
हुंडरू झरने पर लकड़ी से बने सजावटी समान को बेचते आदिवासी
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| हुंडरू जल प्रपात - रांची |
| दशम फॉल रांची |
दशम फॉल के ठीक सामने पहाड़ी का दृश्य
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| दूर से ली गई दशम की तस्वीर |
| सामने उंचाई से ली गई दशम की तस्वीर |
| मोबाइल कैमरे से ली गई तस्वीर |



कांग्रेस के महासचिव और भविष्य में प्रधानमंत्री पद के सबसे मज़बूत दावोदार और उम्मीदवार राहुल गांधी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में ये कह कर मुसलमानों को रिझाने की कोशिश की है कि मुसलमान भी देश का प्रधानमंत्री बन सकता है। प्रधानमंत्री बनना धर्म नहीं बल्कि क़ाबिलियत पर निर्भर करता है। ये बात उन्होंने एक सवाल के जवाब में ये बात कही है। राहुल गांदई ने कहा तो ठाक ही है। किसी मुसलमान के प्रधानमंत्री बनने पर न संविधान में कोई रोक है और न ही क़ानून में। प्रधानमंत्री बनना राजनीतिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। राहुल के बयान से एक नई बहस छिड़ी है। ये बहस कहीं न कही देश को 1947 तक ले जाती है। देश का बंटवारा ही इस बात को लेकर हुआ कि प्रधानमंत्री कौन हो। अगर उस वक्त जवाहर लाल नेहरू महात्मा गांधी की बात मानते हुए मोहम्मद अली जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने के लिए राज़ी हो जाते तो देश का विभाजन टल सकता था। ये सवाल उस वक्त जितना महत्वपूर्ण था आज भी उतना ही महत्वपूर्ण हैं।
कल एक बार फिर झारखंड पहुंचा। ज़ाहिर है प्रदेश में चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। अखाड़े में हर योद्धा ताल ठोंक रहे हैं लेकिन इन सबके बीच मधु कोड़ा के खिलाफ खुल गए पैसे के खेल ने मामले को और भी दिलचस्प मोड़ पर ला खड़ा किया है। दरअसल राष्ट्रीय फलक पर मधु कोड़ा फिलहाल झारखंड की राजनीति में अकेले खलनायक भले ही दिख रहे हों लेकिन झारखंड को जानने वाले ये बात भली भांति जानते हैं कि न तो वो अकेले खलनायक हैं और न ही ये खेल झारखंड के परिदृश्य पर कोई नया है। कई नाम हैं जो पांच चरण के चुनाव के दौरान हो सकता है सामने आए, लेकिन इस भुलावे में मत रहिएगा कि वो नाम भी सामने आएँगे जो वास्तव में कहीं दूर बैठे रांची का ये खेल खेल रहे थे। सही मायनों में अगर देखा जाए तो मधु कोड़ा का नाम सामने आना , कहीं भी झारखंड में पारदर्शी हो रहे सरकारी व्यवस्था या ईमानदारी होती व्यवस्था का नमूना नहीं है। बल्कि धूमिल की पंक्ति को अगर उधार लें तो .... सरल सूत्र उलझाऊ निकले बापू जी के तीन बंदर , वाली पंक्ति को ही चरितार्थ करता है।
मतलब ये कि कोड़ा सियासी चाल के एक मोहरे भर हैं जिसके जरिए ये दिखाने की कोशिश हो रही है कि पिछले कुछ सालों से झारखंड में लूट का जो सियासी खेल चला , हम उसके हिस्सा नहीं है। हमारा दामन साफ है। यानि की मेरी कमीज मैली नहीं है। और सबसे बड़कर अब झारखंड की जनता को उनकी सियासी किस्मत हमारे हाथ में सौंप देना चाहिए ताकि हम उनका विकास कर सकें। और इसके बाद चुनाव पर्व निपट जाएगा। अगर एक पार्टी या गठबंधन को सत्ता मिल गई तो भी और नहीं मिला तो भी ये सिलसिला चलता रहेगा। मधु कोड़ा का मामला चारा घोटाले की तरह वक्त की धूल के नीचे कहीं दब जाएगा। जनता यूं ही कराहती रहेगी। और ये नहीं हुआ तो अभी गला फाड़ फाड़ कर ईमानदारी की दुहाई देने वाले साथ बैठकर फोटो खिंचवाएंगे और जनता के हित में एक स्थायी सरकार बनाने के लिए इधर उधर स्थानांतरित होते रहेंगे। हमारे आपके हाथ में आएगा क्या कद्दू । इसलिए इन राजनेताओं के झांसे से बचिए लेकिन आपके पास विकल्प भी तो नहीं। आखिर किसी को तो चुनिएगा। जिसको चुनिएगा वही दुहेगा। आगे कुछ अच्छा मिलेगा तो आपको भी बताउंगा। इति
झारखंड से खबर आ रही है कि इस्पात आईकान मित्तल टाटा की राह पर चल निकले हैं। झारखंड की खूंटी ज़िले के टोरपा में मित्तल की प्रस्तावित चालीस हज़ार करोड़ की एकीकृत स्टील प्लांट की योजना को पलिता लग सकता है। दरअसल विस्थापन विरोधी समुहों द्वारा स्टील प्लांट के पुरज़ोर विरोध की वजह से मित्तल ने प्लांट को झारखंड में ही कहीं और ले जाने का तो फैसला कर लिया है लेकिन अगर बात फिर भी नहीं बनी तो हो सकता है राज्य को चालीस हज़ार करोड़ रूपए की इस महत्वपूर्ण परियोजना से हाथ धोना पड़ जाए।
मुख्यमंत्री ने दिए सौ एकड़ जमीन
कल तक राजद की मलाई चाट रहे श्याम रजक और रमई राम किस क्राइटेरिया में आपकी पार्टी के टिकट के अनुरूप हो गए। भाई भतीजा को टिकट नहीं देने की बात तो समझ में आई लेकिन पुराने घाघों को जिनसे आज़िज आ कर आपका कुर्सी दी थी , उन्हीं को फिर से स्थापित करने में आपने कौन सी समझदारी दिखाई ? जिस जातिवादी राजनीति से बिहार तंग आ चुका था आप भी महा - आयोग आदि कदम उठा कर कहीं न कहीं उसी को मजबूत करते दिख रहे हैं। किसी पत्रकार मित्र ने ये तो कहा कि तमाम ठेकों , जनवितरण प्रणाली आदि के ठेकों तक में आप इस बात का ध्यान रख रहे हैं। मुझे नहीं पता कि हकिकत क्या है लेकिन आप तो छवि गढ़ने में माहिर हैं जरा ध्यान रखिएगा। जिन पुराने रास्तों पर चलकर लालू रसातल पहुंचे उस पर चलना अच्छा या कि नए रास्ते चुने जाएं। पांच साल का वक्त एक राष्ट्र के इतिहास में मायने नहीं रखता है लेकिन संदेश देने के लिए ही सही, बहुत ज़्यादा है। भरोसा जीतने के लिए ये लंबा समय होता है। शेरशाह इन्हीं पांच सालों में इतिहास में अमर हो गए। आप पर ज़िम्मेदारी ज्यादा है नीतिश जी, बिहार के लिए इतिहास के इस संक्रमण काल में नेतृत्व आप के हाथ में है ... इतिहास के कूड़ेदान में जाना है या मगध की गौरवकीर्ती वापस लानी है .... आपको ही तय करना है। हमारा क्या हम तो लिखते रहेंगे कुछ न कुछ .... आप तो गौरवशाली अतीत का पुननिर्माण कर रहे हैं। आपकी हार से आप से ज्यादा हम व्यथित हैं। संभालिए वरना ....
अगर एक वाक्य में कहें तो प्रधानमंत्री का भाषण निस्संदेह शानदार था। ख़ासतौर पर पाकिस्तान के साथ दुबारा बातचीत शुरू करने के संबंध में उनके तर्कों का जबाव विपक्ष के पास भी नहीं था। प्रधानमंत्री अपनी चिर परिचित शैली से अलग हटकर बोले। शांत और सौम्यता के बीच विपक्ष पर आक्रामक अंदाज में चुटकी भी ली। इस संदर्भ में अपने पूर्ववर्ती वाजपेयी का ज़िक्र करते हुए उनके नक्शेकदम पर चलने की बात कहकर उन्होंने विपक्ष के हथियार की धार ही खत्म कर दी। बहरहाल अंतिम उपयोगकर्ता निगराणी समझौते ( एंड यूज़र मानिटरिंग एग्रिमेंट ) पर प्रधानमंत्री का तर्क बहुतों के गले नहीं उतरने लायक था।
इस मुद्दे पर उनका कहना था कि अमेरिका के साथ हथियारों और रक्षा से जुड़े उच्च स्तर की अत्याधुनिक प्रणाली की आपूर्ति के संबंध में नब्बे के के दशक से ही भारत की सरकारें इस तरह के समझौते करती आई हैं। इस बार भी अमेरिका के साथ किए गए समझौते में भारत की संप्रभुता और प्रतिष्ठा का ख्याल रखा गया है। इस समझौते में अमेरिका एकतरफा कोई कार्रवायी नहीं कर सकता है खासतौर पर रक्षा प्रतिष्ठानों की जांच के संबंध में। इसके लिए अमेरिका को पहले भारत से औपचारिक अनुरोध करना होगा और भारत की अनुमति और द्वपक्षीय सहमति से ही वो कोई जांच कर सकेगा। इसके बाद प्रधानमंत्री जी आठ के सदस्यों द्वारा संवर्द्धण और परिशोधन तकनीक के हस्तांतरण से संबंद्ध भारत की निशस्त्रीकरण के मुद्दे पर दिए गए बयान पर सदन की चिंता का जबाव दिया। इस पर उनका कहना था कि एनएसजी के ४५ देशों ने यूरोनियम तकनीक भारत को पूरी तरह से देने पर पहले ही सहमति जताई है। इसके पहले भी जी आठ के देशों ने अडंगा लगाने की कोशिश की है लेकिन वो कामयाब नहीं हुए हैं जाहिर है इसमें कामयाबी के लिए एनएसजी के सभी ४५ देशों में आमसहमति बनानी होगी जो फिलहाल संभव नहीं दिखता । लिहाज़ा निकट भविष्य भारत के लिए इस पर चिंता की कोई बात नहीं है। साथ ही उन्होंने ये भी दोहराया कि जब तक दुनिया को परमाणु शक्ति संपन्न देश के रूप में मान्यता नहीं देता है तब तक एनपीटी पर हस्ताक्षर करने का कोई सवाल ही नहीं उठता है।

इसको बाद कांग्रेस की तरफ से बोलने के लिए पी सी चाको उठे। पहले उन्होंने संयुक्त वक्तव्य में पाकिस्तान को इस्लामिक गणराज्य कहकर संबोधित करने पर यशवंत सिन्हा द्वारा की गई आलोचना पर हमला बोला। बाद में उनका जोर वर्तमान मुद्दों से ज़्यादा पूर्ववर्ती एनडीए सरकार की गलतियां गिनाने पर केंद्रित रहा। उन्होंने कारगिल युद्ध और संसद पर हमले के बाद भी वाजपेयी सरकार द्वारा पाकिस्तान से बातचीत जारी रखने को अपने तर्क का आधार बनाया। श्री चाको का कहना था कि अगर कारगिल और संसद पर हमले के बाद सरकार आगरा शिखर वार्ता और लाहौर यात्रा कर सकती है तो वर्तमान सरकार अगर मुंबई हमले के बाद शर्म अल शेख में बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की बात करती है तो इसमें क्या शर्मनाक है ? चाको अपनी जगह पर ठीक हैं। लेकिन ये ध्यान रखनी वाली बात थी कि वाजपेयी ने आर पार की लड़ाई की बात तो की थी लेकिन कभी ये नहीं कही था कि अब पाकिस्तान से बातचीत नहीं होगी। मुंबई हमले के बाद यूपीए सरकार ने साफ तौर पर ये कहा था कि मुंबई हमलों में शरीक लोगों के खिलाफ जब तक कार्रवायी नहीं होगी , भारत सरकार पाकिस्तान से किसी भी तरह की बातचीत नहीं करेगी। फिर जरदारी से मुलाकात के दौरान भी यही रूख दोहराया गया। फिर एक ही महीने में क्या बदल गया कि गिलानी से मुलाकात के बाद आतंकवाद पिछले दरवाजे से बैक फूट पर चला गया।
इसका जबाव दिया समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने उन्होंने अपने भाषण में यूपीए सरकार पर अमेरिका के दबाव में झुकने का आरोप लगाया। भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को अमेरिका के सामने घुटने टेकने की बात कहते हुए श्री यादव ने कहा कि ये पहली बार नहीं है कि ऐसा हुआ है। इराक और अफगानिस्तान पर हमलों के दौरान और ईरान के संदर्भ में हमारी विदेश नीति अमेरिका के सामने घुटने टेक चुकी है। मुलायम का आरोप था कि सरकार अपने पुराने बयान से पलटी है तो आखिर किस वजह से ? उनका कहना था कि सरकार को इन बातों पर साफ तौर पर सदन को विश्वास में लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि अजीब बात है जब युद्ध होता है तो भारत जीतता है लेकिन बातचीत के दौरान भारत की कूटनीति हमेशा हार क्यों जाती है ? इसके चलते ताशकंद में हम अपना प्रधानमंत्री खो चुके हैं। उनका कहना था कि भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का आधार गुटनिरपेक्षता रही है। सारी दुनिया में हमारी प्रतिष्ठा का यही आधार था। लेकिन अब हम गुटनिरपेक्षता से भटक रहे हैं। उन्होंने शर्म अल शेख में भारत की दो भूलों - ब्लुचिस्तान और आतंकवाद को डिलिंक करने का जिक्र करते हुए कहा कि जो सत्ता में बैठे हैं उनकी भूल भारी है। उन्होंने कहा कि इस संयुक्त वक्तव्य से भी पाकिस्तान को लाभ हुआ है भारत को नुकसान हुआ है। इसके साथ ही यूपीए की विदेश नीति का एक तरह से मजाक उड़ाते हुए उन्होंने कहा कि सरकार विदेशी मोर्चे पर हमेशा दोस्त बनाने को अपनी नीति का आधार बनाती रही है। उन्होंने प्रधानमंत्री से सीधे सवाल किया वो बताएं सदन को कि आज की तारीख में कौन सा देश भारत का दोस्त है ? उन्होंने पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने के भारत सरकार की नीति की आलोचना करते हुए कहा कि हमें इस बात की ध्यान रखना चाहिए कि पाकिस्तान के निर्माण की नींव ही शत्रुता पर टिकी है। साथ ही हमने उसके टुकड़े भी किये हैं। वो हमारा दोस्त कभी हो ही नहीं सकता। इसलिए पाकिस्तान के साथ हमारी नीति में विश्वास कम और सतर्कता का पुट ज्यादा होना चाहिए। अंत में उन्होंने प्रधानमंत्री को नसीहत दी कि जो गलती कर आए कोई बात नहीं .... अब उसे रद्दी की टोकरी में फेंक दीजिए।
अब बारी जनता दल युनाइटेड के शरद यादव की थी। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाए कि पहले तो मुंबई हमलों के बाद सरकार ने आम जनता में पाकिस्तान के खिलाफ उन्माद पैदा किया। बातचीत किसी कीमत पर नहीं का नारा बुलंद किया और अब चोर दरबाजे से बातचीत करने पर सहमति जता आए। उन्होंने कहा कि ब्लुचिस्तान के लोगों के साथ भारत के लोगों की मानवीय संवेदनाएं जुड़ी हुई हैं। शरद यादव ने कहा कि सरकार दुविधा की शिकार है। संयुक्त वक्तव्य के बाद सत्ताधारी दल के प्रवक्ता बगलें झांक रहे हैं और विदेश मंत्रालय के अधिकारी अलग बयान दे रहे हैं। यही दुविधा बताती है कि आप कुछ गलत कर आए। उनका कहना था कि इससे गजब बात क्या हो सकती है कि भारत सरकार से तनख्वाह पा रहा अधिकारी सरकार की गलती बता रहा है। उनका कहना था कि या तो आप सही हैं या आपका अधिकारी सही बोल रहा है। सरकार की दो ज़ुबान नहीं हो सकती है। आपकी पार्टी और सरकार अलग अलग भाषा बोल रही है। उन्होंने कहा कि जब तक देश दो ज़ुबान में बात कर रहा है तब तक आप किसी का भी सामना नहीं कर सकते। पाकिस्तान जीत गए जीत गए चिल्लाता रहा और यहां दो ज़ुबान में बातें हो रही हैं। शरद यादव ने कहा कि २६.११ के बाद आप रिवर्स गियर में चले गए ... देश आहत है। उन्होंने कांग्रेस को याद दिलाया कि इस देश की विदेश नीति बनाने में उनका ज्यादा योगदान रहा और बासठ सालों से देश की विदेश नीति आम सहमति से संचालित होती रही लेकिन आज आम सहमति की ये परंपरा खंडित हो गई है। उनका कहना था कि २६.११ के बाद जो दुनिया हमारी बात गौर से सुन रही, पाकिस्तान दबाव में आ गया था, इस वक्तव्य के बाद वो स्थिति खत्म हो गई है।

उनका कहना था कि तेरह जुलाई को पाकिस्तानी राष्ट्रपति ज़रदारी से मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री का बयान था कि जब तक पाकिस्तान २६ नवंवर के मुबंई हमलावरों पर ठोस कार्रवायी नहीं करता तब तक पाकिस्तान से सार्थक बातचीत संभव नहीं है । फिर शर्म अल शेख में गिलानी के साथ मुलाकात के बाद एक महीने के अंदर क्या बदल गया कि साझा बयान में भारत आतंकवाद को परे रखकर पाकिस्तान से बातचीत के लिए राजी हो गया। जाहिर है ये २६ नवंवर को मुबंई हमलों के बाद पाकिस्तान से किसी भी तरह की बातचीत नहीं करने की भारत सरकार के पोजिशन से डेविएशन है। सरकार को इस पर अपना रूख स्पष्ट करने की मांग उन्होंने की। इससे भी करारा वार उन्होंने साझा बयान में ब्लुचिस्तान के जिक्र पर किया। इस पर सरकारी प्रतिक्रिया कि ब्लुचिस्तान में भारत को छुपाने के लिए कुछ भी नहीं है, का उल्लेख करते हुए उन्होंने सरकार को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि कई मुद्दों और जगहों पर हमारे लिए छुपाने के लिए कुछ भी नहीं है तो फिर सरकार को उसका भी उल्लेख कर लेना चाहिए था। उनका साफ तौर पर कहना था कि शर्म अल शेख में ब्लुचिस्तान के जिक्र बाले साझा बयान की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि पाकिस्तान इसका अपने पक्ष में इस्तेमाल करने लगा। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि प्रधानमंत्री जो कर आए हैं उसको सातों समुद्र के पानी से भी नहीं धोया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि ब्लुचिस्तान का ये जिक्र आने वाले वक्त में भारत को बहुत तकलीफ देने वाला है।
विदेश सचिव के बैड ड्राफ्टिंग वाली बात भी उनके भाषण में प्रमुखता से छाया रहा। उन्होंने कहा कि साझा बयान की ड्राफ्टिंग बहुत सोच समझ और तैयारी के साथ होती है। एक एक शब्द पर घंटो खपाया जाता है। आगरा शिखर वार्ता इसी साझा बयान पर एकमत नहीं होने की वजह से टूट गई थी। फिर सरकार की क्या मजबूरी थी कि आखिर ब्लुचिस्तान का जिक्र करना पड़ा। और उस पर तुर्रा ये कि बैड ड्राफ्टिंग को स्वीकार करने वाला अधिकारी अब तक अपने पद पर बना हुआ है। या तो वो अधिकारी सही या सरकार सच बोल रही है। क्या ब्लुचिस्तान के संदर्भ में पाकिस्तान ने भारत को कोई दस्तावेज सौंपे हैं जिसके वजह से उसका जिक्र लाजिमी हो गया। अगर ऐसा है तो सरकार को बताना चाहिए। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन, संवर्द्धन और शोधन तकनीक, और अंतिम उपयोगकर्ता निगराणी समझौता ( एंड यूजर मानिटरिंग एग्रिमेंट ) का जिक्र करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री पर देश की संप्रभुता गिरवी रखने का आरोप लगाया। ज़ाहिर है सारा विपक्ष उनके इन आरोपों पर एक मत था। ( ज़ारी )
पंद्रहवीं लोकसभा के पहले सत्र में तो विपक्ष बड़ा शांत नज़र आया और सत्ता पक्ष एतिहासिक जनादेश की खुशफहमी में डुबकी ही लगाता नज़र आया। लेकिन विपक्षी बेंच पर बैठे दिग्गज़ों पर एक नज़र दौड़ाने के बाद से ही स्पष्ट हो गया था कि सत्ता पक्ष के लिए आगे की राह आसान नहीं होगी। और जैसे ही तकनीकि तौर पर दूसरा यानि कि बजट सत्र शुरू हुआ ये बात सदन की कार्यवाही के दौरान दिखने लगी। कई मौके ऐसे आए जब सत्ता पक्ष विपक्ष के तीखे सवालों पर सदन की हरी कालीन पर लोटता नज़र आया। ऐसा लगता रहा कि सत्ता पक्ष अब भी जीत की खुमारी से उबर नहीं पाया है। उधर सत्ता पक्ष को समर्थन दिए नेताओं मसलन लालु, मुलायम, बीजद और बसपा भी सरकार की खाल उतारती ही नजर आई। भाजपा में यशवंत सिन्हा, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज जैसे दिग्गजों ने अपनी मनमुटाव के बावजूद सरकार को विभिन्न मुद्दों पर आड़े हाथ लेने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
पंद्रहवीं लोकसभा के चुनावी महासमर के दौरान जिस पर सबसे ज़्यादा रार मची और ये कि जिसे आने वाले वक्त में शायद सबसे ज़्यादा याद किया जाएगा ... पहली बार चुनाव परिणाम आने से पहले देश ने प्रधानमंत्री पद के सबसे ज्यादा दावेदार देखे। राष्ट्रीय पार्टियों से लेकर इलाकाई क्षत्रपों तक ने देश के इस सर्वोच्च पद के लिए अपनी अपनी तालें ठोंकी। दिल्ली का तख्तो- ताज किस राजनैतिक दल को मिलेगा, ये सवाल अहम है बावजूद इसके एकबारगी ऐसा लगने लगा कि ये सवाल कहीं न कहीं पीछे चला गया और अहम ये हो गया कि आखिर इस सरकार का मुखिया कौन होगा।
इस सवाल के पीछे राजनीतिक दलों की भूमिका जितनी अहम थी राजनीतिक विश्लेषकों की भूमिका कहीं भी उससे कम नहीं थी। प्रेक्षक शुरूआत से ही मान कर चल रहे थे कि प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह केयरटेकर पीएम हैं जिन्हें सरकार के मुखिया के तौर पर भरत की भूमिका निभानी है। इसलिए बार बार ये सवाल उठता रहा कि पंद्रहवीं लोकसभा के दौरान कांग्रेस डा मनमोहन सिंह के नेतृत्व में चुनावी समर में जाएगी या कि धीरे धीरे दलीय प्रतिबद्धता को बखुबी निभा ( पार्टी प्रवक्ताओं के मुताबिक ) रहे राहुल गांधी सही वक्त पर समर का नेतृत्व अपने हाथ में लेंगे। बहरहाल कांग्रेस नेतृत्व ने कई मंचों पर अपना स्टैंड मजबूती से साफ करने का अभिनय किया।
यूपीए में प्रधानमंत्री पद का मुद्दा यहीं नहीं थमा। कभी लालू , पासवान और मुलायम की तिकड़ी इस कोशिश में रही कि एनसीपी के शरद पवार यूपीए के भीतर बने इस चौथे मोर्चे का नेतृत्व थाम लें। इसके पीछे ये धारणा थी कि चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस की सीटें कम होती हैं और ये क्षत्रप अपना गढ़ बचा पाने में सफल रहते हैं तो शरद पवार के पीछे गोलबंद हुआ जा सकता है। इसको लेकर एनसीपी में भी गुदगुदाहट होती रही, वो शरद पवार को पीएम मैटेरियल मानते रहे और इसको मूर्त रूप देने के लिए कभी कभी मराठा मुखिया की बात को भी हवा देते रहे। अंतत शरद पवार की इस स्वीकारोक्ति ने कि उनके पास पर्याप्त संख्या नहीं है , काफी हद तक यूपीए के भीतर प्रधानमंत्री पद को लेकर भ्रम साफ कर दिया। दरअसल ये साफगोई शरद पवार की शातिर अंदाज का एक नमूना है। ये शरद पवार भी जानते हैं कि प्रधानमंत्री बनने के लिए घोड़े नहीं चाहिए होते बल्कि घोड़े पर दांव लगाने वाले चाहिए होते हैं। अपनी पार्टी के इकलौते सांसद चंद्रशेखर अगर इस देश में प्रधानमंत्री हो सकते हैं तो शरद पवार क्यों नहीं , ये बात वो भी बखूबी समझते हैं और सही वक्त का इंतज़ार कर रहे हैं। दरअसल इसीलिए भी उन्होंने सन्यास के बाद भी पीच पर बैटिंग करने को उतरने मतलब चुनाव लड़े। इसके पीछे की महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है। लेकिन उनके इस मह्त्वाकांक्षा को अगर तीसरा मोर्चा चार चांद लगा सकता है तो कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी है जो हर कीमत पर इसे होने से रोकना चाहेगी।

देश में चुनावी हलचल अपने अंजाम के करीब पहुंचता जा रहा है। राजनीतिक दल अपने कमान से हर तरह के तरकश का इस्तेमाल कर रहे है जिससे वे अपने प्रत्याशियों और समर्थक उम्मीदवारों को चुनाव जीता सके। इस चुनाव में बहुत कुछ दांव पर है। पर सबसे ज्यादा दांव पर है राष्ट्रीय राजनीति के दो दिग्गज गठबंधनों यूपीए और एनडीए की प्रतिष्ठा। इन दोनों ही गठबंधनों के लिए तीसरा मोर्चा बहुत बड़ा सिर दर्द बन कर उभरा है। ज़ाहिर है इसलिए भी यूपीए और एनडीए की रणनीति का इम्तिहान इस बार कड़ा है। 
कांग्रेस को आंध्र प्रदेश , असम, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, तमिलनाडु , झारखंड और केंद्र शासित प्रदेशों अंडमान निकोबार, चंडीगढ़, दमन दीव और दिल्ली के 203 सीटों में से 97 सीटें हासिल हुई थी यानि इन राज्यों की कुल सीटों की तकरीबन पचास फ़ीसदी के करीब सीटें कांग्रेस के खाते में गई थी जबकि इन्हीं राज्यों में भाजपा को महज़ 31 सीटें हासिल हुई थी। ज़ाहिर है पिछली बार कांग्रेस के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने में इन राज्यों की भूमिका बहुत बड़ी थी, लिहाज़ा इस बार वापसी के लिए कांग्रेस का यहां बहुत कुछ दांव पर है। अब भाजपा के बेहतर प्रदर्शन वाले राज्यों पर नज़र डालें तो मध्य प्रदेश , राजस्थान , छत्तीसगढ़ , गुजरात, महाराष्ट्र और उड़ीसा जैसे राज्यों की कुल 160 सीटों में से 90 सीटों पर कब्ज़ा जमाने में सफल रही थी यानि कुल सीटों की पचास फ़ीसदी से भी अधिक। ज़ाहिर है भाजपा के समक्ष इन राज्यों में अपनी इन सफलता को दोहराने के साथ साथ कांग्रेस के उन राज्यों में भी अपनी स्थिति मजबूत करने की दोहरी चुनौती है। ज़ाहिर है कांग्रेस और भाजपा के बीच असली मुकाबला इन्हीं राज्यों में देखने को मिलेगा।
अब चौदहवीं लोकसभा में कांग्रेस की सहयोगी दलों के प्रदर्शन पर नज़र डालें तो बिहार और झारखंड में राष्ट्रीय जनता दल, लोकजनशक्ति पार्टी और झारखंड मुक्ति मोर्चा, महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और आरपीआई, तमिलनाडु पांडिचेरी में डीएमके, पीएमके और एमडीएमके जैसी पार्टियों ने कुल 142 सीटों में से 68 सीटों पर कब्ज़ा जमा कर कांग्रेस के लिए केंद्र में सरकार बनाने की राहें आसान कर दी थी। लेकिन इसके विपरीत भाजपा के सहयोगी दलों पंजाब में अकाली दल, महाराष्ट्र में शिवसेना, तमिलनाडु में जयललिता, उड़िसा में बीजु जनता दल और बिहार में जनता दल युनाइटेड जैसी सहयोगी दलों ने 161 सीटों में महज़ सैंतीस सीटें हासिल कर केंद्र में सरकार बनाने की कवायद में एनडीए की असफलता की पटकथा लिख दी थी। ज़ाहिर है इस बार भाजपा और कांग्रेस की केंद्र में सरकार बनाने का दारमोदार बहुत हद तक पुराने सहयोगियों के प्रदर्शन और नए सहयोगी बना पाने में उनकी सफलता पर निर्भर करेगा। इसके अलावा देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सिर्फ अहसास तक सीमट कर रह गई राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के प्रदर्शन पर भी प्रेक्षकों की निगाहें होंगी।
इन सबके बीच पंद्रहवी लोकसभा चुनाव के पूर्व एनडीए ने हरियाणा में चौटाला , असम में असम गण परिषद और उत्तर प्रदेश में चौधरी अजीत सिंह को अपने पाले में लाने में कामयाबी हासिल की । इसके साथ ही लुधियाना की रैली में टीआरएस को अपने खेमे में खड़ा कर पटनायक को अपने खेमे में लेकर खुशी मना रहे तीसरे मोर्चे को भी करारा ज़बाव दे दिया है। दूसरी तरफ कांग्रेस अब तक ऐसी कोई भी कदम बढ़ा पाने में नाकाम रही है। इसके वीपरीत उसे बिहार और उत्तर प्रदेश में राजद, लोजपा और सपा जैसी अपनी सहयोगी पार्टियों का ही सामना करना पड़ा रहा है। साथ ही समय प्रेक्षकों के मुताबिक वक्त से पहले किए गए कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेस ने द्रमुक और राजद जैसी पार्टियों को उल्टे नाराज़ कर दिया है। हालांकि चुनाव बाद की रणनीति पर कांग्रेस एक साथ कई संकेत देती है जिसमें नीतिश के साथ साथ तीसरे मोर्चे के नायडु पर भी डोरे डालने की रणनीति का खुल कर इज़हार है। लेकिन लुधियाना की रैली में नीतिश और नरेंद्र मोदी की गलबहियां ने शायद राहुल के बचपने का जबाव अपने अंदाज में दे दिया। ज़ाहिर बिना किसी तैयारी के हवा में बात करने के लिए प्रेस कांफ्रेस बुलाने का जो नतीज़ा कांग्रेस को भुगतना था तो वो भुगत रही है। नाराज़ द्रमुक को मनाने के लिए तमिलनाडु में सोनिया गांधी को एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा गया। ज़ाहिर है चुनाव बाद के हालात बहुत हद तक आने वाले चुनाव परिणामों पर निर्भर होंगे लेकिन फिलहाल भाजपा राहुल के ऐसे विचारों को कांग्रेस की कपोल कल्पना कह कर अगर ख़ारिज कर रही तो कुछ भी गलत नहीं है उसमें। कांग्रेस को अब भी बहुत होमवर्क करना होगा।
गठबंधन राजनीति के इन दिनों में केंद्र में सरकार के गठन की जिम्मेदारी बहुत हद तक क्षेत्रीय दलों के हाथों में है। यही वजह रही कि पंद्रहवीं लोकसभा के गठन की प्रक्रिया के घोषणा के साथ ही राष्ट्रीय दलों में क्षत्रपों को एक दूसरे के पाले में लाने की होड़ मच गई। दरअसल राजनीति की ये पटकथा नब्बे के दशक में ही लिख दी गई जिसका उत्कर्ष 13वीं लोकसभा में एनडीए सरकार और उसके बाद यूपीए के सरकारों के रूप में सामने आया। पंद्रहवीं लोकसभा के दौरान भी हालात बहुत बदलेगा , इसकी संभावना कम है। आने वाले समय में क्षत्रप ही अगली लोकसभा की रूपरेखा तय करने जा रहे हैं। या फिर कहें कि इनमें से ही कोई डार्क होर्स भी हो सकता है। यही वो तथ्य है जिस पर राष्ट्रीय दलों के साथ साथ क्षेत्रीय दलों के लिए भी रणनीति का निर्धारण होना है।
14वीं लोकसभा में भविष्य की राजनीति को ध्यान में रख कर इसकी शुरूआत तब हुई जब वामपंथी दलों ने परमाणु करार के मुद्दे पर यूपीए सरकार से अपना समर्थन वापस लिया। तभी से क्षत्रपों को अपने पाले में करने और पहले से ही अपने कुनबे में मौजूद क्षत्रपों को जोड़े रखने की कवायद शुरू हुई। इस दौरान मायावती, जयललिता, चंद्रबाबू नायडु , चौटाला, वृंदावन गोस्वामी, देवेगौड़ा और बाबू लाल मरांडी जैसे क्षत्रपों ने जहां तीसरे मोर्चे के ठोस स्वरूप को सामने रखा वहीं पहले से तीसरे मोर्चे के साथ रही सपा कांग्रेस के साथ आ गई जबकि एनडीए को अपने गठबंधन को बनाए रखने के लिए काफी पसीना बहाना पड़ा। और ये कि पहले से ही यूपीए में मौजूद शिबू सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चे ने अंतिम समय तक कांग्रेस को अपनी ओर ताकने को मजबूर किया।
दरअसल ये शुरूआत थी , उसके बाद भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए कई क्षत्रप अपना पाला बदल चुके हैं। ये साफ तौर पर तमिलनाडु में देखने को मिला जहां पहले डीएमके और यूपीए के साथ रहे रामदौस और वाइको अब जयललिता के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं। चुनाव के ठीक पहले बिहार में लालू और पासवान का दबे स्वर में ही सही कांग्रेस से किनारा करना और असम गण परिषद और हरियाणा में चौटाला का का एनडीए के पाले में चले जाना। साथ ही एनडीए के पाले से खिसक कर बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस के साथ महाजोट की रणनीति और उडिसा में बीजू जनता दल का एनडीए से खिसक कर तीसरे मोर्चे में शामिल होना सब इसी का हिस्सा है।
ज़ाहिर है इन क्षत्रपों के लिए अपने अपने इलाके में बेहतर प्रदर्शन करना सिर्फ अपनी ताकत बढ़ाने के लिए ज़रूरी नहीं है बल्कि दिल्ली में राष्ट्रीय दलों को अपने मुताबिक साधने के लिए भी जरूरी है। लेकिन अगर ये कमज़ोर पड़ते हैं फिर ऐसे हालात में इनके लिए केंद्रीय राजनीति में अस्तित्व का संकट भी आ सकता है। इसलिए हर हाल में इनकी कोशिश ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल कर केंद्रीय राजनीति को अपने मुताबिक मोड़ने की होगी। आप यों कह सकते हैं कि पंद्रहवी लोकसभा का स्वरूप बहुत कुछ राज्यों के इन धुरंधरों के मुताबिक तय होगा।