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| Photo Courtesy : Indian Express |
भोपाल: भोपाल सेंट्रल जेल से तड़के भागे आठे कैदी दोपहर तक मुठभेढ़ में मार गिराए
जाते हैं। कायदे से इस तत्परता पर मध्यप्रदेश एटीस की पीठ थपथपाई जानी थी लेकिन
ऐसा होने की बजाए मध्य प्रदेश सरकार पर चौतरफा सवालों की बौछार आ गई। वरिष्ठ
पत्रकार शेखर गुप्ता ने ट्वीट में लिखा, “भगवान जानता है कि मैं फर्ज़ी मुठभेड़ और परदे के पीछे के अभियानों
के बारे में काफी कुछ जानता हूं। लेकिन अपने अनुभव से भी मुझे लगता है कि ये
मुठभेड़ पुलिस के अनाड़ीपने से भरपूर है। इशरत मुठभेड़ से तुलना करें तो भी।''
कांग्रेस नेता दिग्विजय
सिंह ने ट्वीट किया कि इस बात की जांच होनी चाहिए कि क्या ये लोग "सरकारी जेल
से भागे या फिर किसी योजना के तहत भगाए गए।" ज़ाहिर है ये सवाल तो उठेंगे ही
क्योंकि सिर्फ ये कह देने भर से कि ये सवाल पूछने वाले देशद्रोही हैं, काम चलेगा
नहीं। पुरे घटनाक्रम पर ही सरसरी निगाह डालने भर से एक आदमी के मन में भी पुरी
कहानी की टूटी कड़ियां दिख जाती हैं।
भोपाल सेंट्रल जेल से भाग सिमी के आठ
विचाराधीन आतंकवादियों ने जेल तोड़ने के बाद कुल आठ घंटे में सिर्फ दस किलोमीटर की
दूरी तय की थी। यानी जेल से निकलने के बाद उन्हें भागने की कोई जल्दी नहीं थी।
सबसे अहम बात ये कि दस किलोमीटर की दूरी भी उन्होंने पैदल चलते हुए दो से तीन घंटे
में ही पूरी कर ली थी। इसके बाद अगले पांच घंटे तक वो पहाड़ी पर बैठे पुलिस का
इंतजार करते रहे। वारदात की टीम ने जेल से लेकर उस पहाड़ी तक की दूरी और रास्ता
दोनों नापा। साथ ही ये भी जानने की कोशिश की कि आठों उस पहाडी की तरफ ही क्यों गए
थे ?
जेल के अंदर की कहानी ये बताती है कि
आठों विचाराधीन कैदी रात करीब दो से तीन बजे के दरम्यान जेल से बाहर निकल चुके थे।
ये जेल आबादी से थोड़ी दूर है और जेल के बाहर जाने के सिर्फ दो रास्ते हैं। एक
रास्ता एयरपोर्ट की तरफ जाता है और दूसरा उस तरफ जहां आठों विचाराधीन कैदियों का
एनकाउंटर हुआ। जेल के बाहर आने के बाद आठों इसी रास्ते पर आगे बढ़े। इस रास्ते पर
चलते हुए करीब पांच किलोमीटर दूर एक चौराहा पड़ता है जहां से आठों कैदी बायें मुढ़
जाते हैं। अब जो रास्ता जा रहा है वो ईंटखेड़ी की तरफ जा रहा है। ईंटखेड़ी का
इलाका पहाड़ और नदियों का इलाका है , आसपास कुछ गांव भी हैं।
जेल से ईंटखेड़ी की दूरी करीब 10
किलोमीटर है। ईंटखेड़ी में जहां तक गाड़ी जा सकती है उस जगह तक जेल से पहुंचने में
बीस पचीस मिनट लगता है और अगर जेल से पैदल आया जाए तो दो से तीन घंटे। अगर मान लिया
जाए कि जेल से भागे कैदी सुबह तीन बजे इसी इलाके की तरफ आए और वो पैदल थे तो इस
हिसाब से सुबह छह बजे तक वो यहां पहुंच गए होंगे जबकि गांव वालों ने उन्हें पहली
बार सुबह नौ बजे के बाद देखा।
सवाल यहीं खडा होता है कि जेल से
भागने के बाद आठों अलग अलग टोलियों में फरार होने की बजाए एक साथ आठ नौ घंटे में
सिर्फ दस किलोमीटर दूर ही भागकर क्यों रूक गए थे? गांव वालों के देख लेने के बाद ही वो इसी पहाड़ी पर क्यों
डटे रहे? क्यों उन्होंने वहां से भागने की कोशिश नहीं की? क्यों वो पुलिस के यहां आने का
इंतजार करते रहे? क्यों पुलिस की बंदूक अपने उपर तनी देखकर भी उपर से पत्थर बरसाते रहे?
पुलिस का कहना है कि आठों विचाराधीन
कैदियों के पास चार कट्टे भी थे। जाहिर है अगर ऐसा था तो ये कट्टे उन्हें जेल से
बाहर किसी ने दिए होंगे। अब सवाल ये कि अगर उनका कोई साथी उन्हें कट्टा देने आ
सकता है तो उन्हें भगाने के लिए गाड़ी भी लेकर आ सकता है।
इसके अलावा मुठभेड़ में मारे गए सभी
आठों के सिर्फ सीने और सिर पर ही गोलियां लगी हैं। शरीर के बांकि हिस्सों में नहीं। एनकाउंटर दूर से हो रहा था फिर ऐसा कैसे मुमकीन है? मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने तो एनकाउंटर पर
सवाल उठाने वाले नेताओं पर तमाम लानत-मलामत भेज दी। मगर क्या इससे सवाल सर उठाना
बंद कर देंगे। लेकिन जब तक इन सवालों के जवाब मिल नहीं जाते तब तक एनकाउंटर पर
सवाल उठने बंद नहीं होंगे।
जेल के सिर्फ वही चार सीसीटीवी कैमरे
क्यों खराब थे जो आठों विचाराधीन कैदियों के सेल के बाहर लगे थे?
हेड कांस्टेबल की हत्या की खबर मिलने
के बाद बांकि सुरक्षा गार्ड ने अलार्म या सीटी बजा कर बांकि को अलर्ट क्यों नहीं
किया?
जेले की 28 फीट उंची दीवार बिना रस्सी
लटकाए कैसे पार की गई?
जेल तोडने के बाद आठों एक साथ एक ही
रास्ते पर क्यों भागे जबकि ऐसा करने पर पकड़े जाने का खतरा सबसे ज्यादा होता है?
जेल से निकल भागने के बाद आठों को जेल
से दूर भागने की जल्दी क्यों नहीं थी? वो आठ दस घंटे में सिर्फ दस किलोमीटर भाग कर क्यों रूक गए?
तस्वीरों में साफ है कि पहाड़ी पर आठो
निहत्थे खड़े थे फिर उन्हें जिंदा पकड़ने की कोशिश क्यों नहीं की गई?
पुलिस का दावा है कि आठों विचाराधीन
आतंकी भी गोली चला रहे थे तो ऐसी सूरत में गोलियों से बचने की बजाए पुलिस वाले फोन
पर वीडियो कैसे शूट कर रहे थे?
जेल से भागने के बाद उनके पास चार
कट्टे कैसे आए? किसने उन्हें ये मुहैया कराया?
अगर उन्हें हथियार दिए जा सकते थे तो
देने वाले ऩे उनके भागने के लिए गाड़ी का इंतजाम क्यों नहीं किया?
इस एनकाउंटर के कई वीडियो
सामने आए हैं। एक वीडियो में दिख रहा है कि चारों ओर से पुलिस से घिरे पांच क़ैदी हाथ
हिलाकर सरेंडर करना चाहते थे। सवाल यह उठता है कि पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार करने
की बजाय गोली क्यों मारी?
वीडियो में दिखायी देता
है कि कुछ ही दूरी पर संदिग्ध दिखाई देते हैं। एक आवाज आती है : 'कंट्रोल! ये पांचों लोग हमसे बात करना चाहते हैं। तीन भागने
की कोशिश कर रहे हैं। चलो उन्हें घेर लो!' इसके बाद गोलियों की आवाज आती है।
एक और दूसरा वीडियो भी
सामने आया है, जिसमें
एनकाउंटर में जख़्मी एक कैदी को एक पुलिसवाला निशाना बनाकर फायरिंग कर रहा है। क्या
उसे जिंदा नहीं पकड़ा जा सकता था? फ़िलहाल इन वीडियो की सत्यता की जांच बाक़ी है। मारे गए क़ैदियों के पहनावे, उनके जेल से भागने के तरीक़ों पर भी सवाल उठ रहे हैं।
गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह
ने विरोधाभासी बयान देते हुए कहा कि संदिग्धों के पास कोई हथियार नहीं थे, उनके पास
केवल जेल की वो प्लेटें थीं, जिससे उन्होंने गार्ड का गला रेत दिया और फरार हो गए।
सिंह ने कहा कि संदिग्धों
ने पुलिस पर हमला करने और भागने की कोशिश की। पुलिस के पास उन्हें मारने के अलावा
कोई चारा नहीं था।'
एक अन्य गैर सत्यापित
मोबाइल वीडियो जिसे कथित रूप से एक गांव वाले ने उस वक्त फिल्माया जब पुलिस
संदिग्ध आतंकियों के शरीरों की जांच कर रही है,
इसमें एक पुलिसवाला साफ तौर पर एक मरे हुए व्यक्ति पर
गोलियां चलाता दिख रहा है, जिसके ठीक पहले उस पुलिसवाले का एक साथी एक अन्य शव की
बेल्ट से स्टील प्लेट जैसी कोई चीज निकालता नजर आ रहा है।
जब पुलिस वाले को दूसरे
शव पर गोलियां दागने को कहा जाता है तो उसे यह कहते हुए इनकार करते सुना जा सकता
है कि इसे फिल्माया जा रहा है।
चादरों को एक-दूसरे से
बांधकर जेल की दीवार चढ़कर फरार होने के कुछ ही घंटों बाद आठों कैदियों को पुलिस
द्वारा मार गिराए जाने की सनसनीखेज खबर सामने आई। यह बात भी शक पैदा करती है।
जब केंद्रीय गृह मंत्रालय
के निर्देश पर पूरे देश में हाई अलर्ट रखे जाने की बात कही गयी थी, जिसमें दीपावली
पर्व को लेकर स्पष्ट निर्देश थे तब राज्य सरकार ने उन निर्देशों की अनदेखी क्यों, किसलिए और
किसके निर्देश पर की?
जेल मैन्युअल के अनुसार
किसी भी जेल में आठ से अधिक दुर्दांत अपराधियों को नहीं रखा जाना चाहिए, तो राजधानी
की जेल में एक साथ 35 आतंकवादियों को क्यों रखा गया?
कुछ वर्षों पूर्व सिमी
आतंकवादियों के खंडवा जेल से फ़रार हो जाने की घटना से भी सरकार ने सबक क्यों नही
लिया?
हाई अलर्ट के दौरान 35
आतंकवादियों को रखे जाने वाली जेल की सुरक्षा मात्र 2 सिपाहियों के भरोसे क्यों, कैसे और
किसलिए रखी गई?
जेल से फ़रार होने के बाद
आतंकवादियों ने 8 से 9 घंटे तक भोपाल के ही नज़दीक रहने का निश्चय क्यों किया? प्रदेश की
सीमा से बाहर भागने के लिए 8 से 9 घंटे पूर्णतः पर्याप्त होते हैं।
फ़रार हुए लोगों को
आधुनिकतम हथियार कहाँ से और किससे प्राप्त हुए?
आईजी भोपाल का यह बयान कई रहस्य और आशंकाओं को जन्म दे रहा
है।
इस घटना और गहरे षड्यंत्र
के नेपथ्य में कौन कौन सी आंतरिक शक्तियां शामिल हैं?
ज़ाहिर है ये कुछ ऐसे
सवाल हैं जिनका निकट भविष्य में जवाब दिया जाना जरूरी है। बेहतर होगा कि मध्य
प्रदेश सरकार सवाल उठाने वालों पर लानत-मलामत भेजने से पहले इन सवालों के जवाब दे।
देश का कोई नागरिक शायद ही आतंक के आरोप में हिरासत में लिए गए विचाराधीन कैदियों
के पक्ष में खड़ा होना चाहता है ऐसे में प्रशासन को भी कहानी की छुटी कड़ियों को
जोड़ कर कोई ठोस जवाब देश के समक्ष रखना ही होगा तभी सवालों के इन तीरों से उनका
भी बचाव हो सके।

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