मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है, इसे क्रियान्वित भी किया जाए – मोहन भागवत

Photo Courtesy : Vishwa Samvad Kendra
नागपुर : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना दिवस पर नागपुर के रेशम बाग में आयोजित विशेष कार्यक्रम में आज संघ प्रमुख मोहन भागवत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को भारत का अंग बताते हुए कहा कि इस स्थापना को क्रियान्वयन में भी उतारा जाना चाहिए।
मोहन भागवत ने कहा, " कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है। दो बार संसद इस बारे में प्रस्ताव कर चुकी है और हाल में भी बार-बार वक्तव्य आए हैं। मीरपुर, मुजफ्फ़राबाद, गिलगित और बल्तिस्तान सहित सारा कश्मीर भारत का है. ये बात जो वक्तव्यों में कही जा रही है वो क्रियान्वयन में भी वैसी ही उतरनी चाहिए"। कश्मीर में जारी हिंसा और भारत द्वारा हाल ही में नियंत्रण रेखा के पार किए गए सर्जिकल स्ट्राइक पर श्री भागवत ने कहा, "कश्मीर में उपद्रवियों को उकसाने का काम सीमा पार से होता है। हमारे शासन ने उनको अच्छा जवाब दिया है। इससे उपद्रवी को संकेत मिला कि सहन करने की भी एक मर्यादा होती है"।
कश्मीर में सेना के काम की तारीफ़ करते हुए उन्होंने कहा, "हमारी सेना ने जो काम किया है उससे भारत देश की प्रतिष्ठा ऊंची हुई है। हमारे सामरिक बल, सीमा रक्षक और सूचना तंत्र मज़बूत होने चाहिए. कोई ठिलाई नहीं होनी चाहिए. उपद्रवियों से सख्ती से निपटना चाहिए. सीमा की चौकसी मज़बूती से होनी चाहिए. "
मोहन भागवत ने कहा कि लेह और लद्दाख जैसे कश्मीर के कई हिस्से उपद्रवों से पूरी तरह मुक्त है। उपद्रव क्षेत्र में अशांति को खत्म करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर काम करना होगा। राज्य और केंद्र की नीति में समन्वय की ज़रूरत है।
भागवत ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार के कामकाज की तारीफ़ की और कहा कि, "अभी जो शासन चल रहा है वो काम करने वाला है। उदासीन रहनेवाला नहीं है। अपेक्षाएं बहुत हैं। लेकिन जिस ढंग से चल रहे हैं उससे लगता है कि देश आगे बढ़ेगा"। उन्होंने कहा कि दुनिया में ऐसी शक्तियां हैं जो भारत के प्रभाव को बढ़ता नहीं देखना चाहतीं। 'जिनकी दुकान भेद, कट्टरवादिता पर चलती है वो भारत को आगे बढ़ता नहीं देखना चाहते'
भागवत के संबोधन में देश के विपक्षी दलों के लिए सीख थी। उन्होंने कहा कि प्रजातंत्र में जो सत्ता में नहीं रहते वो विरोधी रहते हैं। उनके विरोध का एक तरीका होता है। शासन की नीतियों की एक निगरानी होती है। प्रजातांत्रिक प्रक्रिया है। भागवत ने कहा कि, "भारत में संघ-राज्य व्यवस्था है। प्रांतीय दल अपने हित के लिए काम करें, लेकिन देश की एकता और विकास के काम में योगदान करें। विवादों के चलते जनता एक दूसरे के विरोध में खड़ी नहीं होनी चाहिए। देश हित को सबसे आगे रखकर राजनीतिक दलों को काम करना चाहिए। हमें ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे समाज में विभाजन पैदा हो"।
भागवत ने गोरक्षा का कार्य करने वाले लोगों को समाज का भला नागरिक बताया। उन्होंने कहा कि संविधान के मार्गदर्शक तत्वों में गोरक्षा का उल्लेख है। उन्होंने कहा, 'ऐसे विषयों को लेकर जो लोग उपद्रव करते हैं उनके साथ गोरक्षकों की तुलना नहीं होनी चाहिए। शासन को इसे देखना चाहिए। संविधान की मर्यादा में गोरक्षा होनी चाहिए। अगर लोग इस बारे में जागते नहीं हैं तो ख़तरे टले नहीं हैं'
मोहन भागवत ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि, "शिक्षा ठीक करने की ज़रूरत है। शिक्षा का स्वरूप, उसका प्रयोजन स्पष्ट होना चाहिए। उन्होंने ये भी कहा कि समाज जागरुक हो, प्रबुद्ध हो तो शासन की नीतियां सफल होती हैं। "हमारा समाज विविध प्रकार का है. युगों से भारत विविधता में एकता का संकल्प लेकर चल रहा है। विदेशी कुप्रभावों से मुक्त होते हुए अपने विचारों के आधार पर युगानुकूल नीति का निर्माण करना चाहिए। अगर हम ऐसा कर सके तो सारी दुनिया को मार्ग दिखा सकेंगे"।
इस मौके पर आरएसएस के स्वयंसेवक नए गणवेश (ड्रेस) में नज़र आए। संघ ने खाकी निकर की जगह ऑलिव ब्राउन शेड की फुलपैंट को नया गणवेश बनाया है। सन 1925  में नागपुर में विजयादशमी के दिन ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी।

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