सोमवार, 31 मार्च 2008

माई कं‍ट्री माई लाइ...इफ - फील गुड़ से फील गुड़ तक


हमारे लालकृष्ण आडवाणी नया अवतार ग्रहण कर रहे हैं। नेता विपक्ष से पीएम इन वेटिंग का। डर इस बात का है कि ये नाम उनके साथ कहीं स्थायी रूप से चस्पां न हो जाए। दरअसल जब से भाजपा को ये लगने लगा है कि अब तो केंद्र में उनकी सरकार बननी तय है और आडवाणी जी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है तब से श्रीमान हर दिन किसी न किसी बात से चर्चा में बने हुए ही हैं। हालांकि ये अलग बात है कि कुछ चर्चाएं भाजपा को माइलेज देने की बजाए उनके लिए राह का रोड़ा ही साबित ही हो रहा है।

बहरहाल हम बात कर रहे हैं आडवाणी जी की नई पुस्तक माई कंट्री माई लाइफ की। इस पुस्तक में कई अंशों पर बवाल हो रहा है। हालांकि सबसे महत्वपूर्ण बात जो इस पुस्तक के जरिए राष्ट्रीय मीडिया में छाई हुई है वो है उनका ये कहना कि कँधार अपहरण कांड में विदेश मंत्री के जाने के फैसले से वो अवगत नहीं थे। बहरहाल अब आडवाणी जी ने ये क्यों कहा इस पर तो टिप्पणी नहीं की जा सकती। लेकिन इस बात पर विश्वास करना ज़रा मुश्किल है। कोई बेवकुफ इंसान भी आडवाणी की इस बात पर सहमत नहीं हो सकता। उस पर रही सही कसर तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडिज ने ये कह कर निकाल दी कि नहीं ऐसा नहीं था .... फैसले की बैठक में आडवाणी जी मौजूद थे ... हो सकता है उन्हें कुछ भ्रम हुआ हो।

अज़ी आडवाणी जी माना आपकी पूरी पार्टी एक बार फिर फील गूड कर रही है। ऐसे में आपको कंधार एपिसोड को लेकर इतना अपराध बोध महसूस करने की क्या ज़रूरत है। आप कंधार कांड में विदेश मंत्री के जाने को लेकर इतने शर्मिंदा क्यों हैं कि साफ झूठ बोल गए। पूरे एपिसोड पर इतने अपराध बोध क्यों। आपकी सरकार तो अपने विमान में सवार भारतीय यात्रियों की जान बचाने गई थी।

इस अपराध बोध के साथ साथ इस पूरे प्रसंग में आप अपना कद अटल बिहारी वाजपेयी से बड़ा करने की कोशिश में साफ देखे जा रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि ये राजनीति आपको उल्टी पड़ जाए। माना कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र की यूपीए सरकार आपके अनुकूल मौका बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आपकी पार्टी फीलगूड के चक्कर में पूरा होमवर्क कर ही न सके। और नतीजे में आप पीएम इन वेटिंग हीं रह जाएं। दरअसल पिछले कुछ समय से प्रधानमंत्री बनने की आपकी हड़बड़ाहट साफ देखी जा रही है। वैसे भी आपकी उम्मीदवारी को अब तक एनडीए के धड़े भी मुश्किल से ही पचा पाए हैं। ऐसे में जरूरत तो इस बात की थी कि आप यूपीए सरकार की विफलता को जनता तक ले जाते। आप तो खुद ही सफाई देने में लगे हुए हैं और सफाई भी ऐसी कि आप वाजपेयी सरकार के कई फैसलों से ही पीछा छुड़ाने की कोशिश में हैं।

ये ठीक वैसा ही व्यवहार है जैसा कि कोई व्यक्ति अपनी आत्ममुग्धता में और अपने परिणाम को लेकर निंश्चिचंतता के दौरान करता है। श्रीमान इसमें कोई शक नहीं कि माहौल सत्ता पक्ष के प्रतिकूल है परन्तु इसे अपने अनुकूल बनाने के लिए जो आप कर रहें हैं उसकी नहीं बल्कि देश भर में घुमकर जनता से सीधे संवाद करने की जरूरत है। देश भर में घूम कर रैली करने का कार्यक्रम भाजपा ने पहले ही रद्द कर दिया है। ये बात तो आप भी जानते हैं कि टीवी कैमरों के सामने आकर सरकार की आलोचना करने से चुनाव नहीं जीते जाते। कहीं ऐसा न हो कि ये फीलगूड पिछले फीलगूड से भी आगे निकल जाए और छिंका एक बार फिर कांग्रेस के हाथ लग जाए।

4 टिप्‍पणियां:

Manjit Thakur ने कहा…

आडवाणी अतिविश्वस्त नज़र आ रहे हैं, तो इसलिए कि यूपीए सरकार ने भी कमोबेस वही गलतियां कर रही हैं जो पिछली भाजपानीत सरकार ने की थी। प्रोपेगैंडा के असली तरीके का पता तो इनको है ही नहीं। आडवाणी तो हवाई किले बना रहे हैं कि अगले प्रधानमंत्री वही है। किताब में भी वही सच(?) है जो चुनावी मैदान में फायदा दे। लेकिन आडवाणी की तेयमय वाणी को पता नहीं क्या हो गया है। भइये, लोग किताब पढकर वोट देते हैं क्या? संदीप भाई आपने तो तेल निकाल दिया।

अमिय प्रसून मल्लिक ने कहा…

आडवाणी के मौजूदा हालत पर आपकी टिप्पणी सटीक जान पड़ती है, मगर कहीं- कहीं विचारों का ताल- मेल सही नहीं मालूम पड़ा...ख़ैर, मोटे तौर पे कहूँ तो अच्छे विचारों से भरा आपका नज़रिया आज की राजनीति के शून्य को दर्शाती है.
वैसे भी आज कितने नेता 'नमकीन' आंसू बहाते हैं, जो आडवाणी के मामले में हम अफ़सोस करें, संदीप भैया!

बेनामी ने कहा…
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बेनामी ने कहा…

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