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| Photo Courtesy : Ganga Mahasabha |
वाराणसी : पौराणिक नगरी काशी में किन्नर समाज ने ऐतिहासिक कदम
उठाया। मानवाधिकार व संवैधानिक अधिकार की जंग जीतने के बाद धर्म सम्मत अधिकार की
राह पर आगे बढ़ते हुए अपने समाज के पितरों को नमन किया। अब तक ज्ञात इतिहास में
पहली बार पितृपक्ष मातृनवमी पर पिशाचमोचन कुंड पर किन्नरों ने अपने पितरों का
स्मरण करते हुए श्रद्धापूर्वक सामूहिक त्रिपिंडी श्राद्ध किया। सस्वर मंत्रों के
बीच विधि-विधान से समस्त अनुष्ठान किए व दिवंगत माताओं व गुरुओं के नाम पिंडदान
किया। पुरोहितों को भंडारा में भोजन कराया, दक्षिणा के साथ विदाई दी।
अनुष्ठान के निमित्त
किन्नर अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी के नेतृत्व में
देशभर से समाज के संत-महंतों की पिशाचमोचन पर सुबह लगभग 10 बजे जुटान हुआ। पंक्तिबद्ध हो सभी ने एक स्वर में संकल्प
लिया। समाज से मिली उपेक्षा के दंश को भूल अपनी उन माताओं-गुरुओं को याद किया जिन्होंने
स्नेह का आंचल देकर पाला, बड़ा किया और
अपने पैरों पर खड़ा भी किया। देश-दुनिया को मानवता के सर्वोपरि होने का संदेश भी
दिया। आचार्य लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि सनातन धर्मियों की तरह ही
किन्नर समाज के लोग अपने पितरों का हर साल श्राद्ध-तर्पण अनुष्ठान करेंगे। पांच
साल बाद फिर पिशाचमोचन पर सामूहिक रूप से श्राद्ध किया जाएगा। पुरोहित अनूप शर्मा
के आचार्यत्व में 21 ब्राह्मïणों ने श्राद्धकर्म कराया।
जैसे महाभारत में शिखंडी
ने अपने पुर्वजों का श्राद्ध किया था वैसे ही कलयुग में हजारों वर्षों बाद आचार्य
महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी जी (किन्नर अखाड़ा) ने तारिणी न्यास संबद्ध
गंगा महासभा के साथ मिलकर अपने पुर्वजों का त्रिपिंडी श्राद्ध कराया काशी के पिशाच
मोचन कुंड पर । गंगा महासभा व अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री आचार्य
जीतेंद्रानंद सरस्वती, किन्नर
अखाड़ा के संस्थापक व संरक्षक ऋषि अजय दास और स्वामी विमलदेव के सानिध्य में
अनुष्ठान किए गए। रविशंकर द्विवेदी व मुन्नालाल पांडेय ने मार्गदर्शन और तारिणी
न्यास के राष्ट्रीय मंत्री मयंक कुमार ने संयोजन किया। दोपहर बाद हनुमान प्रसाद
पोद्दार अंध विद्यालय में भंडारा किया गया। इसमें पुरोहितों को भोजन कराने के साथ
ही किन्नरों ने भी प्रसाद ग्रहण किया। दिल्ली से महंत भवानी मां, लखनऊ से पीठाधीश्वर सुधा तिवारी, मुंबई से महंत पवित्रा समेत अखाड़े के संत किन्नर मौजूद थे।
उल्लेखनीय है कि आदिकाल
से चली आ रही परंपरा ने किन्नरों को सम्मानपूर्वक जीने पर ही नहीं बल्कि मरने पर
भी प्रतिबंध लगा रखा है। हिंदू धर्म में जन्म लेने के बावजूद किन्नरों का शवदाह
नहीं होता। उन्हें दफनाया जाता है और हिंदू परंपरा के अनुसार उनका तर्पण भी नहीं किया
जाता है। किन्नर अखाड़े के महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण ने अखिल भारतीय संत समिति एवं
गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती के साथ मिलकर इस
परंपरा को तोड़ने की पहल की।
किन्नर परंपरा के
महामंडलेश्वर ने कहा कि परंपरा तोड़ने का मकसद सिर्फ यह है कि हिंदू धर्म में
जन्में किन्नरों को सम्मानपूर्वक मरने का अधिकार मिलना चाहिए। गंगा महासभा के
राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती ने कहा यह पहला मौका है जब
किन्नरों ने खुद को सनातन हिंदू मानते हुए पिंडदान के जरिए अपने समुदाय के पितरों
का स्मरण किया।

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