बीजिंग : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के फैसले को बहुत साहसिक कदम बताते हुए चीन की सरकारी मीडिया ने लिखा है कि भले ही ये कदम सफल हो या असफल पर भ्रष्टाचार पर इसके असर से चीन सबक लेगा। चीन की सरकारी मीडिया के मुताबिक पीएम मोदी के नोटबंदी का ये पहल चाहे सफल हो या असफल लेकिन इससे एक उदाहरण पेश किया गया है और चीन भ्रष्टाचार पर इसके प्रभावों से जरूर सबक लेगा।
सरकारी समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स में ‘मोदी टेक्स ए गैम्बल विथ मनी रिफॉर्म’ शीर्षक से छपे संपादकीय में लिखा गया है, ‘नोटबंदी का मोदी का कदम बहुत ही साहसिक है। अगर चीन में 50 या 100 युआन के नोट बंद कर दिए जाएं तो, चीन में क्या होगा हम इसके बारे में अभी कल्पना नहीं कर सकते हैं। मोदी ने करंसी रिफार्म पर फैसला लेकर एक जुआ खेला है’। ज्ञात हो कि 100 युआन चीन की सबसे बड़ी मुद्रा है।
पत्र आगे लिखता है, ‘नोटबंदी की खबर को इसके क्रियान्वयन में आनी वाली चुनौतियों के बावजुद पुरी तरह गुप्त रखा गया था ताकि इस फैसले के इसके मकसद को पूरी तरह से हासिल किया जा सके। नोटबंदी का यह फैसला ब्लैकमनी के खिलाफ है। हालांकि मोदी इसे लागू करने से पहले दुविधा में थे’। अखबार फैसले को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के मन में दुविधा की स्थिति का भी जिक्र करता है। अखबार लिखता है कि मोदी इस समय दुविधा की स्थिति में हैं क्योंकि इस सुधार का मकसद कालेधन को बेकार करना है लेकिन यह प्रक्रिया कोई नई नीति की शुरूआत से पहले जन समर्थन हासिल करने के प्रशासन के सिद्धांत के विपरीत है।
संपादकीय में लिखा गया है, ‘भारत में लगभग नब्बे फीसदी लेन-देन कैश में होता है। देश में कुल कैश का 85 प्रतिशत नोट पांच सौ और हजार रुपये के रुप में थे। सरकार के इस फैसले से आम जनता को रोजाना जिंदगी में काफी दिक्कतें भी हुई हैं। यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे संगठित लूट तक करार दे दिया’। अखबर लिखता है, ‘नोटबंदी से भ्रष्टाचार पर रोक लग सकती है। लेकिन इसको बढावा देने वाले सामाजिक और राजनीतिक मसले का समाधान मुश्किल है जो इसको बढ़ावा देने में मददगार रहे हैं’।
संपादकीय के अनुसार, ‘मोदी का नोटबंदी का फैसला एक जुआ है। इसे लागू करने से लेकर आम जनता की बर्दाश्त करने की क्षमता की परख होनी है। उम्मीद है कि इसके फायदे अन्य दूसरी चीजों के असर को कम करने में सफल होगी’। इसमें कहा गया है कि भारत की ‘पश्चिमी शैली’ की लोकतांत्रिक प्रणाली में इस प्रकार के साहसिक कदमों के लिए कम ही स्थान है। संपादकीय में कहा गया है कि वह इसे अंजाम दे रहे हैं और यह कदम भले ही सफल रहे या असफल हो, यह एक मिसाल पेश करेगा। इसमें कहा गया है कि सुधार करना हमेशा मुश्किल होता है और इसके लिए साहस के अलावा भी कई चीजों की आवश्यकता होती है। मोदी ने नेक इरादे से नोटबंदी की है, लेकिन यह सफल होगा या नहीं, यह बात प्रणाली की दक्षता और पूरे समाज के सहयोग पर निर्भर करती है। अखबार के मुताबिक लोकतंत्र में इस तरह के साहसिक कदम की जगह बहुत कम होती है। नोटबंदी चाहे सफल हो या असफल लेकिन यह एक उदाहरण जरूर पेश करेगा।
अखबार लिखता है, ‘सुधार हमेशा से मुश्किल रहा है। मोदी का नोटबंदी का फैसला सही सोच के साथ आया है। लेकिन, इसकी सफलता व्यवस्था और समाज के सहयोग पर निर्भर करती है’। अखबार लिखता है कि चीन में भी पिछले चालीस सालों से सुधार का क्रम जारी है। इसमें कई उतार चढ़ाव देखने को मिले हैं। अखबार के मुताबिक इसकी सफलता आम जनता के व्यापक समर्थन से ही संभव होती है। इसमें कहा गया है कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना की मजबूत क्रियान्वयन क्षमताएं पूरे देश की आम सहमति पर आधारित हैं। भारत के सुधारों से सीख मिलेगी जो हमें हमारे सुधार को समझने में मदद करेगी।
सरकारी समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स में ‘मोदी टेक्स ए गैम्बल विथ मनी रिफॉर्म’ शीर्षक से छपे संपादकीय में लिखा गया है, ‘नोटबंदी का मोदी का कदम बहुत ही साहसिक है। अगर चीन में 50 या 100 युआन के नोट बंद कर दिए जाएं तो, चीन में क्या होगा हम इसके बारे में अभी कल्पना नहीं कर सकते हैं। मोदी ने करंसी रिफार्म पर फैसला लेकर एक जुआ खेला है’। ज्ञात हो कि 100 युआन चीन की सबसे बड़ी मुद्रा है।
पत्र आगे लिखता है, ‘नोटबंदी की खबर को इसके क्रियान्वयन में आनी वाली चुनौतियों के बावजुद पुरी तरह गुप्त रखा गया था ताकि इस फैसले के इसके मकसद को पूरी तरह से हासिल किया जा सके। नोटबंदी का यह फैसला ब्लैकमनी के खिलाफ है। हालांकि मोदी इसे लागू करने से पहले दुविधा में थे’। अखबार फैसले को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के मन में दुविधा की स्थिति का भी जिक्र करता है। अखबार लिखता है कि मोदी इस समय दुविधा की स्थिति में हैं क्योंकि इस सुधार का मकसद कालेधन को बेकार करना है लेकिन यह प्रक्रिया कोई नई नीति की शुरूआत से पहले जन समर्थन हासिल करने के प्रशासन के सिद्धांत के विपरीत है।
संपादकीय में लिखा गया है, ‘भारत में लगभग नब्बे फीसदी लेन-देन कैश में होता है। देश में कुल कैश का 85 प्रतिशत नोट पांच सौ और हजार रुपये के रुप में थे। सरकार के इस फैसले से आम जनता को रोजाना जिंदगी में काफी दिक्कतें भी हुई हैं। यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे संगठित लूट तक करार दे दिया’। अखबर लिखता है, ‘नोटबंदी से भ्रष्टाचार पर रोक लग सकती है। लेकिन इसको बढावा देने वाले सामाजिक और राजनीतिक मसले का समाधान मुश्किल है जो इसको बढ़ावा देने में मददगार रहे हैं’।
संपादकीय के अनुसार, ‘मोदी का नोटबंदी का फैसला एक जुआ है। इसे लागू करने से लेकर आम जनता की बर्दाश्त करने की क्षमता की परख होनी है। उम्मीद है कि इसके फायदे अन्य दूसरी चीजों के असर को कम करने में सफल होगी’। इसमें कहा गया है कि भारत की ‘पश्चिमी शैली’ की लोकतांत्रिक प्रणाली में इस प्रकार के साहसिक कदमों के लिए कम ही स्थान है। संपादकीय में कहा गया है कि वह इसे अंजाम दे रहे हैं और यह कदम भले ही सफल रहे या असफल हो, यह एक मिसाल पेश करेगा। इसमें कहा गया है कि सुधार करना हमेशा मुश्किल होता है और इसके लिए साहस के अलावा भी कई चीजों की आवश्यकता होती है। मोदी ने नेक इरादे से नोटबंदी की है, लेकिन यह सफल होगा या नहीं, यह बात प्रणाली की दक्षता और पूरे समाज के सहयोग पर निर्भर करती है। अखबार के मुताबिक लोकतंत्र में इस तरह के साहसिक कदम की जगह बहुत कम होती है। नोटबंदी चाहे सफल हो या असफल लेकिन यह एक उदाहरण जरूर पेश करेगा।
अखबार लिखता है, ‘सुधार हमेशा से मुश्किल रहा है। मोदी का नोटबंदी का फैसला सही सोच के साथ आया है। लेकिन, इसकी सफलता व्यवस्था और समाज के सहयोग पर निर्भर करती है’। अखबार लिखता है कि चीन में भी पिछले चालीस सालों से सुधार का क्रम जारी है। इसमें कई उतार चढ़ाव देखने को मिले हैं। अखबार के मुताबिक इसकी सफलता आम जनता के व्यापक समर्थन से ही संभव होती है। इसमें कहा गया है कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना की मजबूत क्रियान्वयन क्षमताएं पूरे देश की आम सहमति पर आधारित हैं। भारत के सुधारों से सीख मिलेगी जो हमें हमारे सुधार को समझने में मदद करेगी।











