बुधवार, 30 दिसंबर 2009

झारखंड - मोबाइल के झरोखों से


दशम झरना





हुंडरू झरने पर लकड़ी से बने सजावटी समान को बेचते आदिवासी












गिरीडीह की एक शाम - टूंडी जंगल




रांची चाईबासा मुख्य मार्ग पर पंचघाग का मजा लेता मैं
पंचघाग यानि पांच नदियों का संगम , चौदह किमी के दायरे में फैला




हिरानी जलप्रपात ( रांची चाईबासा मुख्य मार्ग पर )


हुंडरू फॉल -- मोबाइल कैमरे की नज़र से झारखंड का सौंदर्य

झारखंड विधानसभा चुनाव 2009 के दौरान डेड़ दो महीने मुझे झारखंड मेंं रहने मौका मिला था। सात आठ सालों से दिल्ली की भागदौड़ से यूं भी मन उबा ही रहता था। ऐसे में सोचा भी नहीं था कि झारखंड की चुनावी कवरेज हमारे लिए इतना रिफ्रेशिंग होगा। झारखंड प्रवास के दौरान न केवल राज्य की राजनीतिक हलचल और चुनावी गतिविधियों पर हमारी नजर थी बल्कि हमारी नज़र राज्य के अकूत प्राकृतिक सौंदर्य पर भी था। समय मिलते ही हमलोग काम को झटक कर निकल पड़ते प्रकृति की गोद में घंटों बैठने के लिए। ऐसे ही एक दोपहर मैं अपनी टीम के सात आठ लोगों के साथ निकल पड़े थे रांची के पास ही स्थित हुंडरू फॉल को देखने। सोचा था कि शायद बेहद भीढ़ होगी, लेकिन उम्मीद के विपरीत इतनी शांत जगह, इतन सुरम्य वातावरण, और इतना ज्यादा प्राकृतिक माहौल कभी देखने को नहीं मिला था। समस्या ये थी कि हम लोग बगैर किसी तैयारी के ही निकलते थे लिहाजा फोटो ग्राफी के लिए कैमरे वगैरह का इंतजाम नहीं होता था लेकिन हाथ में एक छोटा सा मोबाइल था, उससे ही कुछ फोटो उतार लाए थे।                                                                                            
हुंडरू जल प्रपात - रांची
 झारखंड प्रवास के दौरान न केवल राज्य की राजनीतिक हलचल और चुनावी गतिविधियों पर हमारी नजर थी बल्कि हमारी नज़र राज्य के अकूत प्राकृतिक सौंदर्य पर भी था। दिल्ली से हम लोग तीन चार समूह में राज्य की चुनावी रिपोर्टिंग के  लिए झारखंड में थे। दो टीमेेें हम लोग आस पास थे लिहाजा बेहद व्यस्त चुनावी कवरेज से समय चुरा कर हम थोड़ा बहुत घुम भी आते। मजे की बात ये थी कि मैं झारखंड का वाशिंदा होने के बाद भी झारखंड को इतना करीब से नहीं देख पाया था जितने करीब से व्यस्त चुनावी रिपोर्टिंग से समय चुरा कर घुमने वक्त देख पाया। मैंने अपने जीवन के शुरूआती तकरीबन 25 साल राज्य के संथाल परगना इलाके में गुजारे थे लेकिन मुझे झारखंड के छोटानागपुर या कोल्हान इलाकों के बारे में शहरों के नाम के अलावा ही शायद कुछ पता था। पहली बार इन इलाकों में घुमने, लोगों से बात करने और इन सबसे बढ़कर उन इलाकों की प्राकृतिक      खुबसुरती को इतने करीब से देखने का मौका मिला।                                                                          


दो महीनों में तो शायद हजारों तस्वीर बनाने के मौके मिले थे लेकिन चूंकि ऐसी कोई तैयारी थी नहीं, लिहाजा छोटे से मोबाइल फोन के जरिए जितनी तस्वीरें बना पाया, उनको सुरक्षित रख लिया गया। मैं झारखंड का था लिहाजा बहुत कुछ सुना सुनाया सा था लेकिन मेरे साथ जो लोग थे उनमें से आधिकांश अन्य राज्यों के थे... उनके मूंह से झारखंड की प्राकृतिक सुंदरता की तारीफ सुनने में मजा भी आता था लेकिन इन खुबसुरत जगहों के लिए राज्य सरकार के प्रयास की नाकाफी पर भी उनका लंबा चौड़ा भाषण सुनने को मिलता था। इसी क्रम में एक दोपहर हमारा कारवां पहुंच गया रांची के पास हुंडरू जल प्रपात देखने।



हुंडरू फॉल तक पहुंचने के लिए सीढियों के माध्यम से नीचे उतरना पड़ता है। मुहाने तक लाकर आपकी गाड़ी खडी हो जाती है और आप नीचे जाते हैं। खैर गाड़ी से उतर कर हमने आस पास देखा... झोपड़ियों के बने दो तीन खाने पीने के छोटे छोटे ढाबे जैसे थे। नीचे जाने से पहले मुझे लगा कि खाने पीने का इंतजाम कर लिया जाए। मैंं उनमें से एक झोपड़ी में अंदर गया और खाने पीने के बारे में बात की। स्थानीय लोगों ने बताया कि देशी या जंगली मुर्गा आसानी से उपलब्ध हो जाएगा लिहाज सबने कहा कि देशी मुर्गा का ही मजा लिया जाए तो हमने उन्हेंं मुर्गा और चावल की व्यवस्था करने को कहा औऱ कहा कि नीचे से लौट कर आते हैं, फिर खाएंगे। तब तक आप इंतजाम कर लीजिए। इसके बाद हम सभी नीचे प्रपात देखने चल पड़े।

उतरने वक्त तो हमारा ग्रुप पूरी तरह उत्साह से लबरेज था। धपा धप सीढ़िया उतर रहा था। हर किसी को जल्दीबाजी थी प्रपात के नीचे पहुंचने की। तकरीबन बीस मिनट सीढ़ियां उतरने के बाद हम नीचे प्रपात के पास पहुंच गए।  कुछ सीढ़ियां उतरने के बाद ही हवा ठंडी हो चली थी और पानी के चट्टानों से टकराने के बाद उत्पन्न आवाज हमें और तेजी से सीढ़ियां उतरने के लिए आकर्षित भी कर रहा था। बहरहाल एक चट्टान पर बैठ हम सभी पानी के चट्टान से टकराने की आवाज में खो गए थे।

काफी देर यूं बैठे रहने के बाद देखा दूबे जी अपने कपड़े उतार चुके थे, एक आध कैमरा असिस्टेंंट भी नहाने की मुद्रा में आ चुके थे। मैंं यूं ही बैठे बैठे चट्टान पर ही लुढ़क गया। एक तो जाड़े का दिन उपर से आसमां से बरसती शरद की धूप अपना असर दिखा चुकी थी। शरीर पर आलस हावी होने लगा था। आराम से चट्टान पर आसमां की ओर निगाह किये अलसायी शीत की धूप का मजा लेने लगा। भाई लोग चट्टान के नीचे बने कूंड नुमा तालाब में उपर चट्टाने से गिरती धारा के नीचे जल क्रिड़ा का आनंद लेने में व्यस्त हो चुके थे।

यूं ही प्रकृति की उस नीरवता में चट्टान पर लेटे लेटे कब आंख लग गई पता ही नहीं चला। पता नहीं कुछ मिनटों की बड़ी गहरी नींद आई। आंख खुली तो भाई लोग वापसी में सीढ़ियां चढ़ने के लिए तैयार हो चुके थे। अपन भी उठ लिए और चल पड़े वापस। भूख भी लग रही थी। मेरा ये हाल था तो पता नहींं जो लोग नहा चुके थे उनका क्या हाल रहा होगा। बहरहाल अब वापस उन सीढ़ियों को चढ़ना किसी चुनौती से कम नहीं था। लेकिन मजे में हम लोग वापस भी हो लिए। सीढ़ियों को चढ़ने के क्रम में भूख दोगुनी चार गुनी हो चुकी थी। ऐसे में उपर बैठ उस भाई का सहारा ही था। मन में ये आशंंका भी थी कि क्या पता पहुंचने के बाद खाना मिलने में देर न हो जाए। क्योंकि अब इंतजार करने तक का धैर्य नहीं बचा था। खैर उपर भी पहुंच गए। हमें देखते ही उस झोपड़ी नुमा ढाबे में हलचल और तेज हो गई।

जल्दी जल्दी चौकी बिछाया गया। सखुवा के पत्ते की थाली सजी। दूबे जी बेचारे अलग थलग बैठ गए। उनके लिए भी दाल चावल सब्जी, अचार, पापड़ का इंतजाम था। हमलोग शहरी अदा से भोजन करने का मन लेकर बैठे थे कि दो एक पीस मुर्गा मिलेगा चावल के साथ। लेकिन ये क्या ढाबे वाले भाई साहब ने पत्ते पर पहले चावल रखा और फिर दे दना दना मुर्गा और झोर डालना शुरू किया। हम भी टूट पड़ेे। एक तो भूख और उपर से आ रही खुशबू हमें बेचैन बना रही थी। जमाने बाद ऐसा स्वादिष्ट भोजन इतना छक कर खाया। ढाबे वाले ने हमारे लिए भी मुर्गा भात के अलावा दाल, बरी, पापड, दही आदि का भी इंतजाम किया था। टूट कर भोजन हुआ। बीच बीच में भाई लोग आपस में भोजन की तारीफ में एकाध शब्द भी खर्च कर रहे थे। खैर भोजन करने के बाद जब हम पहुंचे ढाबे वाले के पास बिल चुकाने को तो सात आदमी के भरपेट स्वादिष्ट भोजन की कीमत उसने बताई सिर्फ तीन सौ रुपये। हम सभी आश्चर्यचकित रह गए। पहले तो भोजन बनाने वाले की दिल खोल कर तारीफ की और फिर पॉकेट में मौजुद हजार रुपये का नोट उससे विदा लिया। और हम निकल पड़े रांची की ओर वापिस।

मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

झारखंड का सौंदर्य - मोबाईल कैमरे की नज़र से

दशम फाल -- रांची जमशेदपुर मुख्य मार्ग पर रांची से २० - २५ किमी की दूरी पर है। कहते हैं यहां पर पहाड़ी के उपर से दस नदियों का जल पत्थर के सीने को चीरता है। प्रकृति का अद्भभूत सौंदर्य। झारखंड राज्य के इन अद्भुत नजारों से झारखंड वासी होने के बाद भी मैं वाकिफ नहीं था। 2009 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान झारखंड के तकरीबन हर विधानसभा सीट पर जाने का मौका मुझे मिला था। इसी दौरान मैंने प्रकृति के इन अद्भुत नजारों का दीदार किया। उस वक्त पूरी तैयारी नहीं थी, लिहाजा पास में मौजुद मोबाइल कैमरो से जितना संभव हो सका, तस्वीर खींच ली। उसी मोबाइल कैमरे की नज़र से ये फोटो फीचर आप सब के लिए।

दशम फॉल रांची



                           दशम फॉल के ठीक सामने पहाड़ी का दृश्य


दूर से ली गई दशम की तस्वीर



सामने उंचाई से ली गई दशम की तस्वीर



मोबाइल कैमरे से ली गई तस्वीर

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

झारखंड की सियासत - बोए पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होए


रत्नगर्भा की चुनावी जंग का परिणाम आ गया। कौन जीता , कौन हारा ? कहना आसान नहीं । भाजपा जो सबसे बड़ी पार्टी थी , कभी उसके पास दो दर्जन से ज्यादा विधायक थे ... आज भी सबसे बड़ी पार्टी है लेकिन उसके विधायकों की संख्या घट कर दो दर्जन से भी कम हो गई। कांग्रेस नौ सीटिंग विधायकों में से सात के हार जाने के बाद भी बाबु लाल मरांडी के सहयोग से अपना आंकड़ा पंद्रह तक ले जा पाने में सफल रही। उधर भाजपा की सहयोगी जनता दल युनाइटेड छह से घटकर दो तो राजद अपना आंकड़ा तकरीबन बरकरार रख पाने में सफल रही। निर्दलीयों को बहुत अधिक झटके लगे हों ऐसी बात नहीं। तकरीबन सभी जिन्होंने भंग विधानसभा में अपने जलवे बिखेरे थे एक फिर जीत के साथ विधानसभा प्रवेश की तैयारी कर रहे हैं। उधर सुदेश महतो की आजसू ने भी अपने ताकत बढ़ाए हैं। इन सबमें झारखंड मुक्ति मोर्चा सबसे अधिक मजबूत हुआ है। अगर बाबुलाल मरांडी को छोड़ दें तो।


इस आंकड़े का कई लोग अपनी अपनी तरह से विश्लेषण कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं कि कांग्रेस और जेवीएम सबसे बड़े गठबंधन के तौर पर जीत कर सामने आई लेकिन भाजपा हार कर भी सरकार बनाने की दौड़ में सबसे आगे चल रही है। ये कुछ वैसा ही है जैसा कि पिछले विधानसभा में हुआ था। भाजपा जद यू गठबंधन ३६ सीट लेकर भी महज पांच सीटों के फासले से सरकार बना पाने में असफल रही थी। जबकि कांग्रेस और राजद क्रमश नौ और सात सीट लेकर भी सरकार बना ले गए थे। कहने की जरूरत नहीं कि इसके लिए सियासत के कौन कौन से अदाएं झारखंड ने देखे। इस बार कांग्रेस के दांव पेंच से ही भाजपा ने कांग्रेस को चारो खाने चित्त कर दिया। कहते हैं न बोए पेड़ बबुल का तो आम कहां से होए। सबसे बड़े गठबंधन के बाद भी कांग्रेस मूंह फाड़े देखती रही , भाजपा शिबू को लेकर उड़ गई।




दरअसल जो अब हो रहा है , उसकी नींव बहुत पहले पड़ चुकी थी। शिबू सोरेन और कांग्रेस की बीच असहमति के बीज बहुत पहले बोए जा चुके थे। अमेरिका के साथ परमाणु करार के मुद्दे पर जब कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन को विश्वास मत का सामन करना था तब शिबु सोरेन ही उसके तारणहार बने थे। इसके बावजुद केंद्र में उस वक्त उन्हें कोई बड़ा पद नहीं मिला था। बाद में गुरू जी की जीद पर उन्हें झारखंड में मुख्यमंत्री पद से नवाजा तो गया लेकिन उनको सबक सिखाने के लिए भी कांग्रेस और राजद जैसी पार्टियों ने कमर कस लिया था। लिहाजा छह महीने के भीतर विधानसभा की सदस्यता लेने की संवैधानिक बाध्यता के तहत जब गुरू जी ने तमाड़ से चुनाव लड़ने का फैसला किया तो यूपीए के भीतरघात की वजह से वो चुनाव हार गए। ये कांग्रेस और शिबु के रिश्ते में खटास बड़ाने में अहम मोड़ साबित हुआ। जानकार बताते हैं कि विधानसभा चुनाव प्रक्रिया की शुरूआत के बाद इतना कुछ होने के बाद भी शिबु सोरेन चाहते थे कि कांग्रेस राजद और जेएमएम साथ मिलकर चुनाव लड़े। वो मानसिक रूप से इसके लिए तैयार भी थे लेकिन कांग्रेस ने झारखंड में शिबु सोरेन की हार को गुरू जी की राजनीतिक कैरियर का अंत मानते हुए बाबुलाल मरांडी के रूप में नया सहयोगी ढुढ़ लिया। अंत तक कुछ बाते ऐसी हुईं जिसमें कुछ लोग बताते हैं कि गठबंधन के लिए गुरू जी को धमकी तक दी गई जिससे नाराज़ होकर उन्होंने अकेले जाने का फैसला किया। इस बीच गुरू जी अपने पुराने रूठे हुए कुछ सहयोगियों मसलन सूरज मंडल जैसों को मना कर नई रणनीति बुनने में लग गई। हालांकि सूरज मंडल खुद पड़ैय्याहाट से चुनाव हार गए लेकिन उनके झामुमो के साथ आने से संथाल परगणा में गुरू जी को काफी लाभ हुआ , खास तौर पर झामुमो के पुराने वोट बैंक को एकजूट रखने में ।


अब यहां से राजनीतिक लाभ हानि का दूसरा अध्याय प्रारंभ हुआ। कांग्रेस जेवीएम गठबंधन से सबसे ज्यादा नुकसान अगर किसी को हो सकता था तो वो जे एम एम और भाजपा थी। लिहाजा इन दोनों दलों ने सामने से तो नहीं , लेकिन परदे के पीछे आपस में मदद से चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया। इसमें ध्यान देने की बात है कि जेएमएम और जेवीएम दोनों के लिए संथाल परगणा और उत्तरी छोटानागपुर राजनीतिक हैसियत के लिहाज़ से महत्वपूर्ण थे। लिहाज़ा भाजपा ने ऐसे इलाके में कमज़ोर प्रत्याशी खड़े कर एक तरह से शिबू सोरेन को अंदर ही अंदर मदद किया। आप नतीजों के विश्लेषण से पाएंगें कि संथाल परगणा में अधिकांश सीटों पर ऐसा ही हुआ। मसलन मधुपुर जहां से भाजपा के राज पलिवार पिछली बार जीते थे वहां से दुबारा उन्हें न उतार कर राजनीतिक रूप से नौसखिया अभिषेक आनंद झा को टिकट देने के पिछे कहीं न कहीं झामुमो के हाजी हुसैन अंसारी को जीताने का लक्ष्य था। हुआ भी वही। जाहिर है जब अधिकांश सीटों पर चतुष्कोणीय मुकावला हो तो दो पार्टियों के आपसी समन्वय से सीट निकालना बहुत आसान रह जाता है। बहरहाल इसमें पेंच ये था कि भाजपा मान कर चल रही थी कि संथाल परगणा और उत्तरी छोटानागपुर जैसे कुछ इलाकों में आठ दस सीट गंवाने के बावजुद उसके पास कोयलांचल, कोल्हान और छोटानागपुर जैसे इलाकों से तकरीबन तीस सीटें आ जाएंगी और नीतिश के जलवे से दक्षिणी छोटानागपुर के इलाके जो बिहार से सटे हैं वहां से चार पांच सीटें जद यू को आ जाएंगी तो शिबू सोरेन को अपनी शर्तों पर सरकार में शामिल कर भाजपा की सरकार बना ली जाएगी। इसमें फार्मुला ये था कि दुमका से शिबु के बेटे हेमंत को जीता कर उप मुख्यमंत्री का पद दे दिया जाए और भाजपा का मुख्यमंत्री बना कर शिबु सोरेन को संयोजक बनाया दिया जाए। परिणाम आने के पहले भाजपा तकरीबन ये मान कर चल रही थी कि शिबु सोरेन इस पड़ाव पर अपनी राजनीतिक लाभ हानि के बजाए अपने बेटे और बहु के कैरियर को लेकर ज्यादा चिंतित होंगे लिहाजा बहु को कोई बढ़िया मंत्रालय और बेटे को डिप्टी सीएम देने के बाद उनको संयोजक जैसा कोई पद देने के बाद मनाना आसान होगा। इसके साथ ही ये मान कर भी भाजपा चल रही थी कि कांग्रेस से खर खाए बैठे गुरू जी उनके तरफ इतने पहल से तो मान ही जाएंगे।

अब परिणाम आने के बाद तीसरा अध्याय शुरू हुआ। इसमें शिबू के पास इतनी सीटें आ गईं कि उनको बिना खुश किए कोई भी दल या गठबंधन सरकार नहीं बना सकती थी। परिणाम ऐसा था कि कांग्रेस - जेवीएम, राजद , और शिबू प्राकृतिक तौर पर एक साथ आकर स्थायी सरकार की दिशा में पहल कर सकती थीं। ये स्वभाविक भी था लेकिन इसमें कई पेंच था। सबसे बड़ा पेंच था कि शिबु मुख्यमंत्री पद से नीचे मानने को तैयार नहीं थे। ये स्वभाविक भी था क्योंकि गुरू जी अपनी ताकत न केवल बचाने में सफल रहे थे बल्कि उससे आगे भी जा चुके थे। उधर कांग्रेस और जेवीएम स्वभाविक विजेता बन कर उभरी थी। लिहाजा कांग्रेस अब किंगमेकर से ज्यादा किंग बनने के सपने देख रही थी। ये भी स्वभाविक था। तीसरी तरफ बाबुलाल के लिए शिबू सोरेन उस कीमत तक ही पसंद थे जहां तक वो कांग्रेस जेवीएम को सरकार बनाने में समर्थन दे। उससे आगे इतनी सफलता के बाद न तो कांग्रेस और न ही जेवीएम शिबू को मुख्यमंत्री पद पर राजी हो सकती थी। ज़ाहिर है बाबुलाल अपनी भविष्य की राजनीति के लिए भी चिंतित थे। दूसरी तरफ कांग्रेस इस मुगालते में थी कि कैबिनेट में शिबू को एक पद देकर और बेटे को उप मुख्यमंत्री का पद देकर साथ ही विभिन्न मुकदमों का डर दिखाकर अपने साथ ला पाने में सफल रहेंगे। लेकिन जिस तरह गुरू जी ने मतगणना के दिन ही ये कहकर कि सरकार न तो दिल्ली में बनेगी और न ही रांची में बल्कि सरकार जिसे बनाना है वो बोकारो आए, अपने संकेत बिल्कुल साफ कर दिए। सफलता के रथ पर सवार कांग्रेस को इन संकेतों में समझने में देर हो गई।


अब बारी थी भाजपा की। जिसके पास राज्य में खोने के लिए कुछ भी नहीं था। ज़ाहिर है पिछले सात आठ सालों में जितने बूरे दिन भाजपा ने देखे हैं , इतने विधायक होने के बाद भी , उतने किसी ने नहीं देखे। लिहाजा शिबू के संकेतों को साफ साफ पड़ते हुए भाजपा ने पलटती बाजी को अपने नाम करने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई। जो पिछली बार कांग्रेस ने किया था बिल्कुल उसी अंदाज में भाजपा ने इस बार कांग्रेस को पटखनी दे दी। इसमें गुरू जी मुख्यमंत्री होंगे और आजसू के सुदेश महतो और भाजपा का एक एक डिप्टी सीएम होगा। राज्य में उसकी सरकार तो होगी।


इन सबमें बाबुलाल रह गए। सबसे ज्यादा सफलता हासिल कर भी विपक्ष में रहना पड़ा। कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि अगर बाबुलाल अकेले लड़े होते तो दो दर्जन से ज्यादा विधायक उनके साथ होते। अगर आपको लगता है कि झारखंड में सब कुछ सामान्य हो गया तो आपको भी सोचने के लिए कुछ बातें दे देता हूं। आखिर अब तक झारखंड में यूपीए की मुखालफत करने वाले बाबुलाल अंतिम वक्त में कांग्रेस की गोद में क्यों बैठे ? कांग्रेस के पुराने नौ विधायकों में से सात हार गए। हारने वालों में प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बालमुचू, विधायक दल के नेता मनोज यादव, राज्य में कांग्रेस का अल्पसंख्यक चेहरा फुरकान अंसारी, दिग्गज थामस हांसदा, बागुन सुम्ब्रई आदि बड़े बड़े नेता। फिर भी कांग्रेस का आंकड़ा एक दर्जन के उपर गया। मतदान के दिनों में आखिरी घंटों में मतदान का प्रतिशत पंद्रह से बीस फीसदी भागता रहा। ज़ाहिर है झारखंड में सोचने और लिखने के लिए बहुत कुछ है। आगे फिर कभी।

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

मुस्लिम प्रधानमंत्री का लॉलीपॉप - यूसुफ़ अंसारी

कांग्रेस के महासचिव और भविष्य में प्रधानमंत्री पद के सबसे मज़बूत दावोदार और उम्मीदवार राहुल गांधी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में ये कह कर मुसलमानों को रिझाने की कोशिश की है कि मुसलमान भी देश का प्रधानमंत्री बन सकता है। प्रधानमंत्री बनना धर्म नहीं बल्कि क़ाबिलियत पर निर्भर करता है। ये बात उन्होंने एक सवाल के जवाब में ये बात कही है। राहुल गांदई ने कहा तो ठाक ही है। किसी मुसलमान के प्रधानमंत्री बनने पर न संविधान में कोई रोक है और न ही क़ानून में। प्रधानमंत्री बनना राजनीतिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। राहुल के बयान से एक नई बहस छिड़ी है। ये बहस कहीं न कही देश को 1947 तक ले जाती है। देश का बंटवारा ही इस बात को लेकर हुआ कि प्रधानमंत्री कौन हो। अगर उस वक्त जवाहर लाल नेहरू महात्मा गांधी की बात मानते हुए मोहम्मद अली जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने के लिए राज़ी हो जाते तो देश का विभाजन टल सकता था। ये सवाल उस वक्त जितना महत्वपूर्ण था आज भी उतना ही महत्वपूर्ण हैं।
पहले इस बात पर ग़ौर किया जाए कि क्या देश में कोई मुस्लिम राजनेता ऐसा है जिसमें प्रधानमंत्री बनने के गुण दिखते हों। जिस पर देश भरोसा कर सके कि ये व्यक्ति देश की बागडोर संभालने की क्षमता रखता है। दूसरा सवाल ये है कि ये तय कौन करेगा कि किस व्यक्ति में प्रधानमंत्री बनने की क्षमता है। मनमोहन सिंह मे प्रधानमंत्री बनने की क्षमता है इसका फैसला 2004 में कंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने किया था। लेकिन क्या मनमोहन सिंह सिर्फ क़ाबिलियत के भरोसे प्रधानमंत्री बनाए गए। अगर हां तो क्या प्रणव मुख्रर्जी मे प्रधानमंत्री बनने की क्षमता नहीं थी या इस वक़्त नहीं है। अगर नहीं तो फिर क्यों पिछली सरकार में प्रणव मुखर्जी को 60 से ज़्यादा मंत्रियों के समूह की अध्यक्षता क्यों सौंपी गयी। प्रणव मुखर्जी को अगर क़ाबिलियत के होते हुए प्रधानंमत्री बनने का मौक़ा नहीं मिला तो इस लिए कि वो इंदिरा गांधी की मौत के बाद के बाद प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे और राजीव को प्रधानमंत्री बनाए जाने के विरोध में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी थी। उसके बाद वो कांग्रेस में वापिस तो आ गए लेकिन सोनिया गांधी का भरोसा उस हद तक नहीं जीत पाए कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ पाते। ज़ाहिर है कि वो कभी दस जनपथ के उतना वफादार नहीं रहे जितने मनमोहन सिंह रहे। वफादारी क़ाबिलियत पर भारी पड़ी। राहुल गांधी में प्रधानमंत्री बनने के तमाम गुण मौजूद हैं क्योंकि वो ख़ुद ऐसे घर मे पैदा हुए हैं जिसने देश को तीन प्रधानमंत्री दिए हैं। राहुल गांधी की टीम के तमाम लोगों की सबसे बड़ी क़ाबिलियत उनका मंत्रियों के घरों मे पैदा होना ही है। राहुल गांधी की टीम में ज़्यादातर वहीं हैं जिनेक पिता राजीव गांधी या फिर इंदिरा गांधी के मंत्रीमंडल में रहे हैं। मंत्री बनने लायक क़ाबिलियत तो किसी मुसलमान मे हो सकती है लेकिन वो प्रधानंमत्री बनने लायक क़ाबिलियत कहां से लाए। प्रधानमंत्री तो कोई मुसलमान पहले हुआ ही नहीं।
चलो मान भी लें कि मुसलमान प्रधानमंत्री बन सकता है तो क्या राहुल गांधी बताएंगे कि वो शुभ दिन कब आएगा। मुझे तो अगली आधी सदी इसकी कोई उम्मीद नज़र नहीं आती। अभी केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार है। इसका कार्यकाल 2014 तक है। इसके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं। यानि 2014 तक तो मनमोहन सिंह ही प्रधानमंत्री रहेंगे। उसके बाद अगर कांग्रेस की अकेले या फिर उसके गंठबंधन की सरकार बनती है तो प्रधानंमत्री खुद राहुल गांधी हो जाएंगे। अल्लाह उन्हें उम्र दराज़ करे तो कम से कम अगले चालीस साल तो कांग्रस मे उऩके अलावा प्रधनंमत्री पद के लिए किसी और का नंबर आने से रहा। बीजेपी तो मुसलमान के नाम से वैसे ही बिदकती है। लिहाज़ा उसकी तरफ से ऐसी किसी ग़लती की उम्मीद एकदम नहीं है। बचे बाक़ी दल तो उनमें मायावती, शरद पवार, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव और रामविलास पासवान ख़ुद ही प्रधानमंत्री पद की दावेदारी ठोकते हैं। वो भला क्यों किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाने की वकालत करेगें। राम विलास पासवान तो बिहार में मुस्लिम मुख्यमंत्री का नारा देकर नतीजे भुगत चुके हैं। 2005 में पासवान ने बिहार वॆदान सभा में 29 सीटें जीती थी। अपना समर्थन देने के लिए उन्होंने लालू यादव और नीतीश कुमार के सामने किसी मुसलमान को मुख्यमंत्री बनाने की मांग रखी और उस पर अड़ गए। नतीजा क्या हुआ ? उसी साल हुए दोबारा हुए विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी सिर्फ़ 8 सीटों पर सिमट गयी। लोक सभा में पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया, खुद अपना चुनीव भी वो हार गए।
दर असल मुसलमानों के राजनीतिक सशक्तिकरण को लेकर अब कोई पार्टी गंभीर नहीं हैं। सबको अपना वोट खिसकने का डर रहता है। कांग्रेस अब पहले की तरह गंभीर नहीं रह गयी है। इसकी एक वजह उसका देशभर में कमजोर होना भी हो सकती है। क्योंकि ये सच है कि एक ज़माने में मुसलमानों के सशक्तिकरण के लिए कांग्रेस ने ही क़दम उठाए। कम ही लोग जानते हैं कि आज़ादी के बाद जम्मू-कश्मीर को छोड़कर देश के 6 राज्यों में मुस्लिम मुख्यमंत्री हुए हैं। एक को छोड़ कर सभी कांग्रेस के रहे। ये सारे मुख्यमंत्री तब हुए जब कांग्रेस की कमान इंदिरा गांधी के हात में थी। सबसे पहले राज्स्थान में बरकतुल्लाह ख़ान जुलाई 1971 से अगस्त 1973 तक दो साल से ज़्यादा मुख्यमंत्री रहे। उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर में मोहम्मद अलीमुद्दीन मार्च 1972 से मार्च 1973 तक क़रीब साल भर तक कांग्रेस से मुख्यमंत्री रहे। बाद में वो मणिपुर पीपुल्स पार्टी की तरफ से 1974 में मार्च से जुलाई तक चार महीने के लिए मुख्यमंत्री बने। बिहार में अब्दुल ग़फूर जुलाई 1973 से अप्रैल 1975 तक क़रीब पौने दो साल मुख्यमंत्री रहे। केरल मे कांग्रेसक के समर्थन से अक्टूबर 1979 से दिसंबर 1979 तक क़रीब तीन महीने तक मुस्लिम लीग के सी एच मोहम्मद कोया मुख्यमंत्री रहे। महाराष्ट्र में ए आर अंतुले जून 1980 से जनवरी 1982 तक क़रीब डेढ़ साल मुख्यमंत्री रहे। असम में अनवरा तैमूर दिसंबर 1980 से जून 1981 तक क़रीब सात महीने तक मुख्यमंत्री रहीं। हालांकि कोई भी मुस्लिम मुख्यमंत्री अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया लेकिन इनके बाद किसी भी राज्य में कोई मुस्लिम मुख्यमंत्री बना ही नहीं। किसी में इतनी क़ाबिलियत नहीं थी या हालात ऐसे नहीं रहे। या फिर कांग्रेस नेतृत्व में किसी मुस्लिम को मुख्यमंत्री बनाने की इच्छा शक्ति बाक़ी न रही।
इस देश को उन 10 से 15 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले राज्यों में मुस्लिम मुख्यमंत्री देने वाली कांग्रेस आज किस मुक़ाम पर खड़ी है ? कांग्रेस संगठन की बात करें तो आज कांग्रेस में एक भी प्रदेश अध्यक्ष मुसलमान नहीं हैं। किसी भी राज्य में विधायक दल का नेता मुसलमान नहीं है। केंद्रीय संगठन पर ग़ौर करे तो यहां भी मुसलमानों की कमी साफ जलकती है। हालांकि पार्टी में सोनिया गांधी के बाद उनके राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ही सर्वेसर्वा हैं। लेकिन संगठन मे मुसलमानों का नुमाइंदगी के तौर पर 9 में से सिर्फ़ दो महासचिव हैं- ग़ुलाम नबी आज़ाद और मोहसिना क़िदवई। पार्टी के 8 स्वतंत्र प्रभारियों में से एक भी मुसलमान नहीं हैं। पार्टी के 39 सचिवों में पांच मुसलमान हैं- परवेज़ हाशमी, शकीलुज़्जमां अंसारी, अब्दुल मन्नान अंसारी, महबूब अली क़ैसर और मिर्ज़ा इरशाद बेग। यूपीए सरकार की बात करें तो मनमोहन सिंह के नए मंत्रीमंडल में मुसलमानों की हिस्सेदारी उनके पिछले मंत्रीमंडल से कम हो गयी है। पिछली बार तीन मुस्लिम केबिनेट मंत्री थे इस बार कुल दो हैं। इनमें एक ग़ुलाम नबी आज़ाद और कांग्रेस के हैं और दूसरे फारूक़ अब्दुल्लाह सहयोगी दल नेश्नल कांफ्रेस से। एक स्वतंत्र प्रभार के साथ राज्य मंत्री सलमान खुर्शीद हैं। सरकार में एक केबिनेट और दो राज्यमंत्री सहयोगी दलों की तरफ से हैं। जो पार्टी जीते हुए सांसदों को मंत्री बनाने से कतराती है उससे किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाने की उम्मीद रखना बेमानी है। अब तो कांग्रेस मुसलमानों तको राज्यपाल तक बनाने मे कंजूसी करने लगी है। झारखंड के राज्य पाल सैयद सिब्ते रज़ी का कार्यकाल पूरा होने बाद देश में कोई मुस्लिम राज्यपाल नहीं होगा। अभी तक तो किसी की नियुक्ति हुई नहीं है।
कांग्रेस को तो टिकट देने लायक क़ाबिल मुसलमना तक नहीं मिलते। 2007 मे गुजरात विधानसभा चुनाव मे पार्टी ने डरते डरते 7 मुसलमानों को टिकट दिए उनमे से 6 जीत गए। हाल ही में हुए हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस ने क़ाबिलियत नहीं होने का बहाना बना कर मुसलमानो को कम टिकट दिए। दरअसल 2005 में कांग्रेस ने पांच टिकट मुसलमानों को दिए थे जिनमे केवल एक ही जीत पाया था, वो पूरी विधानसभा मे अकेला। लिहाजा इस बार उसने तीन ही टिकट दिए उनमे एक जीता। चार और जीत गए। इसी तरह महाराष्ट्र में में कांग्रेस ने मुसलमानों के कम टिकट दिए लेकिन उनकी जीत का रिकार्ट पार्टी के आंकलन से कहीं बेहतर साबित हुआ। सावल ये है जब टिकट के बंटवारे में ही आप नाम तकाट देंगे तो हिस्सेदारी के लिए आगे कितने लोग बंचेंगे। किसी भी चुनाव मे टिकटों के बंटवारे के वक़्त पार्टी में आम सोच ये रहती है कि किसी मुसलमान को टिकट देने से ध्रुवीकरण हो जाएगा और इससे कांग्रेस को नुक़सान होगा। यानि पार्टी को अपने ही कार्यकर्ताओं, समर्थकों और वोटरों की धर्मनिरपेक्षता पर ही भरोसा नहीं हैं।
मुसलमानों को राजनीति मे हिस्सेदारी देने के मामले में राहुल गांधी कितने गंभीर हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस राहुल टीम की बात मीडिया में उछाली जाती है उसमें एक भी मुसलमान नहीं। राहुल गांधी की पहल पर लोकसभा चुनाव में पार्टी ने युवक कांग्रेस से दस टिकट दिए इनमें एक भी मुसलमान नहीं था। नौजवान सांसद हमदुल्लाह सईद को टिकट उनके पिता पीएम सईद की मौत की वजह से मिला। विधान सभा चुनाव में किसी भा राज्य में राहुल गांधी ने किसी मुस्लिम नौजवान के लिए टिकट की वकालत नहीं की। दरअसल राहुल गांधी अलीगढ़ में अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार पढ़े लिखे मुस्लिम नौजवानों से रूबरू हुए। उन्हें वहां मुसलमानों से जुड़ें कई अहम मुद्दों पर तीखे सवालों का भी सामना करना पड़ा। ऐसे ही तीखे सवाल के जवाब में उन्होंने मुस्लिम प्रधानमंत्री बनने की बात कह दी। इसका ये मतलब नहीं है कि वो किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनानाचाहते हैं। राहुल गांधी ने 2012 वलिधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने का संकल्प लिया है। इसके लिए उन्हे मुस्लिम वोटों की ज़रूरत है। पिछले चुनाव में वो टोपी लगा कर देवबंद की सड़कों पर घूमे थे। लेकिन वहां उन्हे वोट नहीं मिला। क्या मुस्लिम प्रधानमंत्री झूठा ख़्वाब दिखा कर वो मुसलमानों के वोट हासिल कर सकते हैं ? शायद नहीं। उन्हें ये समझना होगा कि मुस्लिम प्रधानंमत्री का लॉलीपॉप थमा कर वो कांग्रेस के लिए मुसलमानों की हमदर्दी तो हासिल कर सकते हैं लेकिन उनका वोट नहीं। मुसलमान आज समाज के दूसरे तबक़ों की तरह सत्ता में हर तरह से अपनी हिस्सेदारी चाहता है। मुसलमानों का वोट हासिल करने के लिए राहुल गांधी को ये सुनिश्चित करना होगा कि कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली सरकार इस कसोटी पर खरी उतरे।
(लेखक ज़ी न्यूज़ के सहायक संपादक हैं।)

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

धनगर्भा की सियासी जंग - कागज की तलवार

कल एक बार फिर झारखंड पहुंचा। ज़ाहिर है प्रदेश में चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। अखाड़े में हर योद्धा ताल ठोंक रहे हैं लेकिन इन सबके बीच मधु कोड़ा के खिलाफ खुल गए पैसे के खेल ने मामले को और भी दिलचस्प मोड़ पर ला खड़ा किया है। दरअसल राष्‍ट्रीय फलक पर मधु कोड़ा फिलहाल झारखंड की राजनीति में अकेले खलनायक भले ही दिख रहे हों लेकिन झारखंड को जानने वाले ये बात भली भांति जानते हैं कि न तो वो अकेले खलनायक हैं और न ही ये खेल झारखंड के परिदृश्य पर कोई नया है। कई नाम हैं जो पांच चरण के चुनाव के दौरान हो सकता है सामने आए, लेकिन इस भुलावे में मत रहिएगा कि वो नाम भी सामने आएँगे जो वास्तव में कहीं दूर बै‌ठे रांची का ये खेल खेल रहे थे। सही मायनों में अगर देखा जाए तो मधु कोड़ा का नाम सामने आना , कहीं भी झारखंड में पारदर्शी हो रहे सरकारी व्यवस्था या ईमानदारी होती व्यवस्था का नमूना नहीं है। बल्कि धूमिल की पंक्ति को अगर उधार लें तो .... सरल सूत्र उलझाऊ निकले बापू जी के तीन बंदर , वाली पंक्ति को ही चरितार्थ करता है।

मतलब ये कि कोड़ा सियासी चाल के एक मोहरे भर हैं जिसके जरिए ये दिखाने की कोशिश हो रही है कि पिछले कुछ सालों से झारखंड में लूट का जो सियासी खेल चला , हम उसके हिस्सा नहीं है। हमारा दामन साफ है। यानि की मेरी कमीज मैली नहीं है। और सबसे बड़कर अब झारखंड की जनता को उनकी सियासी किस्मत हमारे हाथ में सौंप देना चाहिए ताकि हम उनका विकास कर सकें। और इसके बाद चुनाव पर्व निपट जाएगा। अगर एक पार्टी या गठबंधन को सत्ता मिल गई तो भी और नहीं मिला तो भी ये सिलसिला चलता रहेगा। मधु कोड़ा का मामला चारा घोटाले की तरह वक्त की धूल के नीचे कहीं दब जाएगा। जनता यूं ही कराहती रहेगी। और ये नहीं हुआ तो अभी गला फाड़ फाड़ कर ईमानदारी की दुहाई देने वाले साथ बैठकर फोटो खिंचवाएंगे और जनता के हित में एक स्थायी सरकार बनाने के लिए इधर उधर स्थानांतरित होते रहेंगे। हमारे आपके हाथ में आएगा क्या कद्दू । इसलिए इन राजनेताओं के झांसे से बचिए लेकिन आपके पास विकल्प भी तो नहीं। आखिर किसी को तो चुनिएगा। जिसको चुनिएगा वही दुहेगा। आगे कुछ अच्छा मिलेगा तो आपको भी बताउंगा। इति

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

झारखंड में संभावित सिंगूर की आशंका में मित्तल चले टाटा की राह

झारखंड से खबर आ रही है कि इस्पात आईकान मित्तल टाटा की राह पर चल निकले हैं। झारखंड की खूंटी ज़िले के टोरपा में मित्तल की प्रस्तावित चालीस हज़ार करोड़ की एकीकृत स्टील प्लांट की योजना को पलिता लग सकता है। दरअसल विस्थापन विरोधी समुहों द्वारा स्टील प्लांट के पुरज़ोर विरोध की वजह से मित्तल ने प्लांट को झारखंड में ही कहीं और ले जाने का तो फैसला कर लिया है लेकिन अगर बात फिर भी नहीं बनी तो हो सकता है राज्य को चालीस हज़ार करोड़ रूपए की इस महत्वपूर्ण परियोजना से हाथ धोना पड़ जाए।

मित्तल को अपनी इकाई लगाने के लिए छह हज़ार एकड़ जमीन की जरूरत थी लेकिन विस्थापन विरोधी कुछ आंदोलनकारियों ने इसके लिए ज़मीन देने से ये कह कर इंकार कर दिया है कि वो किसी प्लांट की स्थापना के लिए किसी भी कीमत पर अपनी खेतिहर ज़मीन नहीं देंगे। लिहाज़ा मामल फंस गया है। वर्ष २००५ में मित्तल ने झारखँड सरकार के साथ १२ मिलियन टन उत्पादन वाली स्टील प्लांट लगाने संबंधी एक समझौते पत्र पर हस्ताक्षर किया था। हालांकि फिलहाल प्लांट के लिए किसी वैकल्पिक स्थान का चयन नहीं किया गया है।

सोमवार, 21 सितंबर 2009

बिहार में खुलेगा एएमयू का कैंपस

मुख्यमंत्री ने दिए सौ एकड़ जमीन

किशनगंज में होगा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय

उन्नीस सितंबर को बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उप कुलपति प्रो. पी के अब्दुल अजीस को पत्र लिखकर राज्य के किशनगंज ज़िले में विश्वविद्यालय को सौ एकड़ ज़मीन देने का प्रस्ताव किया है। मुख्यमंत्री ने उप कुलपति को लिखे अपने पत्र में कहा है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के बिहार में सेंटर खोलने के प्रस्ताव से उन्हें खुशी हुई है और इसके लिए उनकी सरकार बिहार के मुस्लिम बहुल किशनगंज ज़िले में सौ एकड़ का जमीन मुफ्त उपलब्ध कराने को तैयार है। इससे शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े रह गए इस ज़िले को और ख़ासतौर पर अल्पसंख्यक समुदाय को लाभ होगा। ज़ाहिर है शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ते गए बिहार के लिए सरकार की तरफ से ईद का तौहफा है। इसके साथ ही उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से अपील की है कि वो इस कार्य को जल्द से जल्द मुकाम तक पहुंचाएं।

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

नीतिश जी संभलिए वरना ...


बिहार विधानसभा की 18 सीटों के लिए हुए उपचुनावों के परिणाम को देखते हुए ये कहने में गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि लालू प्रसाद और रामविलास पासवान ने अच्छा प्रदर्शन किया है जबकि सत्तारुढ़ जद (यू) और बीजेपी को झटका लगा है । 18 सीटों पर हुए उपचुनावों में आरजेडी को छह और लोक जनशक्ति पार्टी को तीन सीटें मिली हैं । दूसरी तरफ़ पिछले लोकसभा चुनावों में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली जद यू को मात्र तीन और बीजेपी को दो सीटें मिली हैं। इसके अलावा कांग्रेस दो सीटें निकालने में कामयाब रही तो बहुजन समाज पार्टी भी एक पर जीत दर्ज़ करने में सफल रही जबकि एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में गई।


बिहार में पिछले लोकसभा चुनावों में जद यू और बीजेपी के गठबंधन ने 40 में से 33 सीटें जीती थीं जबकि राजद को मात्र तीन सीटों से संतोष करना पडा था। रामविलास पासवान की लोजपा का सुफड़ा साफ हो गया था। इसके मद्देनज़र विधानसभा उपचुनाव के परिणाम काफ़ी चौंकाने वाले हैं। कुछ प्रेक्षक इसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासन की ख़ामियों और लालू प्रसाद की वापसी के तौर पर देख रहे हैं। परिणाम इसलिए भी चौंकाने वाले हैं कि इसमें लालू और रामविलास की जीत जीतना नहीं दिख रहा है उतना नीतिश की हार दिख रही है। ज़ाहिर छवि गढ़ने में माहिर नीतिश को बिहार की जनता की तरफ से पहला झ‍टका मिला है। इसका महत्व इस बात में नीहित है कि नीतिश अपने कार्यकाल में काम के जो दावे कर रहे हैं उससे बिहार की जनता उतनी प्रभावित नहीं है जितनी कि मीडिया।


परिणामों के बाद नीतीश कुमार का कहना था कि वो अपने काम से नहीं डिगेंगे और विनम्रता से परिणामों को स्वीकार करते है । उनका कहना था कि वो अपने बाकी के कार्यकाल में पूरी लगन से काम करते रहेंगे और फिर जनता के पास काम के साथ जाएंगे। ज़ाहिर है ये बेहतरीन स्परीट है लेकिन ये काम दिखता भी रहना जरूरी है। नीतिश जी को समझना होगा कि विकास के प्रति बिहार की जनता की भूख बढ़ चुकी है। पुराने समीकरणों से बिहारी अब संतुष्ट नहीं होने वाले। सड़क और कानून व्यवस्था शुरूआत के लिए तो ठीक है लेकिन यही मंजील नहीं हो सकती। जिस तरह लोगों ने लालू से आज़िज आ कर नीतिश को कुर्सी थमाई उन्हें लगा कि उन्हें कूंजी मिल गई लेकिन कूंजी के पीछे की सच्चाई बदलाव को वो पूरी तरह नहीं समझ पा रहे लगता है। राजनीति के उन्हीं पुराने समीकरणों से बिहारियों की क्षुधा संतुष्ट नहीं की जा सकती नीतिश जी। साथ ही बिहारी जनता अब बीस साल इंतजार करने के मूड में भी नहीं है। डेलिवर कीजिए नहीं तो रास्ता नापिए।
कल तक राजद की मलाई चाट रहे श्याम रजक और रमई राम किस क्राइटेरिया में आपकी पार्टी के टिकट के अनुरूप हो गए। भाई भतीजा को टिकट नहीं देने की बात तो समझ में आई लेकिन पुराने घाघों को जिनसे आज़िज आ कर आपका कुर्सी दी थी , उन्हीं को फिर से स्थापित करने में आपने कौन सी समझदारी दिखाई ? जिस जातिवादी राजनीति से बिहार तंग आ चुका था आप भी महा - आयोग आदि कदम उठा कर कहीं न कहीं उसी को मजबूत करते दिख रहे हैं। किसी पत्रकार मित्र ने ये तो कहा कि तमाम ठेकों , जनवितरण प्रणाली आदि के ठेकों तक में आप इस बात का ध्यान रख रहे हैं। मुझे नहीं पता कि हकिकत क्या है लेकिन आप तो छवि गढ़ने में माहिर हैं जरा ध्यान रखिएगा। जिन पुराने रास्तों पर चलकर लालू रसातल पहुंचे उस पर चलना अच्छा या कि नए रास्ते चुने जाएं। पांच साल का वक्त एक राष्ट्र के इतिहास में मायने नहीं रखता है लेकिन संदेश देने के लिए ही सही, बहुत ज़्यादा है। भरोसा जीतने के लिए ये लंबा समय होता है। शेरशाह इन्हीं पांच सालों में इतिहास में अमर हो गए। आप पर ज़िम्मेदारी ज्यादा है नीतिश जी, बिहार के लिए इतिहास के इस संक्रमण काल में नेतृत्व आप के हाथ में है ... इतिहास के कूड़ेदान में जाना है या मगध की गौरवकीर्ती वापस लानी है .... आपको ही तय करना है। हमारा क्या हम तो लिखते रहेंगे कुछ न कुछ .... आप तो गौरवशाली अतीत का पुननिर्माण कर रहे हैं। आपकी हार से आप से ज्यादा हम व्यथित हैं। संभालिए वरना ....


दूसरी तरफ़ लालू प्रसाद इन परिणामों से प्रसन्न दिखे और अपने चिरपरिचित अंदाज़ में कहा कि ये सेमी फ़ाइनल है और अगले विधानसभा चुनावों में राज्य में राजद की सरकार बनेगी. ज़ाहिर है बैकफूट पर खेल रहे लालू विकास की टीआरपी भी समझ चुके हैं। ऐसे में लालू हो या नीतिश मायने नहीं रखता है जो विकास की राह पर दौड़ने का माद्दा दिखाएगा सत्ता उसकी होगी। लड़ाई व्यक्तित्व के खांचे से निकल कर कृतित्व के दायरे में आ चुका है। नीतिश को ये सोचना होगा कि बिहार में उनको जनादेश किस लिए मिला है ? अगर वो राजनीति के उन्हीं पुराने प्रतिमानों को आज़माना चाहते हैं जिनका मुलम्मा छुट चुका है तो वो भुलावे में हैं। बिहार में नीतिश को मिला जनादेश बदलाव के लिए था न कि उनके व्यक्तित्व पर वो जनमत सर्वेक्षण था। उन्हें आगे जीतते रहना है तो ये सोचना होगा कि बदलाव की अभिव्यक्ति के लिए कौन से नए मुहावरे गढ़े जाएं। ज़ाहिर है उपचुनाव के ये परिणाम नीतिश को सही राह पर लाने के लिए बिहार की जनता की तरफ से एक झ‍टका है , अगर फिर भी नहीं संभले तो इससे भी बूरे परिणाम के लिए उन्हें तैयार रहना चाहिए।

सोमवार, 3 अगस्त 2009

१५वीं लोकसभा - पटकनी खाता सत्ता पक्ष - ५

अगर एक वाक्य में कहें तो प्रधानमंत्री का भाषण निस्संदेह शानदार था। ख़ासतौर पर पाकिस्तान के साथ दुबारा बातचीत शुरू करने के संबंध में उनके तर्कों का जबाव विपक्ष के पास भी नहीं था। प्रधानमंत्री अपनी चिर परिचित शैली से अलग हटकर बोले। शांत और सौम्यता के बीच विपक्ष पर आक्रामक अंदाज में चुटकी भी ली। इस संदर्भ में अपने पूर्ववर्ती वाजपेयी का ज़िक्र करते हुए उनके नक्शेकदम पर चलने की बात कहकर उन्होंने विपक्ष के हथियार की धार ही खत्म कर दी। बहरहाल अंतिम उपयोगकर्ता निगराणी समझौते ( एंड यूज़र मानिटरिंग एग्रिमेंट ) पर प्रधानमंत्री का तर्क बहुतों के गले नहीं उतरने लायक था।
इस मुद्दे पर उनका कहना था कि अमेरिका के साथ हथियारों और रक्षा से जुड़े उच्च स्तर की अत्याधुनिक प्रणाली की आपूर्ति के संबंध में नब्बे के के दशक से ही भारत की सरकारें इस तरह के समझौते करती आई हैं। इस बार भी अमेरिका के साथ किए गए समझौते में भारत की संप्रभुता और प्रतिष्ठा का ख्याल रखा गया है। इस समझौते में अमेरिका एकतरफा कोई कार्रवायी नहीं कर सकता है खासतौर पर रक्षा प्रतिष्ठानों की जांच के संबंध में। इसके लिए अमेरिका को पहले भारत से औपचारिक अनुरोध करना होगा और भारत की अनुमति और द्वपक्षीय सहमति से ही वो कोई जांच कर सकेगा। इसके बाद प्रधानमंत्री जी आठ के सदस्यों द्वारा संवर्द्धण और परिशोधन तकनीक के हस्तांतरण से संबंद्ध भारत की निशस्त्रीकरण के मुद्दे पर दिए गए बयान पर सदन की चिंता का जबाव दिया। इस पर उनका कहना था कि एनएसजी के ४५ देशों ने यूरोनियम तकनीक भारत को पूरी तरह से देने पर पहले ही सहमति जताई है। इसके पहले भी जी आठ के देशों ने अडंगा लगाने की कोशिश की है लेकिन वो कामयाब नहीं हुए हैं जाहिर है इसमें कामयाबी के लिए एनएसजी के सभी ४५ देशों में आमसहमति बनानी होगी जो फिलहाल संभव नहीं दिखता । लिहाज़ा निकट भविष्य भारत के लिए इस पर चिंता की कोई बात नहीं है। साथ ही उन्होंने ये भी दोहराया कि जब तक दुनिया को परमाणु शक्ति संपन्न देश के रूप में मान्यता नहीं देता है तब तक एनपीटी पर हस्ताक्षर करने का कोई सवाल ही नहीं उठता है।

ज़ाहिर है विपक्ष संतुष्ट था। लेकिन अब भी ब्लुचिस्तान के ज़िक्र पर कोई ठोस जबाव दे पाने में सरकार नाकाम रही थी। लेकिन प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद भाजपा की सुषमा स्वराज द्वारा जो प्रश्न पूछे गए जलवायु परिवर्तन के बारे में वो विपक्ष की दिशाहीनता और प्रधानमंत्री के जबाव पर भाजपा की किसी रणनीति के अभाव को सामने रख गया। इससे ये भी स्पष्ट हो गया सरकार कठघरे में अगर खड़ी दिख भी रही थी तो अपनी मंत्रियों और अधिकारियों की नासमझी की वज़ह से न कि विपक्ष की किसी रणनीति और उसके द्वार किए गए किसी ठोस प्रयास का ये नतीजा था। बहरहाल अब सबकी नज़र विदेश मंत्री के जबाव पर टीकी थी जहां से उन्हें निराश करने वाला जबाव मिलने वाला था और सदन में एक बार फिर ये साबित होने वाले था कि एस एम कृष्णा शायद विदेश मंत्री के रूप में सही चयन नहीं हैं। (जारी)

रविवार, 2 अगस्त 2009

१५वीं लोकसभा -- पटकनी खाता सत्ता पक्ष - ४


शुरूआत से ही सबको उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री बहस में हस्तक्षेप करेंगे। हुआ भी कुछ ऐसा ही। पहले यशवंत सिन्हा के भाषण के दौरान ब्लुचिस्तान से मुत्तल्लिक डोजियर के सवाल पर प्रधानमंत्री ने एक पंक्ति का हस्तक्षेप करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि पाकिस्तान से इस मुद्दे पर भारत सरकार को शर्म अल शेख में कोई डोज़ियर नहीं मिला है। इसके बाद विपक्ष को ये लग रहा था कि प्रधानमंत्री अपने हस्तक्षेप के दौरान सभी मुद्दों पर सरकार की स्थिति साफ साफ शब्दों में स्पष्ट करेंगे। हालांकि पीएम न केवल जबाव के लिए तैयार थे बल्कि आशा के वीपरीत आक्रामक भी दिखाई दिए।

पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा पाकिस्तान हमारा पड़ोसी है और हम ये बात नहीं भुला सकते। इसलिए बेहतर होगा कि हम आपस में लड़ने से बेहतर अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल अपनी साझा समस्या से निपटने में करें । इसलिए दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध दोनों देशों के करोड़ों नागरिकों और पूरे दक्षिण एशिया के हित में होगा। इसके साथ ही ये उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि हमारे नेक इरादों के बावजुद , अगर पाकिस्तानी धरती से भारत पर होने वाले आतंकवादी हमले जिसमें हमारे निर्दोष नागरिक मारे जा रहे हैं, होते रहे तो हम इस पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। और मैं इस पर कायम हूं। ॥हालांकि उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि पाकिस्तान से संबंध सुधारने की दिशा में भारत की कोई सरकार तब तक एक भी कदम आगे नहीं बढ़ा पाएगी जब तक वो अपनी जमीन को भारत विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होने देगा। ज़ाहिर है ये विपक्ष के लगाए गए आरोप पर एक सफाई की तरह था। बाद में उन्होंने ये भी कहा कि मुंबई हमलों के दोषियों के खिलाफ पाकिस्तान की कार्रवायी के बगैर उससे किसी भी स्तर पर कोई बातचीत नहीं होगी। लेकिन इसके बाद भी ये स्पष्ट नहीं हुआ था कि आखिर अब बातचीत शुरू करने के पीछे क्या तर्क है।

इस पर आगे बढ़ते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि हमने वीपरीत परिस्थितियों में भी अपने संयम को बनाए रखते हुए ये साफ किया कि पाकिस्तान अपना वादा निभाए। पांच जनवरी को हमने पाकिस्तान को हमारी जांच एजेंसियों द्वारा उपलब्ध कराए गए डिटेल रिपोर्ट सौंप दिए जिसमें पाकिस्तान से जुड़ी तथ्यों की जानकारी थी। इसपर पाकिस्तान में कु्छ प्रगति जरूर हुई। उन्होंने सदन को बताया कि पाकिस्तान ने दो मौके पर अपने यहां हो रही जांच की औपचारिका जानकारी भारत सरकार को दी - फरवरी २००९ में और मेरी पेरिस और शर्म अल शेख की यात्रा के दो दिन पहले। सबसे ताजा दस्तावेज जो उन्होंने हमे सौंप वो चौंतीस पेज का था जिसमें घटना की योजना और घटना की क्रम से विवरणी है, पाकिस्तान की संघीय एजेंसी की टीम द्वारा की गई जांच का विस्तृत विवरण, एफ आई आर की एक काफी, हिरासत में लिए गए और भगोड़ो आरोपियों की तस्वीर और विस्तृत जानकारी है। हमले के दौरान उपयोग किए गए संचार साधनों की जानकारी , हमले की वित्तीय मदद की जानकारी और पाकिस्तान में जब्त किए समान मसलन मानचित्र, जीवनरक्षक नौका, नौवहनीय प्रशिक्षिण पर किताबें, इंटेलीजेंस मैनुअल आदि है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की तरफ से उन्हें बताया गया है कि जांच तकरीबन पूरी होने के कगार पर है और अब ट्रायल शुरू किया जाएगा। हमसे कुछ और जानकारियों उन्होंने मांगी है जो हम जल्द ही उपलब्ध करा देंगे। ये पहली बार है कि भारत में हुए किसी आतंकवादी हमले पर पाकिस्तान में हुई जांच पर उन्होंने हमें जानकारी दी है। पहली बार ही उन्होंने ये भी स्वीकार किया है कि भारत में हुए आतंकवादी हमलों में उनके नागरिक और उनके यहां का एक आतंकवादी संगठन संलिप्त है।

सदन को इतनी जानकारी देने के बाद वो भाजपा पर आक्रामक हुए, जो उनकी राजनीतिक छवि के बिल्कुल प्रतिकूल था। लेकिन इस मुद्दे पर हो रही तमाम राजनीति ने उन्हें आक्रामक बना दिया। उन्होंने विपक्ष को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि ये वास्तविकता है कि एनडीए सरकार ने पाकिस्तान से इतना कुछ कभी भी हासिल नहीं किया था अपने पूरे कार्यकाल और उनसे लंबी लंबी बातचीत के बावजूद। इसलिए यूपीए सरकार को विपक्ष से विदेशी नीति के संचालन और अपने देश को आतंकवादी हमलों से बचाने के लिए विपक्ष से कोई उपदेश लेने की कोई जरूरत नहीं है।

दुबारा बातचीत शुरू करने पर भी प्रधानमंत्री ने अपनी सफाई दी। उनका कहना था कि किसी देश से बातचीत करके हम अपने पुराने स्टैंड और आतंकवाद को परास्त करने की अपनी नीति को डायल्युट नहीं कर रहे। पाकिस्तानी आतंकवाद से ग्रस्त अन्य शक्तियां भी पाकिस्तान से बातचीत कर रही हैं। अगर हम पाकिस्तान से सीधे बात नहीं करते तो इसके लिए हमें किसी तीसरे देश पर निर्भर रहना होगा। इसका प्रभाव निश्चित तौर पर कम होगा। उन्होंने कहा कि वो पूरी ताकत और जिम्मेदारी से कहता हैं कि आगे बढ़ने के लिए बातचीत ही सबसे सही रास्ता है। पिछले एक दशक में यही पाकिस्तान के साथ संबंधों का हमारा इतिहास रहा है।

अपनी बात को वजनदार और सही साबित करने के लिए उन्होंने एनडीए सरकार के मुखिया वाजपेयी जी के पाकिस्तान कूटनीति की बात भी उदाहरण के तौर पर पेश किया। उनका कहना था कि वाजपेयी जी ने १९९९ में लाहौर जाने का साहस भरा कदम उठाया था और उसके बाद कारगिल हुआ और कांधार अपहरण कांड। इसके बावजूद उन्होंने शांति स्थापना के प्रयास में उन्होंने जनरल मुशर्रफ को आगरा आमंत्रित किया। देश ने संसद पर हमला का दारूण दृश्य देखा। ये दोनों देशों के बीच कठीन समय था। दोनों देश की सेनाएं सीमा पर आमने सामने खड़ीं थी। लेकिन मैं वाजपेयी जी को इसका स्रेय देना चाहुंगा , कि वो डिगे नहीं, और कि स्टेट्समैन को डिगना भी नहीं चाहिए। २००४ में वो इस्लामाबाद गए जहां संयुक्त वक्तव्य जारी किया गया। पाकिस्तान से निपटने में मैं वाजपेयी जी की दृष्टि और उनकी फ्रस्ट्रेशन दोनों महसूस कर सकता हूं।

इसके साथ ही पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों को उन्होंने रोनाल्ड रीगन के शब्दों में परिभाषित किया -- विश्वास करो लेकिन सतर्कता के साथ। जाहिर है पाकिस्तान के साथ उनकी बातचीत सतर्कता के साथ होने का उन्होंने दावा किया। लेकिन यहां ये नहीं साफ कर पाए कि इस सतर्कता में ब्लुचिस्तान जैसी चूक कैसे हो गई। बहरहाल उन्होंने ये जरूर कहा कि ब्लुचिस्तान पर पाकिस्तान की आशंकाओँ को निर्मूल करने के लिए ही संयुक्त वक्तव्य में उन्होंने इसका ज़िक्र किया है। यहां उनकी बात पर भरोसा करना विपक्ष के लिए थोड़ा मुश्किल ज़रूर था। अगर बात इतनी साधारण थी तो फिर सरकार की तरफ से इतनी बयानबाजी, इसको कानूनी दस्तावेज न मानने , बैड ड्राफ्टिंग जैसे बातें क्यों आई। ज़ाहिर है विपक्ष इतने पर संतुष्ट नहीं हो सकता था। और प्रधानमंत्री का बयान शायद इसी एक मुद्दे पर सदन को विश्वास में ले पाने में नाकाम रहा।

शनिवार, 1 अगस्त 2009

१५ वीं लोकसभा - प‍टकनी खाता सत्ता पक्ष - 3

इसको बाद कांग्रेस की तरफ से बोलने के लिए पी सी चाको उठे। पहले उन्होंने संयुक्त वक्तव्य में पाकिस्तान को इस्लामिक गणराज्य कहकर संबोधित करने पर यशवंत सिन्हा द्वारा की गई आलोचना पर हमला बोला। बाद में उनका जोर वर्तमान मुद्दों से ज़्यादा पूर्ववर्ती एनडीए सरकार की गलतियां गिनाने पर केंद्रित रहा। उन्होंने कारगिल युद्ध और संसद पर हमले के बाद भी वाजपेयी सरकार द्वारा पाकिस्तान से बातचीत जारी रखने को अपने तर्क का आधार बनाया। श्री चाको का कहना था कि अगर कारगिल और संसद पर हमले के बाद सरकार आगरा शिखर वार्ता और लाहौर यात्रा कर सकती है तो वर्तमान सरकार अगर मुंबई हमले के बाद शर्म अल शेख में बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की बात करती है तो इसमें क्या शर्मनाक है ? चाको अपनी जगह पर ठीक हैं। लेकिन ये ध्यान रखनी वाली बात थी कि वाजपेयी ने आर पार की लड़ाई की बात तो की थी लेकिन कभी ये नहीं कही था कि अब पाकिस्तान से बातचीत नहीं होगी। मुंबई हमले के बाद यूपीए सरकार ने साफ तौर पर ये कहा था कि मुंबई हमलों में शरीक लोगों के खिलाफ जब तक कार्रवायी नहीं होगी , भारत सरकार पाकिस्तान से किसी भी तरह की बातचीत नहीं करेगी। फिर जरदारी से मुलाकात के दौरान भी यही रूख दोहराया गया। फिर एक ही महीने में क्या बदल गया कि गिलानी से मुलाकात के बाद आतंकवाद पिछले दरवाजे से बैक फूट पर चला गया।

इसका जबाव दिया समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने उन्होंने अपने भाषण में यूपीए सरकार पर अमेरिका के दबाव में झुकने का आरोप लगाया। भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को अमेरिका के सामने घुटने टेकने की बात कहते हुए श्री यादव ने कहा कि ये पहली बार नहीं है कि ऐसा हुआ है। इराक और अफगानिस्तान पर हमलों के दौरान और ईरान के संदर्भ में हमारी विदेश नीति अमेरिका के सामने घुटने टेक चुकी है। मुलायम का आरोप था कि सरकार अपने पुराने बयान से पलटी है तो आखिर किस वजह से ? उनका कहना था कि सरकार को इन बातों पर साफ तौर पर सदन को विश्वास में लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि अजीब बात है जब युद्ध होता है तो भारत जीतता है लेकिन बातचीत के दौरान भारत की कूटनीति हमेशा हार क्यों जाती है ? इसके चलते ताशकंद में हम अपना प्रधानमंत्री खो चुके हैं। उनका कहना था कि भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का आधार गुटनिरपेक्षता रही है। सारी दुनिया में हमारी प्रतिष्ठा का यही आधार था। लेकिन अब हम गुटनिरपेक्षता से भटक रहे हैं। उन्होंने शर्म अल शेख में भारत की दो भूलों - ब्लुचिस्तान और आतंकवाद को डिलिंक करने का जिक्र करते हुए कहा कि जो सत्ता में बैठे हैं उनकी भूल भारी है। उन्होंने कहा कि इस संयुक्त वक्तव्य से भी पाकिस्तान को लाभ हुआ है भारत को नुकसान हुआ है। इसके साथ ही यूपीए की विदेश नीति का एक तरह से मजाक उड़ाते हुए उन्होंने कहा कि सरकार विदेशी मोर्चे पर हमेशा दोस्त बनाने को अपनी नीति का आधार बनाती रही है। उन्होंने प्रधानमंत्री से सीधे सवाल किया वो बताएं सदन को कि आज की तारीख में कौन सा देश भारत का दोस्त है ? उन्होंने पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने के भारत सरकार की नीति की आलोचना करते हुए कहा कि हमें इस बात की ध्यान रखना चाहिए कि पाकिस्तान के निर्माण की नींव ही शत्रुता पर टिकी है। साथ ही हमने उसके टुकड़े भी किये हैं। वो हमारा दोस्त कभी हो ही नहीं सकता। इसलिए पाकिस्तान के साथ हमारी नीति में विश्वास कम और सतर्कता का पुट ज्यादा होना चाहिए। अंत में उन्होंने प्रधानमंत्री को नसीहत दी कि जो गलती कर आए कोई बात नहीं .... अब उसे रद्दी की टोकरी में फेंक दीजिए।

अब बारी जनता दल युनाइटेड के शरद यादव की थी। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाए कि पहले तो मुंबई हमलों के बाद सरकार ने आम जनता में पाकिस्तान के खिलाफ उन्माद पैदा किया। बातचीत किसी कीमत पर नहीं का नारा बुलंद किया और अब चोर दरबाजे से बातचीत करने पर सहमति जता आए। उन्होंने कहा कि ब्लुचिस्तान के लोगों के साथ भारत के लोगों की मानवीय संवेदनाएं जुड़ी हुई हैं। शरद यादव ने कहा कि सरकार दुविधा की शिकार है। संयुक्त वक्तव्य के बाद सत्ताधारी दल के प्रवक्ता बगलें झांक रहे हैं और विदेश मंत्रालय के अधिकारी अलग बयान दे रहे हैं। यही दुविधा बताती है कि आप कुछ गलत कर आए। उनका कहना था कि इससे गजब बात क्या हो सकती है कि भारत सरकार से तनख्वाह पा रहा अधिकारी सरकार की गलती बता रहा है। उनका कहना था कि या तो आप सही हैं या आपका अधिकारी सही बोल रहा है। सरकार की दो ज़ुबान नहीं हो सकती है। आपकी पार्टी और सरकार अलग अलग भाषा बोल रही है। उन्होंने कहा कि जब तक देश दो ज़ुबान में बात कर रहा है तब तक आप किसी का भी सामना नहीं कर सकते। पाकिस्तान जीत गए जीत गए चिल्लाता रहा और यहां दो ज़ुबान में बातें हो रही हैं। शरद यादव ने कहा कि २६.११ के बाद आप रिवर्स गियर में चले गए ... देश आहत है। उन्होंने कांग्रेस को याद दिलाया कि इस देश की विदेश नीति बनाने में उनका ज्यादा योगदान रहा और बासठ सालों से देश की विदेश नीति आम सहमति से संचालित होती रही लेकिन आज आम सहमति की ये परंपरा खंडित हो गई है। उनका कहना था कि २६.११ के बाद जो दुनिया हमारी बात गौर से सुन रही, पाकिस्तान दबाव में आ गया था, इस वक्तव्य के बाद वो स्थिति खत्म हो गई है।

ज़ाहिर है विपक्ष इस मुद्दे पर पूरी तरह से आक्रामक था। सरकार को कटघरे में खड़ा करने का कोई मौका विपक्ष हाथ से नहीं जाने दे रहा था। कांग्रेस की तरफ से बोलने के लिए खड़े हुए चाको भी मामले को रफा दफा करने में कामयाब नहीं हो पाए। लिहाजा सत्ता पक्ष की तरफ से लोगों को ठोस जबाव का इंतजार था। ( जारी )

शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

१५ वीं लोकसभा - प‍टकनी खाता सत्ता पक्ष - २


दरअसल लोकसभा में प्रधानमंत्री के हाल के विदेश दौरे पर नियम १९३ के तहत चर्चा कराने का विपक्ष की तरफ से दिया गया नोटिस स्वीकार कर लिया गया था। लेकिन चर्चा कराने के कई दिन पूर्व ही लोकसभा में शून्य काल में भाजपा के हजारीबाग से सांसद और पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने इस मुद्दे को उठाकर सरकार को बैक फूट पर ला दिया था। शून्य काल में मामला उठाते हुए यशवंत सिन्हा ने भारत पाक साझा बयान में ब्लुचिस्तान के जिक्र का मुद्दा , आतंकवाद को डिलिंक कर पाकिस्तान से बातचीत करने पर सहमति, एंड यूजर एग्रीमेंट और संवर्द्धन और परिशोधन तकनीक पर जी आठ की भूमिका का जिक्र करते हुए भारत की संप्रभूता बेचने का आरोप लगाते हुए एक तरह से आने वाले चर्चा के दौरान विपक्ष का टोन सेट कर चुके थे। लिहाज़ा आने वाली चर्चा पर जबाव देने के लिए सरकार के पास बहुत वक्त था , इन सवालों पर पूरी तरह से तैयार होकर आने के लिए। लेकिन उसके बाद जितने दिन बीते सरकार के विभिन्न धड़ों की तरफ से आने वाले जबाव ने सरकार के लिए और मुश्किलें ही पैदा की। मसलन विदेश राज्य मंत्री शशी थरूर का सदन के बाहर दिया गया ये बयान कि साझा वक्तव्य की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। और उस पर विदेश सचिव मेनन का ड्राफ्टिंग में गलती की स्वीकारोक्ति वाले बयान ने सरकारी की पेशानी पर पसीने की बूंद और बढ़ाई ही , कम करने में कोई सहयोग नहीं दे पाई। रही सही कसर सत्ताधारी कांग्रेस से दबे स्वर से आने वाले विरोध ने कर दिखाया। कांग्रेसी प्रवक्ताओं की तरफ से प्रधानमंत्री के समर्थन में दो एक वाक्य क्या निकलते , अपनी पिंड छुड़ाने के लिए उन्होंने ये कह कर पल्ला झाड़ लिया कि प्रधानमंत्री आशंकाओं का जबाव देंगे। ज़ाहिर है टोन दोनों तरफ से सेट हो चुके थे। विपक्ष मजबूत दिखने लगा था। मैसेज जा चुका था ... कुछ न कुछ गलती हुई है जिसे सरकार छुपा रही है। ये मैसेज खतरनाक था। जिसे ख़ारिज करने में सत्ता पक्ष को अब तक सफलता नहीं मिल पाई।


बहरहाल लोकसभा में इस मुद्दे पर होने वाली चर्चा की शुरुआत सदन में भाजपा की उपनेता सुषमा स्वराज को करना था लेकिन ऐन मौके पर पार्टी ने इसके लिए यशवंत सिन्हा को चुन कर अपने आंतरिक अंतर्विरोध को कम करने में भी कुछ हद तक सफलता पाई। हालांकि इसके लिए यशवंत सिन्हा ने अपने भाषण की शुरूआत में ही पार्टी पर भी व्यंग्य वाण सनित चुटकी लेकर मजा ले लिया। ( इस पर चर्चा बाद में )। बहरहाल शुरआत से यशवंत सिन्हा आक्रामक नज़र आए। विदेश नीति की तुलना मेट्रो के खंभे से करते हुये उन्होंने सरकार पर आरोप लगाए कि शर्म अल शेख जो कुछ भी हुआ उससे विदेश नीति के खंभे भी मेट्रों की तरह क्रैक हो गए हैं। उन्होंने कहा कि मेट्रो के क्रैक तो फिर भी भर लिए जाएंगे लेकिन विदेश नीति में ये दरार शायद ही भरा जा सकेगा।


उनका कहना था कि तेरह जुलाई को पाकिस्तानी राष्ट्रपति ज़रदारी से मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री का बयान था कि जब तक पाकिस्तान २६ नवंवर के मुबंई हमलावरों पर ठोस कार्रवायी नहीं करता तब तक पाकिस्तान से सार्थक बातचीत संभव नहीं है । फिर शर्म अल शेख में गिलानी के साथ मुलाकात के बाद एक महीने के अंदर क्या बदल गया कि साझा बयान में भारत आतंकवाद को परे रखकर पाकिस्तान से बातचीत के लिए राजी हो गया। जाहिर है ये २६ नवंवर को मुबंई हमलों के बाद पाकिस्तान से किसी भी तरह की बातचीत नहीं करने की भारत सरकार के पोजिशन से डेविएशन है। सरकार को इस पर अपना रूख स्पष्ट करने की मांग उन्होंने की। इससे भी करारा वार उन्होंने साझा बयान में ब्लुचिस्तान के जिक्र पर किया। इस पर सरकारी प्रतिक्रिया कि ब्लुचिस्तान में भारत को छुपाने के लिए कुछ भी नहीं है, का उल्लेख करते हुए उन्होंने सरकार को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि कई मुद्दों और जगहों पर हमारे लिए छुपाने के लिए कुछ भी नहीं है तो फिर सरकार को उसका भी उल्लेख कर लेना चाहिए था। उनका साफ तौर पर कहना था कि शर्म अल शेख में ब्लुचिस्तान के जिक्र बाले साझा बयान की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि पाकिस्तान इसका अपने पक्ष में इस्तेमाल करने लगा। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि प्रधानमंत्री जो कर आए हैं उसको सातों समुद्र के पानी से भी नहीं धोया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि ब्लुचिस्तान का ये जिक्र आने वाले वक्त में भारत को बहुत तकलीफ देने वाला है।


विदेश सचिव के बैड ड्राफ्टिंग वाली बात भी उनके भाषण में प्रमुखता से छाया रहा। उन्होंने कहा कि साझा बयान की ड्राफ्टिंग बहुत सोच समझ और तैयारी के साथ होती है। एक एक शब्द पर घंटो खपाया जाता है। आगरा शिखर वार्ता इसी साझा बयान पर एकमत नहीं होने की वजह से टूट गई थी। फिर सरकार की क्या मजबूरी थी कि आखिर ब्लुचिस्तान का जिक्र करना पड़ा। और उस पर तुर्रा ये कि बैड ड्राफ्टिंग को स्वीकार करने वाला अधिकारी अब तक अपने पद पर बना हुआ है। या तो वो अधिकारी सही या सरकार सच बोल रही है। क्या ब्लुचिस्तान के संदर्भ में पाकिस्तान ने भारत को कोई दस्तावेज सौंपे हैं जिसके वजह से उसका जिक्र लाजिमी हो गया। अगर ऐसा है तो सरकार को बताना चाहिए। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन, संवर्द्धन और शोधन तकनीक, और अंतिम उपयोगकर्ता निगराणी समझौता ( एंड यूजर मानिटरिंग एग्रिमेंट ) का जिक्र करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री पर देश की संप्रभुता गिरवी रखने का आरोप लगाया। ज़ाहिर है सारा विपक्ष उनके इन आरोपों पर एक मत था। ( ज़ारी )

गुरुवार, 30 जुलाई 2009

१५ वीं लोकसभा - प‍टकनी खाता सत्ता पक्ष

पंद्रहवीं लोकसभा के पहले सत्र में तो विपक्ष बड़ा शांत नज़र आया और सत्ता पक्ष एतिहासिक जनादेश की खुशफहमी में डुबकी ही लगाता नज़र आया। लेकिन विपक्षी बेंच पर बै‌ठे दिग्गज़ों पर एक नज़र दौड़ाने के बाद से ही स्पष्ट हो गया था कि सत्ता पक्ष के लिए आगे की राह आसान नहीं होगी। और जैसे ही तकनीकि तौर पर दूसरा यानि कि बजट सत्र शुरू हुआ ये बात सदन की कार्यवाही के दौरान दिखने लगी। कई मौके ऐसे आए जब सत्ता पक्ष विपक्ष के तीखे सवालों पर सदन की हरी कालीन पर लोटता नज़र आया। ऐसा लगता रहा कि सत्ता पक्ष अब भी जीत की खुमारी से उबर नहीं पाया है। उधर सत्ता पक्ष को समर्थन दिए नेताओं मसलन लालु, मुलायम, बीजद और बसपा भी सरकार की खाल उतारती ही नजर आई। भाजपा में यशवंत सिन्हा, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज जैसे दिग्गजों ने अपनी मनमुटाव के बावजूद सरकार को विभिन्न मुद्दों पर आड़े हाथ लेने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

सत्ता पक्ष की हालत इस बात से समझी जा सकती है कि महत्वपूर्ण बहस को अगर छोड़ भी दें तो प्रश्न काल के दौरान विपक्ष के नीतिगत संबंधी साधारण प्रश्नों पर भी दिग्गज मंत्री बगले झांकते नजर आते हैं। सरकार की किरकिरी कराने में इनका बड़ा हाथ रहा है। इनमें एस एम कृष्णा ( विदेश मंत्री ) , बी के हांडिक ( खनन मंत्री ), कमलनाथ ( सड़क परिवहन ), डीएमके कोटे के मंत्री अझागिरी आदि के नाम प्रमुख हैं। अझागिरी ने तो कमाल ही कर दिया, उनके मंत्रालय से संबंधित सवाल पर तो वो उठ कर सदन से बाहर ही चले गए। बी के हांडिक इतने हड़बड़ाए कि सदन में मौजुद सोनिया गांधी तक के चेहरे पर झेंप साफ देखने को मिली। गृह मंत्री चिदंबरम तक उन्हें समझाते रहे तब उनकी नैय्या पार लगती दिखी। यहां तक की आसन की तरफ से भी कई बार मंत्रियों को मुश्किल परिस्थितियों से निकालने की कोशिश हुई। इन सबके बीच समुचा विपक्ष मजा लेता रहा।

यहां तक कि गृह मंत्रालय के अनुदान मांगों पर हुई चर्चा के जबाव में चिदंबरम जैसे दिग्गज भी असहज नज़र आए। शिवराज पाटिल के चले जाने के बाद चिदंबरम की छवि गृह मंत्रालय के ऐसे मंत्री के रूप में सामने आई थी जो ऐसा दिख रहा था कि अब घरेलु ( नक्सलवाद आदि ) और विदेशी मोर्चे पर आंतरिक सुरक्षा के मामले में बेहतर काम हो रहा है। लेकिन चर्चा के दौरान सुषमा स्वराज के आरोपों ने जहाँ उनकी इस बनी बनाई छवि को तोड़ने में कुछ हद तक सफलता पाई वहीं उनके हमलों का यथोचित उत्तर देने में चिदंबरम भी लड़खड़ाते नज़र आए।


बांकि रही सही कसर प्रधानमंत्री की हाल के विदेश दौरे ने पूरी कर दी। शर्म अल शेख में भारत पाकिस्तान संयुक्त वक्तव्य पर विपक्ष की घेरेबंदी ने पूरे सत्ता पक्ष को हिला कर रख दिया। विपक्ष ने संयुक्त वक्तव्य में आतंकवादी घटनाओं और बातचीत को साथ साथ रखने के अलावा ब्लुचिस्तान के जिक्र पर ऐसा बवाल काटा की सरकार को नानी याद आ गई। ऐसे समय में जब सरकार को सत्ताधारी पार्टी की सहायता की ज़रूरत थी, कांग्रेस के प्रवक्ता भी इस सवाल पर बचते नज़र आए। बाद में विदेश राज्यमंत्रियों की कानूनी बैधता की बयानबाजी और विदेश सचिव की ड्राफ्टिंग में गलती की स्वीकारोक्ति ने रही सही कसर भी निकाल दी। साफ लगा कि इस मुद्दे पर न तो सरकार के विभिन्न धड़े एकमत हैं बल्कि सरकार और पार्टी भी अपने किए का एकमत से बचाव नहीं कर पा रही है। उधर विपक्ष यशवंत सिन्हा, शरद यादव, मुलायम सिंह और सुषमा स्वराज जैसे दिग्गजों के रूप में सरकार पर लगातार कोड़े बरसाता नज़र आया। इस मुद्दे पर बुधवार को शुरू हुई चर्चा में हस्तक्षेप करने वाले प्रधानमंत्री के बयान देखकर भी ऐसा लगता है कि सरकार बहुत कुछ स्पष्ट नहीं कर पाई। खासतौर पर सरकार पर लगे आरोप अब भी बरकरार हैं।

मंगलवार, 12 मई 2009

चलो पीम बोएं उगाएं और काटे .... लोकतंत्र है भई

पंद्रहवीं लोकसभा के चुनावी महासमर के दौरान जिस पर सबसे ज़्यादा रार मची और ये कि जिसे आने वाले वक्त में शायद सबसे ज़्यादा याद किया जाएगा ... पहली बार चुनाव परिणाम आने से पहले देश ने प्रधानमंत्री पद के सबसे ज्यादा दावेदार देखे। राष्ट्रीय पार्टियों से लेकर इलाकाई क्षत्रपों तक ने देश के इस सर्वोच्च पद के लिए अपनी अपनी तालें ठोंकी। दिल्ली का तख्तो- ताज किस राजनैतिक दल को मिलेगा, ये सवाल अहम है बावजूद इसके एकबारगी ऐसा लगने लगा कि ये सवाल कहीं न कहीं पीछे चला गया और अहम ये हो गया कि आखिर इस सरकार का मुखिया कौन होगा।

इस सवाल के पीछे राजनीतिक दलों की भूमिका जितनी अहम थी राजनीतिक विश्लेषकों की भूमिका कहीं भी उससे कम नहीं थी। प्रेक्षक शुरूआत से ही मान कर चल रहे थे कि प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह केयरटेकर पीएम हैं जिन्हें सरकार के मुखिया के तौर पर भरत की भूमिका निभानी है। इसलिए बार बार ये सवाल उठता रहा कि पंद्रहवीं लोकसभा के दौरान कांग्रेस डा मनमोहन सिंह के नेतृत्व में चुनावी समर में जाएगी या कि धीरे धीरे दलीय प्रतिबद्धता को बखुबी निभा ( पार्टी प्रवक्ताओं के मुताबिक ) रहे राहुल गांधी सही वक्त पर समर का नेतृत्व अपने हाथ में लेंगे। बहरहाल कांग्रेस नेतृत्व ने कई मंचों पर अपना स्टैंड मजबूती से साफ करने का अभिनय किया।

यूपीए में प्रधानमंत्री पद का मुद्दा यहीं नहीं थमा। कभी लालू , पासवान और मुलायम की तिकड़ी इस कोशिश में रही कि एनसीपी के शरद पवार यूपीए के भीतर बने इस चौथे मोर्चे का नेतृत्व थाम लें। इसके पीछे ये धारणा थी कि चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस की सीटें कम होती हैं और ये क्षत्रप अपना गढ़ बचा पाने में सफल रहते हैं तो शरद पवार के पीछे गोलबंद हुआ जा सकता है। इसको लेकर एनसीपी में भी गुदगुदाहट होती रही, वो शरद पवार को पीएम मैटेरियल मानते रहे और इसको मूर्त रूप देने के लिए कभी कभी मराठा मुखिया की बात को भी हवा देते रहे। अंतत शरद पवार की इस स्वीकारोक्ति ने कि उनके पास पर्याप्त संख्या नहीं है , काफी हद तक यूपीए के भीतर प्रधानमंत्री पद को लेकर भ्रम साफ कर दिया। दरअसल ये साफगोई शरद पवार की शातिर अंदाज का एक नमूना है। ये शरद पवार भी जानते हैं कि प्रधानमंत्री बनने के लिए घोड़े नहीं चाहिए होते बल्कि घोड़े पर दांव लगाने वाले चाहिए होते हैं। अपनी पार्टी के इकलौते सांसद चंद्रशेखर अगर इस देश में प्रधानमंत्री हो सकते हैं तो शरद पवार क्यों नहीं , ये बात वो भी बखूबी समझते हैं और सही वक्त का इंतज़ार कर रहे हैं। दरअसल इसीलिए भी उन्होंने सन्यास के बाद भी पीच पर बैटिंग करने को उतरने मतलब चुनाव लड़े। इसके पीछे की महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है। लेकिन उनके इस मह्त्वाकांक्षा को अगर तीसरा मोर्चा चार चांद लगा सकता है तो कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी है जो हर कीमत पर इसे होने से रोकना चाहेगी।


बहरहाल एनडीए के अंदर लालकृष्ण आडवानी की ताज़पोशी भी कम उतार चढ़ाव से भरी नहीं रही। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सन्यास की घोषणा ने एनडीए के मुखिया के तौर पर कई नाम हवा में उछाले। आडवानी सबसे आगे ज़रूर थे लेकिन उनके राजनीतिक सफरनामे और भाजपा के भीतर ही चल रही खिंचतान को देखकर कई प्रेक्षकों को ऐसा लगता रहा कि शायद एनडीए में अपनी स्वीकार्यता को लेकर उन्हें लंबी लड़ाई लड़नी पड़े। बहरहाल जसवंत सिंह , शरद यादव, नीतिश कुमार आदि नामों की चर्चा के बीच अंतत आडवानी पीएम इन वेटिंग बनाए गए। लेकिन राजस्थान में पटकनी खाने के बाद भाजपा में भैरों सिंह शेखावत और वसुंधरा राजे के बीच टकराव ने पीएम इन वेटिंग आडवानी की सर्व स्वीकार्यता को भी अपने लपेटे में ले लिया। उप राष्ट्रपति पद से निवृत होकर पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की गंगा स्नान करने की सलाह के बीच भैरों सिंह शेखावत ने लोकसभा चुनाव लड़ने का एलान कर दिया। प्रेक्षकों ने इस हुंकार को आडवानी के खिलाफ उनके बगावत के रूप में देखा।

चुनावी महाभारत के दौरान अरूण शौरी के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री मैटेरियल बताने से रही सही कसर भी निकल गई। यूएनपीए से बदल कर लेफ्ट के आलंबन में तीसरे मोर्चे का स्वरूप अख्तियार करने वाली कथित विकल्प की राजनीतिक धारा में भी इस बात पर खुब हो हल्ला है। दरअसल यूएनपीए से तीसरे मोर्चे के रूप में चोला बदलने की नींव ही प्रधानमंत्री पद की दावेदारी की घोषणा के बीच हुई। जब कई पार्टियां राष्ट्रीय हित में स्थानांतरित हुईं ,उसी वक्त लेफ्ट ने यूएनपीए की कमान संभाली और बसपा के साथ तीसरे मोर्चे का गठन किया। पहली बैठक में ही उत्तर प्रदेश में अपनी सफलता की हाथी पर सवार मायावती ने साफ कर दिया वो पीएम बनने के लिए तीसरे मोर्चे की हम सफर हुई हैं। बाद में मोर्चे में इस पर हुए ना नुकूर पर नाराज हुई मायावती ने तुमकूर की रैली में ना जाकर अपनी नाराज़गी का भी इज़हार कर दिया। तीसरे मोर्चे में मायावती के समर्थन में बड़े नेता खुलकर नहीं आए, इसके पीछे शायद वामपंथियों के मन में अतीत में किए गए एतिहासिक भूल सुधारने के लिए अवसर बनाने की कवायद और जयललिता जैसी कुछ अन्य नेता भी हैं जो ये मानती हैं कि इस बार केंद्र की राजनीति तमिलनाडु तय करेगा।

ये तीसरा मोर्चा एतिहासिक रूप से कई बार गुजराल और देवेगौड़ा जैसे डार्क हार्स पैदा कर चुका है। क्या पता वक्त की मजबूत पतवार पकड़ कर शरद पवार, नीतिश कुमार, मुलायम सिंह, प्रकाश करात, नवीन पटनायक, चंद्रबाबू जैसे नेताओं में से ही कोई इस बार के डार्क हार्स बन जाएं। लेकिन इसके लिए ज़रूरी होगा कि क्षत्रप मजबूत बनकर उभरे साथ ही कि राष्ट्रीय दलों के कमज़ोर होने की उनकी प्रार्थना ईश्वर के दरबार में स्वीकार हो जाए। इंतज़ार कीजिए मतगणना का।

यूपीए एनडीए - बहुत कठिन है डगर पनघट की

देश में चुनावी हलचल अपने अंजाम के करीब पहुंचता जा रहा है। राजनीतिक दल अपने कमान से हर तरह के तरकश का इस्तेमाल कर रहे है जिससे वे अपने प्रत्याशियों और समर्थक उम्मीदवारों को चुनाव जीता सके। इस चुनाव में बहुत कुछ दांव पर है। पर सबसे ज्यादा दांव पर है राष्ट्रीय राजनीति के दो दिग्गज गठबंधनों यूपीए और एनडीए की प्रतिष्ठा। इन दोनों ही गठबंधनों के लिए तीसरा मोर्चा बहुत बड़ा सिर दर्द बन कर उभरा है। ज़ाहिर है इसलिए भी यूपीए और एनडीए की रणनीति का इम्तिहान इस बार कड़ा है।
दरअसल 2004 में चुनाव पूर्व बने यूपीए गठबंधन में बिहार से राष्ट्रीय जनता दल और लोकजनशक्ति पार्टी, महाराष्ट्र से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और आरपीआई, तमिलनाडु से पीएमके, डीएमके और एमडीएमके और आंध्र प्रदेश से टीआरएस सरकार बनाने में शामिल थे। इसके साथ ही वाम दलों ने यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दिया था।14वीं लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अकेले 145 सीट प्राप्त कर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई थी और उसके सहयोगी दलों को कुल मिलाकर 70 सीटें हासिल हुई थी। लेकिन बाहर से समर्थन देनेवाले दल में सीपीएम को 43, सीपीआई को 10, फारवार्ड ब्लाक को 3, आरएसपी 3, केईसी 1 और एक अन्य निर्दलीय सांसद का समर्थन प्राप्त था।

कांग्रेस को आंध्र प्रदेश , असम, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, तमिलनाडु , झारखंड और केंद्र शासित प्रदेशों अंडमान निकोबार, चंडीगढ़, दमन दीव और दिल्ली के 203 सीटों में से 97 सीटें हासिल हुई थी यानि इन राज्यों की कुल सीटों की तकरीबन पचास फ़ीसदी के करीब सीटें कांग्रेस के खाते में गई थी जबकि इन्हीं राज्यों में भाजपा को महज़ 31 सीटें हासिल हुई थी। ज़ाहिर है पिछली बार कांग्रेस के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने में इन राज्यों की भूमिका बहुत बड़ी थी, लिहाज़ा इस बार वापसी के लिए कांग्रेस का यहां बहुत कुछ दांव पर है। अब भाजपा के बेहतर प्रदर्शन वाले राज्यों पर नज़र डालें तो मध्य प्रदेश , राजस्थान , छत्तीसगढ़ , गुजरात, महाराष्ट्र और उड़ीसा जैसे राज्यों की कुल 160 सीटों में से 90 सीटों पर कब्ज़ा जमाने में सफल रही थी यानि कुल सीटों की पचास फ़ीसदी से भी अधिक। ज़ाहिर है भाजपा के समक्ष इन राज्यों में अपनी इन सफलता को दोहराने के साथ साथ कांग्रेस के उन राज्यों में भी अपनी स्थिति मजबूत करने की दोहरी चुनौती है। ज़ाहिर है कांग्रेस और भाजपा के बीच असली मुकाबला इन्हीं राज्यों में देखने को मिलेगा।
अब चौदहवीं लोकसभा में कांग्रेस की सहयोगी दलों के प्रदर्शन पर नज़र डालें तो बिहार और झारखंड में राष्ट्रीय जनता दल, लोकजनशक्ति पार्टी और झारखंड मुक्ति मोर्चा, महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और आरपीआई, तमिलनाडु पांडिचेरी में डीएमके, पीएमके और एमडीएमके जैसी पार्टियों ने कुल 142 सीटों में से 68 सीटों पर कब्ज़ा जमा कर कांग्रेस के लिए केंद्र में सरकार बनाने की राहें आसान कर दी थी। लेकिन इसके विपरीत भाजपा के सहयोगी दलों पंजाब में अकाली दल, महाराष्ट्र में शिवसेना, तमिलनाडु में जयललिता, उड़िसा में बीजु जनता दल और बिहार में जनता दल युनाइटेड जैसी सहयोगी दलों ने 161 सीटों में महज़ सैंतीस सीटें हासिल कर केंद्र में सरकार बनाने की कवायद में एनडीए की असफलता की पटकथा लिख दी थी। ज़ाहिर है इस बार भाजपा और कांग्रेस की केंद्र में सरकार बनाने का दारमोदार बहुत हद तक पुराने सहयोगियों के प्रदर्शन और नए सहयोगी बना पाने में उनकी सफलता पर निर्भर करेगा। इसके अलावा देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सिर्फ अहसास तक सीमट कर रह गई राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के प्रदर्शन पर भी प्रेक्षकों की निगाहें होंगी।

इन सबके बीच पंद्रहवी लोकसभा चुनाव के पूर्व एनडीए ने हरियाणा में चौटाला , असम में असम गण परिषद और उत्तर प्रदेश में चौधरी अजीत सिंह को अपने पाले में लाने में कामयाबी हासिल की । इसके साथ ही लुधियाना की रैली में टीआरएस को अपने खेमे में खड़ा कर पटनायक को अपने खेमे में लेकर खुशी मना रहे तीसरे मोर्चे को भी करारा ज़बाव दे दिया है। दूसरी तरफ कांग्रेस अब तक ऐसी कोई भी कदम बढ़ा पाने में नाकाम रही है। इसके वीपरीत उसे बिहार और उत्तर प्रदेश में राजद, लोजपा और सपा जैसी अपनी सहयोगी पार्टियों का ही सामना करना पड़ा रहा है। साथ ही समय प्रेक्षकों के मुताबिक वक्त से पहले किए गए कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेस ने द्रमुक और राजद जैसी पार्टियों को उल्टे नाराज़ कर दिया है। हालांकि चुनाव बाद की रणनीति पर कांग्रेस एक साथ कई संकेत देती है जिसमें नीतिश के साथ साथ तीसरे मोर्चे के नायडु पर भी डोरे डालने की रणनीति का खुल कर इज़हार है। लेकिन लुधियाना की रैली में नीतिश और नरेंद्र मोदी की गलबहियां ने शायद राहुल के बचपने का जबाव अपने अंदाज में दे दिया। ज़ाहिर बिना किसी तैयारी के हवा में बात करने के लिए प्रेस कांफ्रेस बुलाने का जो नतीज़ा कांग्रेस को भुगतना था तो वो भुगत रही है। नाराज़ द्रमुक को मनाने के लिए तमिलनाडु में सोनिया गांधी को एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा गया। ज़ाहिर है चुनाव बाद के हालात बहुत हद तक आने वाले चुनाव परिणामों पर निर्भर होंगे लेकिन फिलहाल भाजपा राहुल के ऐसे विचारों को कांग्रेस की कपोल कल्पना कह कर अगर ख़ारिज कर रही तो कुछ भी गलत नहीं है उसमें। कांग्रेस को अब भी बहुत होमवर्क करना होगा।

हालांकि इस बीच एनडीए को तीसरे मोर्चे से झटका भी लगा जब ग्यारह साल पुराने सहयोगी बीजू जनता दल ने उड़िसा और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी राह बदल ली। हालांकि इसका विकल्प जैसा कि लुधियाना में टीआरएस को अपने खेमे में लाकर भाजपा ने तीसरे मोर्चे को करारा जबाव दे तो दिया है लेकिन उन्हें भी पता है वो नवीन पटनायक का स्थायी स्थानपन्न नहीं हो सकता। हाँ इतना जरूर है कि इसके बांकि दलों को अपने ओर खिंचने के लिए टर्निंग प्वांइट के रूप में भाजपा इस्तेमाल कर सकती है। दरअसल केंद्रीय राजनीति की शतरंज पर भाजपा और कांग्रेस दो बड़े मोहरे ज़रूर है लेकिन दिल्ली की तख्त पर सत्तानशीं के लिए राज्यों के इन मोहरे के प्रदर्शन पर न केवल प्रेक्षकों की निगाहें होंगी बल्कि इन राष्ट्रीय दलों की भविष्य भी बहुत हद तक इन्हीं से तय होगा। ज़ाहिर है यूपीए एनडीए के लिए बहुत कठिन है डगर पनघट की।

सोमवार, 11 मई 2009

X - फैक्टर क्षेत्रीय दल

गठबंधन राजनीति के इन दिनों में केंद्र में सरकार के गठन की जिम्मेदारी बहुत हद तक क्षेत्रीय दलों के हाथों में है। यही वजह रही कि पंद्रहवीं लोकसभा के गठन की प्रक्रिया के घोषणा के साथ ही राष्ट्रीय दलों में क्षत्रपों को एक दूसरे के पाले में लाने की होड़ मच गई। दरअसल राजनीति की ये पटकथा नब्बे के दशक में ही लिख दी गई जिसका उत्कर्ष 13वीं लोकसभा में एनडीए सरकार और उसके बाद यूपीए के सरकारों के रूप में सामने आया। पंद्रहवीं लोकसभा के दौरान भी हालात बहुत बदलेगा , इसकी संभावना कम है। आने वाले समय में क्षत्रप ही अगली लोकसभा की रूपरेखा तय करने जा रहे हैं। या फिर कहें कि इनमें से ही कोई डार्क होर्स भी हो सकता है। यही वो तथ्य है जिस पर राष्ट्रीय दलों के साथ साथ क्षेत्रीय दलों के लिए भी रणनीति का निर्धारण होना है।

दरअसल 14वीं लोकसभा में भविष्य की राजनीति को ध्यान में रख कर इसकी शुरूआत तब हुई जब वामपंथी दलों ने परमाणु करार के मुद्दे पर यूपीए सरकार से अपना समर्थन वापस लिया। तभी से क्षत्रपों को अपने पाले में करने और पहले से ही अपने कुनबे में मौजूद क्षत्रपों को जोड़े रखने की कवायद शुरू हुई। इस दौरान मायावती, जयललिता, चंद्रबाबू नायडु , चौटाला, वृंदावन गोस्वामी, देवेगौड़ा और बाबू लाल मरांडी जैसे क्षत्रपों ने जहां तीसरे मोर्चे के ठोस स्वरूप को सामने रखा वहीं पहले से तीसरे मोर्चे के साथ रही सपा कांग्रेस के साथ आ गई जबकि एनडीए को अपने गठबंधन को बनाए रखने के लिए काफी पसीना बहाना पड़ा। और ये कि पहले से ही यूपीए में मौजूद शिबू सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चे ने अंतिम समय तक कांग्रेस को अपनी ओर ताकने को मजबूर किया।

दरअसल ये शुरूआत थी , उसके बाद भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए कई क्षत्रप अपना पाला बदल चुके हैं। ये साफ तौर पर तमिलनाडु में देखने को मिला जहां पहले डीएमके और यूपीए के साथ रहे रामदौस और वाइको अब जयललिता के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं। चुनाव के ठीक पहले बिहार में लालू और पासवान का दबे स्वर में ही सही कांग्रेस से किनारा करना और असम गण परिषद और हरियाणा में चौटाला का का एनडीए के पाले में चले जाना। साथ ही एनडीए के पाले से खिसक कर बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस के साथ महाजोट की रणनीति और उडिसा में बीजू जनता दल का एनडीए से खिसक कर तीसरे मोर्चे में शामिल होना सब इसी का हिस्सा है।

दरअसल ये सारे गठबंधन अपने अपने इलाकों में अपनी लाभप्रद राजनीतिक जरूरत के मुताबिक किया गया। गठबंधन की राजनीति में स्थायी कुछ भी नहीं होता। ये बहुत कुछ चुनाव परिणामों पर निर्भर करता है। अगर पंद्रहवी लोकसभा के चुनाव परिणाम यूपीए या एनडीए के अनुकूल नहीं रहा तो अब तक यूपीए या एनडीए के पाले में नज़र आ रहे क्षेत्रीय दल तीसरे मोर्चे का रूख कर सकते हैं। यही वजह है कि एनडीए में रहते हुए भी शरद यादव घर पर सीताराम येचुरी से मुलाकात करते हैं और लालू और पासवान यूपीए में रह कर भी कांग्रेस से दूरी बढ़ा लेते हैं या कि शिवसेना एनडीए में होते हुए भी मराठा प्रधानमंत्री के नाम पर कभी कभी एनडीए की राजनीतिक जरूरत के विपरीत संकेत देती है। यहां ये बताता चलुं कि अगर सबसे बड़ी पा‍र्टी के रूप में उभर भी जाती है जैसा कि लग रहा तो भी अगर उसके पास खुद के १७० से ज़्यादा सांसद नहीं हुए तो कांग्रेस तीसरे मोर्चे के किसी डार्क हार्स को समर्थन दे कर सरकार बनवा सकती है। इस संभावना की बड़ी वज़ह इसलिए भी है कि सेकुलर सेकुलर चिल्लाते हुए ये सभी सिद्धांत बघारने वाली पार्टियां एक हो सकती हैं। लेकिन इन सब संभावनाओं के लिए जरूरी है कि अपने अपने इलाके के ये क्षत्रप अपने अपने किले को बचा पाने में सफल हों।


ज़ाहिर है इन क्षत्रपों के लिए अपने अपने इलाके में बेहतर प्रदर्शन करना सिर्फ अपनी ताकत बढ़ाने के लिए ज़रूरी नहीं है बल्कि दिल्ली में राष्ट्रीय दलों को अपने मुताबिक साधने के लिए भी जरूरी है। लेकिन अगर ये कमज़ोर पड़ते हैं फिर ऐसे हालात में इनके लिए केंद्रीय राजनीति में अस्तित्व का संकट भी आ सकता है। इसलिए हर हाल में इनकी कोशिश ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल कर केंद्रीय राजनीति को अपने मुताबिक मोड़ने की होगी। आप यों कह सकते हैं कि पंद्रहवी लोकसभा का स्वरूप बहुत कुछ राज्यों के इन धुरंधरों के मुताबिक तय होगा।