिका में इन राज्यों की आकांक्षाओं को पूरा करने की भी अतिरिक्त जिम्मेदारी होगी।

मोदी के महारथी - सुषमा स्वराज

भाजपा में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के मुद्दे पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में मतभेद की खबरें खुलकर सामने आ रही थीं। सुषमा स्वराज का नाम भी उन संतुष्टों में लिया जा रहा था। लेकिन कहते हैं कि राजनीति में अनुभव का अपना कद होता है। देश की नई विदेश और अप्रवासी मामलों की मंत्री सुषमा स्वराज के संबंध में ये कथन कहीं न कहीं बड़ा ही सटीक मालुम पड़ता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संभवत इसी राजनीतिक कद को देखते हुए सुषमा स्वराज़ को इतनी महत्ती जिम्मेदारी सौंपी है।

 पार्टी के पितृपुरूष और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर से ही सुषमा स्वराज पार्टी की दूसरी पीढ़ी के नेताओं के बीच अग्रिम पंक्ति की नेता मानी जाती रही हैं। अंग्रेजी और हिन्दी दोनों ही भाषाओँ की मुखर वक्ता के रूप में मशहूर सुषमा स्वराज सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक की भी पसंदीदा नेत्रियों में से एक हैं। स्वदेशी आंदोलन और अन्य सांस्कृतिक मुद्दों पर अपनी मुखर विचारों के लिए जानी जाने वाली सुषमा स्वराज ने  सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने के मुद्दे पर भी अपने कठोर रूख की सार्वजनिक अभिव्यक्ति के ज़रिए राष्ट्रवादियों की खूब तारीफ बटोरी थी। उससे पहले 1999 में कर्नाटक के बेल्लारी सीट पर हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ खड़े होने के फैसले और उनके धुआंधार प्रचार अभियान ने  , हार के बावजूद भी सुषमा जी के राजनीतिक कद में बढ़ोत्तरी ही की। 

राजनीति में सुषमा स्वराज़ का सफर भी कम लोमहर्षक नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यकर्ता के घर में जन्म लेने वाली सुषमा स्वराज का राजनीतिक सफर छात्र संगठन अखिल भारतीय विधार्थी परिषद से 1970 में शुरू हुआ था। पहली बार अंबाला कैंट से जीत कर हरियाणा विधानसभा पहुँची सुषमा स्वराज ने चौधरी देवीलाल की सरकार में सबसे कम उम्र में कैबिनेट मंत्री बनने का भी गौरव हासिल किया। सुषमा स्वराज का ये सफर यहीं नहीं रूका , उन्हें सत्ताइस साल की छोटी से उम्र में जनता पार्टी प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनाया गया और 1987-90 के बीच राज्य में बनी भाजपा लोकदल गठबंधन की सरकार में शिक्षा मंत्री बनाईं गईं। बाद में राज्यसभा के जरिए राष्ट्रीय राजनीति में उनका पदार्पण हुआ। वो 1996 में 11 वीं लोकसभा चुनाव में दक्षिणी दिल्ली सीट से जीत कर लोकसभा पहुंची। तेरह दिन के लिए बनी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार में सुषमा स्वराज ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय का जिम्मा संभाला। हालांकि 1998 में वाजपेयी जी के तेरह महीनों वाली सरकार में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देकर दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री होने का जिम्मा संभाला। हालांकि इसके बाद भी दिल्ली में पार्टी की करारी हार को वो संभाल नहीं पाईं। बाद में उन्हें केंद्र सरकार में स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के अभूतपूर्व जीत के पहले तक श्रीमति स्वराज लगातार लोकसभा में नेता विपक्ष के पद पर रहकर कांग्रेस की नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की मुखर आलोचना की जिम्मेदारी निभाती रही हैं। सुषमा स्वराज के सौम्य व्यक्तित्व के बीच उनका ओजस्वी भाषण देश के सामने मौजुद नेताओं की पीढ़ी में उन्हें एक अलग मुकाम देता है।

मोदी के महारथी - राजनाथ

कभी अटल बिहारी वाजपेयी की संसदीय सीट रही लखनऊ से जीत कर लोकसभा पहुंचे राजनाथ सिंह, भाजपा के पालिटीकल हैविवेट माने जाते हैं। महज़ तेरह साल की उम्र में ही राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ जुड़ कर अपने सार्वजनिक जीवन की शुरूआत कर दी थी। बाद में लेक्चरर रहने के दौरान भी ये संबंध लगातार बरकरार रहा। नरेंद्र मोदी को मिले अभूतपूर्व जनादेश और भाजपा की सत्ता में अपने बूते वापसी के सफर में निस्संदेह पार्टी अध्यक्ष के तौर पर राजनाथ सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है लिहाजा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में उन्हें गृह मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील ओहदे की जिम्मेदारी मिली।  

बासठ वर्षीय श्री सिंह जिन्होंने वरिष्ठ नेताओं के विरोध के बाद भी पार्टी के अध्यक्ष के रूप में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए नरेंद्र मोदी के नाम की घोषणा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, निस्संदेह अब प्रधानमंत्री के विश्वस्थ महारथियों में शामिल होंगे। यही वजह है कि आने वाले वक्त में सरकार के एजेंडे पर भी उनकी व्यक्तित्व की चमक साफ देखी जा सकेगी।

दो बार भाजपा के अध्यक्ष रहे राजनाथ सिंह गोरखपुर के एक स्थानीय कालेज में भौतिकी के शिक्षक हुआ करते थे। यहां से पार्टी के एक सामान्य कार्यकर्ता के तौर पर शुरू हुआ उनका राजनीतिक सफर पार्टी के सर्वोच्च पद तक पहुँचने में कामयाब रहा। अपने राजनीतिक सफर में राजनाथ सिंह पहले राजनीतिक रूप से सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण माने जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और बाद में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र में बनी एनडीए सरकार में परिवहन और कृषि मंत्री के रूप में देश की सेवा की। राजनीति में राजनाथ सिंह का सफर निचले पायदान से शुरू होकर एक मुकाम तक पहुँचा है। हालांकि उनका राजनीतिक सफर कई उतार चढ़ाव का भी गवाह रहा। दिसंबर 2005 में लालकृष्ण आडवाणी के बाद  राजनाथ सिंह ने पार्टी अध्यक्ष का कार्यभार संभाला। हालांकि 2009 के लोकसभा चुनावों में भाजपा केंद्र में सत्ता में पहुंच पाने में न केवल असफल रही बल्कि 2004 लोकसभा चुनावों की तुलना में पार्टी को तकरीबन 22 सीटों को नुकसान भी झेलना पड़ा। 
दस जुलाई 1951 में उत्तर प्रदेश के चंदौली ज़िले के भभौरा गांव में जन्में राजनाथ सिंह ने गोरखपुर विश्वविद्यालय से भौतिकी में एमएससी तक की पढ़ाई करने के बाद 1971 में मिर्ज़ापुर के के बी पोस्ट डिग्री कालेज में लेक्चरर के रूप में नियुक्ति पाई थी। राजनाथ सिंह भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों में कई पदों पर रहे हैं। इसकी शुरूआत तब हुई जब 1969 में गोरखपुर में भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विधार्थी संगठन के संगठन मंत्री बनाए गए और 1974 में मिर्जापुर में भारतीय जनसंघ की जिला इकाई के सचिव बनाए गए। उसी दौर में राजनाथ सिंह ने  तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तानाशाही नीतियों के विरोध में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरू किये गए संपूर्ण क्रांति आंदोलन में खुद को झोंक दिया जिसकी वजह से इन्हें दो साल जेल में बिताने पड़े। अब तक राजनाथ सिंह की छवि एक ठोस और कर्मठ प्रशासक की रही है।

रविवार, 25 मई 2014

मंडल + कमंडल = नरेंद्र मोदी

नरेंद्र मोदी की जीत की रणनीति और एतिहासिक जनादेश के मायने अब खोजे जा रहे हैं और इसकी व्याख्या आगे भी होती रहेगी। लेकिन अगर इस जनादेश को मोटे तौर पर ही देखेंगे तो नरेंद्र मोदी की जीत की एतिहासिक क्रमिकता ( Historical Continuity ) का धागा तो आपके पकड़ में आएगा ही साथ ही सरकार अपने कार्यकाल के दौरान किस तरह के एजेंडे के साथ आगे बढ़ेगी ये भी समझना बहुत मुश्किल नहीं है। 

सुत्रों की अगर मानें तो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अगली सरकार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर देश भर के शहरों और ग्रामीण इलाकों के लिए लाखों करोड़ रूपए की "स्वच्छ भारत कार्यक्रम" शूरू कर सकती है। इस कार्यक्रम का मकसद होगा गांवों और शहरों में स्वच्छता, गंदे पानी के निकासी के लिए उचित नालों की व्यवस्था, ग्रामीण इलाकों में शौचालयों का निर्माण, पीने के पानी का इंतजाम, ठोस कचरों का प्रबंधन, शहरी इलाकों में सड़क, यातायात और स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था करना, मैला ढोने की प्रथा को पुरी तरह से समाप्त करना। सूत्रों के मुताबिक 2019 में कार्यक्रम के पहले चरण की समाप्ति तक देश के साढ़े तीन लाख से अधिक घरों में ये इंतजाम कर दिए जाएंगें। पांच हजार से भी अधिक गांवों में दो लाख शौचालय बनाए जाने और देश के पांच सौ से एक हजार शहरों में यातायात प्रबंधन सड़कों और स्ट्रीट लाइट की उचित व्यवस्था कर दी जाएगी। ये शहर निर्माण नगर के रूप में जाने जाएंगे और नारी सम्मान और नारी गौरव की चर्चा करने वाले देश में महिलाओं के लिए दो लाख से उपर शौचालय बनाए जाएंगे। पूरा कार्यक्रम पिपुल , पब्लिक, प्राइवेट पार्टनरशील यानी पी4 माडल पर चलाया जाएगा जिसके तहत 2022 तक माडल शहरों को कार्यरूप में परिणत कर दिया जाएगा। ये एक बानगी भर है, जनादेश किस रूप में काम करेगा। इसकी एक और बानगी अगर आप देखना चाहेंगे तो आपको नदी जोड़ो परियोजना और नदियों की सफाई के रूप में एक अलग मंत्रालय के गठन के रूप में दिख जाएगा। इसके तहत न केवल नदियों को यातायात के साधन के तौर पर विकसित किया जा सकेगा, बल्कि बाढ़ के पानी का समुचित प्रबंधन और नदियों की इकोलाजी को बचाए और खुबसुरत बनाए रखने की महत्ती जिम्मेदारी निभाई जाएगी। जिस दक्षिणपंथ पर कारपोरेट घरानों के लिए काम करने का आरोप लगता रहा है वो अपने कार्यक्रम की शुरूआत अगर एक आम हिन्दुस्तानी के दैनिक जीवन की कठिनाइयों को आसान करने से अपने सफर की शुरूआत करना चाहता है तो निस्संदेह जो जनादेश नरेंद्र मोदी को मिला है उसकी गहराई और एतिहासिक क्रमिकता को समझने की जरूरत है।

दरअसल भारतीय जनता पार्टी के सफर की शुरूआत संपूर्ण क्राति के जरिए व्यवस्था परिवर्तन की असफलता से उपजी निराशा से हुई थी। अस्सी के दशक में दो सांसदों से शुरू हुआ सफर इस जनादेश के पहले तक कमंडल के रथ पर सवार होकर आडवाणी जोशी और वाजपेयी के नेतृत्व में 184 तक पहुंचा था और पहली बार देश में एक सफल गठबंधन सरकार चला पाने का अपना पड़ाव पूरा कर पाया था। लेकिन उस जनादेश की अपनी सीमा थी , यही वजह थी कि कमंडल आंदोलन के प्रचंड रथ पर सवार होकर भी सवारी साधारण बहुमत तक के आंकड़ों से दूर थी। हिन्दुस्तान का सामाजिक यथार्थ इस राजनीतिक सफर की सीमा बन गई थी। यानि कमंडल के अश्वमेघ को विश्वनाथ प्रताप के नेतृत्व में मंडल की राजनीति ने बहुमत के आंकड़ों से दूर रखने में न केवल सफलता पाई थी बल्कि देश भर में प्रांतीय क्षत्रपों के तौर पर मंडल के मसीहा पैदा हुए थे। जनता दल का चक्का दिल्ली के तख्तोताज पर ही केवल नहीं आसीन हुआ बल्कि बिहार में लालू यादव, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव, या देश भर में जनता दल के नेतृत्व में बनी सरकारें थीं जिसने आगे न केवल कांग्रेस की एकछत्र राजनीति फलक को भी तोड़ कर गठबंधन सरकार चलाने के लिए मजबूर किया बल्कि भाजपा के सपने को भी पूरा नहीं होने दिया। भाजपा को अपने पीछे लगे मुख्य विपक्षी दल के विशेषण से आगे बढ़कर सत्ताधारी दल तक के विशेषण के सफर के लिए ये सबसे बड़ी चुनौती थी और भाजपा की व्यवहारिक गलतियों ने कई बार मंडल के राजनीतिक बिसात को और मजबूत किया। उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह , मध्य प्रदेश में उमा भारती या भाजपा और दक्षिणपंथ के थिंक टैंक माने जाने वाले गोविंदाचार्या का हश्न कहीं न कहीं मंडल के मसिहाओं को मजबूत करता गया। लेकिन अपने राजनीतिक सफर में मंडल के मसिहा राजनीतिक उत्थान के पहले पड़ाव पर भी दम तोड़ गए। नारों के रूप में सदियों से दलित और पिछड़ों के लिए वो गौरव की आवाज तो बने लेकिन उनकी अगली पीढ़ी के लिए दैनिक जरूरत पूरी करने, आर्थिक या प्रशासनिक भागीदारी सुनिश्चित करने में नाकाम रहे। यहीं बाज़ी फिर भाजपा के राज्य सरकारों द्वारा खड़े किए गए विकास माडल के पास वापिस चली आई। इन विकास माडल के सीमा और परिणामों पर बहस हो सकती है लेकिन मौजुदा माडल में ये सबसे उपयोगी साबित हुए हैं और लोगों ने हाथो हाथ लिया है इस माडल को। गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ की सरकारों का बारंबार सत्ता में आना कहीं न कहीं इस माडल के सफलता की कहानी बयां करता है। 

इसे नेतृत्व नरेंद्र मोदी के हाथ में आने और नरेंद्र मोदी के इस एतिहासिक जनादेश का प्रस्थान बिंदू माना जा सकता है। परिस्थितियां भी उनके अनुकूल थी जहां मंडल और कमंडल के साथ आकर खड़े होने की पटकथा लिखनी शूरू हो गई थी। 2014 के जनादेश के परिणामों को अगर देखें तो उत्तर प्रदेश में 42.3 फ़ीसदी वोटों के साथ 80 में से 71 सीटें भाजपा की झोली में गईं । मंडल के मसीहा मुलायम और बहुजन की आवाज बनी मायवती खेत रहीं। राज्य में सत्रह लोकसभा सीटें अनुसूचित जातियों के लिए सुरक्षित हैं। सारी की सारी सीटें भाजपा की झोली में गईं। 
यही नहीं उत्तर और पश्चिम भारत की 75 सुरक्षित सीटों में से भाजपा के खाते में 63 सीटें जाना ही ये अहसास करा देता है कि भाजपा तीन चार दशकों के बाद ही सही अपनी एतिहासिक गलती को दूर कर पाने में कामयाब रही है और पहली बार मंडल और कमंडल साथ आ गये। पटकथा को इस रूप में उतार पाना भारत के दक्षिणपंथ के लिए आसान भी नहीं था। इसके लिए 
भारतीय दक्षिणपंथ पिछले एक दशक से प्रतीकों के सहारे उसी रूपक को गढ़ने में लगा था। अति पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखने वाले नरेंद्र मोदी को नायक बनाया जाना, उस नायक के रूपक के लिए उत्तराधिपति रामचंद्र की बजाए काशी के विश्वनाथ का चुना जाना, इसी रणनीति का हिस्सा था। दरअसल महादेव सनातन समझी जाने वाली हिन्दुस्तानी सभ्यता का एकमात्र नायक है जो भूतों प्रेतों मसानियों यानि समाज में हाशिए पर खड़े लोगों के देवता हैं। विकास के माडल और रूपक के जरिए दक्षिणपंथ साधारण बहुमत के जादुई आंकड़ों को पार करने में सफल रहा है और अब इस जनादेश को अपने कार्यव्यवहार में परिणत कर सबका साथ सबका विकास के जरिए दो तिहाई बहुमत तक ले जाने की रणनीति बनाए जाने का वक्त आ गया है। इसमें गलतियां करने का ऐश्वर्य दक्षिणपंथ के नायक नरेंद्र मोदी के पास नहीं है लिहाजा डिलिवरी मैकेनिज्म को दुरस्त करना उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी।

शनिवार, 24 मई 2014

जंबो कैबिनेट या सुपर कैबिनेट !

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को मिला जनादेश कई मायनों में अभूतपूर्व है। नतीजे आने के पहले तक विरले राजनीतिक पंडित ही इस निश्कर्ष पर पहुंच पाए थे कि ये जनादेश अस्सी के दशक के उत्तरार्ध से चली आ रही गठबंधन सरकारों के दौर को खत्म कर देगा और भाजपा को अपने दम पर उन विशेषणों से मुक्त कर देगा जो अब तक भारत की मुख्य विपक्छी दल और उग्र हिन्दु राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में व्याख्या देती थी। लिहाज़ा ये जनादेश गठबंधन की उन मज़बूरियों से भी मुक्त है जो शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए क्छेत्रीय दलों के तुष्टिकरण की नीति को बढ़ावा देती थी। जानकार इन्हीं पंक्तियों में कहीं न कहीं नरेंद्र मोदी के कैबिनेट का स्वरूप भी छुपा हुआ देख सकते हैं। ज़ाहिर है गठबंधन की मज़बूरियों से मुक्ति नरेंद्र मोदी को जंबो कैबिनेट की मजबूरियों से मुक्त कर एक सुपर कैबिनेट या  यूं कहें कि एक कसा हुआ कैबिनेट बनाने की प्रेरणा दे सकता है जहां बने रहने के लिए डिलिवरी या दूसरे शब्दों में परिणाम देना जरूरी होगा। इसके लिए मंत्रिमंडल के स्वरूप के पूनर्गठन बेहद जरूरी माना जा रहा है। माना जा रहा है कि मोदी सरकार देश के इतिहास की सबसे कसी हुई सरकार होगी। एक ऐसी सरकार जिसे न तो गठबंधन की मजबूरियों के नाम पर मनमाफिक मंत्रालय लेने के सहयोगी दलों के दबाव के आगे झुकने की मजबूरी है और न ही पार्टी के अंदरूनी समीकरणों में संतुलन बिठाने के लिए बुजुर्ग नेताओं को एडजस्ट करने का दबाव झेलना है। पचहत्तर पार कर चुके नेताओं के लिए राजभवनों के दरवाजे खोलने की तैयारी है। खुद मोदी 63 साल के हैं और उनकी सरकार में एक-दो अपवादों को छोड़ उम्र में उनसे बड़ा कोई नेता शायद ही मंत्री बनाया जाए। सरकारी खर्चों में कटौती करने और काम में दक्षता और कुशलता बढ़ाने के लिए मंत्रालयों में कांट-छांट और उन्हें आपस में मिलाने की सबसे बड़ी कवायद की जा रही है। सूत्रों के मुताबिक मोदी सरकार के संभावित स्वरूप को लेकर कई महीनों से तैयारियां चल रही हैं।  इसके तहत कई गैरज़रूरी मंत्रालयों को खत्म किया जा सकता है। कई मंत्रालयों को आपस में मिलाने औऱ कई मंत्रालयों को निगमों में तब्दील किया जा सकता है, कई गैर ज़रूरी मंत्रालयों को खत्म करने का भी प्रस्ताव है। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को भी आगे जा कर निगम में बदला जा सकता है। जबकि नदियों को जोड़ने या उन्हें साफ करने के लिए एक अलग मंत्रालय या निगम बनाने का भी प्रस्ताव है।

अगर सत्ताधारी दल भाजपा से आ रहे संकेतों को सही मानें तो अभी मौजुद सत्तर से भी ज्यादा मंत्रालयों को घटाकर दो दर्जन के आ
सपास लाया जा सकता है जिसका नेतृत्व कैबिनेट मंत्री के हाथ में होगा। इसके साथ ही प्रत्येक मंत्रालयों में दो चार राज्य मंत्री बनाकर चुनावी जरूरतों को भी पूरा किया जा सकता है। ज़ाहिर है ऐसे में मंत्रिमंडल का कोर यानि महत्वपूर्ण मंत्रालय यानि की लुटियन्स की दभुजाएं साउथ ब्लाक औऱ नार्थ ब्लाक के हिस्से शायद ही सहयोगियों के पास जाएं। विदेश , वित्त, गृह और रक्छा मंत्रालय का जिम्मा पार्टी अपने ही वरिष्ठ और अनुभवी साथियों के हवाले करेगी। इन मंत्रालयों के लिए लुटियन्स की हवा में अरूण जेटली , राजनाथ सिंह सुषमा स्वराज , अरूण शौरी और रविशंकर प्रसाद जैसे नाम परिणाम आने के दिन से ही तैरने लगे हैं। इसी तरह नरेंद्र मोदी भाजपा के विस्तारवादी नीतियों के मद्देनज़र उन राज्यों से आए सांसदों को भी अपने मंत्रीमंडल में जगह दे सकते हैं जहां चुनाव आसन्न हैं। मसलन महाराष्ट्र , हरियाणा, बिहार , उत्तर प्रदेश आदि राज्य संख्या बल के लिहाज से बांकि राज्यों पर भारी पड़ेगें।

भाजपा को अपने बूते बहुमत है। लेकिन सहयोगी दलों के साथ ये आंकड़ा तीन सौ के पार जाता है। लिहाजा मंत्री पदों के चयन में पार्टी सहयोगियों की भावनाओं का ध्यान भी बखुबी रखेगी और सूत्रों की मानें तो इसके लिए जिस फार्मुले को आधार बनाया जा सकता है उसमें  हर सहयोगी दल के न सिर्फ कैबिनेट और राज्य मंत्रियों की संख्या तय की जा रही है बल्कि ये भी तय हो रहा है कि किस पार्टी के कितने मंत्री बनाए जा सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक अभी तक के फार्मूले के मुताबिक लोक सभा के तेरह सांसदों पर एक कैबिनेट मंत्री मिल सकता है। अगर मंत्रिमंडल का आकार छोटा कर सिर्फ पचास का रखा जाएगा तो हर सात सांसदों पर एक मंत्री बनेगा। जबकि सत्तर के मंत्रिमंडल पर यह संख्या पांच हो सकती है। तेलुगु देशम पार्टी को लोक सभा में 16 सीटें मिली हैं। इस लिहाज़ से उसका एक कैबिनेट और एक राज्य मंत्री बनता है। जबकि 18 सीटें हासिल करने वाली शिवसेना को एक कैबिनेट और दो राज्य मंत्री मिल सकते हैं। वैसे वाजपेयी सरकार में शिवसेना को ज्यादा हिस्सेदारी दी गई थी। लेकिन तब बीजेपी की सीटें 182 थीं। अब जबकि बीजेपी के पास 282 सीटें हैं, सहयोगी दलों की हिस्सेदारी अपने-आप कम हो जाएगी।इस फार्मूले के मुताबिक सहयोगी दलों में शिवसेना और टीडीपी को छोड़ किसी अन्य दल के सांसद को कैबिनेट मंत्री नहीं बनाया जा सकता। अन्य सहयोगी दलों में लोक जनशक्ति पार्टी को छह, अकाली दल को चार, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को तीन, अपना दल को दो सीटें मिली हैं। जबकि नगा पीपुल्स फ्रंट, नेशनल पीपुल्स पार्टी, पीएमके, स्वाभिमानी पक्ष और ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस को एक-एक सीटें मिली हैं।

भाजपा के अलावा एनडीए की ऐसी ग्यारह पार्टियां और हैं जिन्होंने लोक सभा में सीटें जीती हैं। इनमें शिवसेना और तेलुगु देशम पार्टी की संख्या दहाई में है। टीडीपी को एक कैबिनेट और दो राज्य मंत्री मिल सकते हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता अशोक गणपति राजू का नाम आगे है। बिहार में मध्यावधि चुनावों की संभावना के मद्देनज़र राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को हिस्सेदारी मिल सकती है। जबकि उत्तर प्रदेश से अपना दल की अनुप्रिया पटेल को भी बतौर राज्य मंत्री सरकार में लिया जा सकता है। अकाली दल एकमात्र ऐसा सहयोगी दल है जिसने सरकार में शामिल होने से इनकार कर दिया है। हालांकि बीजेपी उसे सरकार में शामिल होने का न्योता दे सकती है।  

इस तरह मोदी को ये तय करना होगा कि लोक सभा में संख्या बल कम होने के बावजूद क्या सहयोगी पार्टियों को क्षेत्रीय संतुलन और उनके नेताओं के कद के हिसाब से मंत्रिमंडल में जगह मिलनी चाहिए। मिसाल के तौर पर तेरह सांसदों पर एक कैबिनेट मंत्री के फार्मूले के मुताबिक छह सांसदों वाले राम विलास पासवान को कैबिनेट मंत्री नहीं बनाया जा सकता। लेकिन बिहार में संभावित मध्यावधि चुनाव, पासवान वोटों से मिली बीजेपी को शानदार कामयाबी और पासवान के अनुभव और वरिष्ठता को देखते हुए उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया जा सकता है। मोदी ने दलित एजेंडे पर खास ध्यान दिया है ऐसे में पासवान के दावे को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल होगा।

इसी तरह उत्तर पूर्व में असम से आए बेहतरीन परिणामों , सात बहनों में मिले नए सहयोंगियों मसलन नेफ्यु रियो के नेतृत्व में नगा पिपुल्स फ्रंट और पी ए संगमा के रूप में मिले नए सहयोगियों को सरकार में उचित प्रतिनिधित्व से नवाजा जा सकता।तमिलनाडु से बीजेपी के अपने एक सांसद हैं जबकि पीएमके ने भी एक सीट जीती है। जबकि बगल के पुड्डुचेरी से भी बीजेपी के सहयोगी दल ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस को कामयाबी मिली है। इसीलिए क्षेत्रीय संतुलन बिठाने के लिए ऊपर दिए फार्मूले को नज़रअंदाज़ भी किया जा सकता है। इन सबमें सबसे महत्वपूर्ण बात होगी कि ऐसे राज्य जो आमतौर पर भाजपा के सियासत के अनुकूल नहीं रहे लेकिन इस बार पार्टी वहां भी खाता खोल पाने में कामयाब रही है मसलन बंगाल, उडिसा, तमिलनाडु जैसे राज्यों को भी  सियासी बंजर में कमल खिलाने का पुरस्कार मिल सकता है।

ये बात बिल्कुल साफ है कि नरेंद्र मोदी भारी भरकम कैबिनेट से बचेंग . ‘मोदी मीन्स बिज़नेस’ के मंत्र के साथ आने वाले पाँच साल में काम का खाका तैयार किया जा रहा है। एक ऐसी सरकार की नींव रखी जा रही है जो 21वीं सदी में भारत को एक आर्थिक महाशक्ति बनाने के रास्ते पर मजबूती और तीव्र गति से लेकर जाए। इसीलिए कहा जा रहा है कि 26 तारीख को मंत्रिमंडल में जगह न मिलने से बीजेपी और सहयोगी दलों के कई नेताओं के चेहरे अगर लटके नज़र आएं तो हैरानी नहीं होगी।