शेखर पेशे से पत्रकार हैं। स्टार न्यूज़ में काम करते हैं। अक्सर मुझे कविताएं भेजते रहते हैं। ये कविताएं विभिन्न विषयों पर होती हैं। इन सबमें इंसानियत के प्रति उनकी संवेदना का अहसास तारी होता है। एक बार फिर उन्होंने ये कविता मुझे भेजी है। मुझे अच्छी लगी। आप भी इसे पढ़ सकते हैं...--------------------------------------------------------------------------------------------
मायावी चैनलो से चौबीस घंटे टपकता रहे लहू
फिर भी दर्शकों में प्रतिक्रिया नहीं होती
लहू और चीख के दृश्यों ने दर्शकों की संवेदनाओं को नष्ट कर दिया है
इसलिए जब कोई वृद्ध अपने शरीर में लगाता है आग
लहू और चीख के दृश्यों ने दर्शकों की संवेदनाओं को नष्ट कर दिया है
इसलिए जब कोई वृद्ध अपने शरीर में लगाता है आग
चैनल के सीधे प्रसारण को देखते हुए दर्शक सिहरते नहीं हैं
न ही बंद करते हैं अपनी आँखें
न ही बंद करते हैं अपनी आँखें
मुठभेड़ का सीधा प्रसारण देखते हुए बच्चे
मुस्कुराते हुए खाते हैं पापकार्न
मुस्कुराते हुए खाते हैं पापकार्न
चैनलों से चौबीस घंटे झाँकते रहते हैं लोकतंत्र के ज़ख़्म
बलात्कार की शिकार युवती का
नए सिरे से कैमरा करता है बलात्कार
परिजनों को गँवा देने वाले अभागे लोगों को
नए सिरे से तड़पाता है कैमरा
और भावहीन उद्धोषिकाएँ सारा ध्यान देती हैं
और भावहीन उद्धोषिकाएँ सारा ध्यान देती हैं
शब्दों की जगह कामुक अदाओं पर
मायावी चैनलों से चौबीसों घंटे बरसती रहती हैं
प्रायोजित क़िस्म की समृद्धी
समृद्धी की दीवार के पीछे आत्महत्या कर रहे किसानों का वर्णन नहीं होता
कुपोषण के शिकार बच्चों की कोई ख़बर नहीं होती
भूख से तंग आकर जान देने वाले पूरे परिवार
भूख से तंग आकर जान देने वाले पूरे परिवार
का विवरण नहीं होता
भोजन में मिलाए जा रहे ज़हर की साज़िश का
पर्दाफ़ाश नहीं होता
मायावी चैनलों से चौबीस घंटे
प्रसारित होते रहते हैं
झूठ महज गढ़े हुए झूठ।
मायावी चैनलों से चौबीस घंटे
प्रसारित होते रहते हैं
झूठ महज गढ़े हुए झूठ।
3 टिप्पणियां:
यह अच्छी बात है कि हम ही लोग के बीच में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कि मीडिया में फैल रही बुराई को केवल ईमानदारी से स्वीकार करते हैं बल्कि इसके खिलाफ समय समय पर अपनी आवाज भी मुखर करते रहते हैं
यह कविता असम के कवि श्री दिनकर कुमार की है जो कि बी बी सी हिन्दी की ऑनलाईन पत्रिका में 27 जुलाई 2007 को प्रकाशित हुई थी।
http://sanjeettripathi.blogspot.com/2007/09/blog-post_17.html
संजीत जी धन्यवाद। आपने कवि का नाम बताया। मुझे नहीं पता ये कविता किसकी है। और न ही मैंने अपने ब्लाग पे ये दावा किया है कि ये कविता शेखर की लिखी हुई है। बहरहाल मुद्दा ये नहीं है कि ये कविता किसकी है। मेरे लिए मुद्दा बस इतना है कि इन पंक्तियों के जरिए जो भावनाएं व्यक्त हुई हैं वो व्यक्ति को कितना झकझोकर पाती हैं। ये पंक्तियां मेरे मन को छू गईं इसलिए मैंने उन्हें अपने ब्लाग पे जगह दी। हालाँकि अगर मुझे कवि का नाम पता होता तो उनका भी ज़िक्र मैं ज़रूर करता।
संदीप झा
एक टिप्पणी भेजें